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तुम्हारे नाम पर मैं ने हर आफ़त सर पे रक्खी थी नज़र शो'लों पे रक्खी थी ज़बाँ पत्थर पे रक्खी थी हमारे ख़्वाब तो शहरों की सड़कों पर भटकते थे तुम्हारी याद थी जो रात भर बिस्तर पे रक्खी थी मैं अपना अज़्म ले कर मंज़िलों की सम्त निकला था मशक़्क़त हाथ पे रक्खी थी क़िस्मत घर पे रक्खी थी इन्हीं साँसों के चक्कर ने हमें वो दिन दिखाए थे हमारे पाँव की मिट्टी हमारे सर पे रक्खी थी सहर तक तुम जो आ जाते तो मंज़र देख सकते थे दिए पलकों पे रक्खे थे शिकन बिस्तर पे रक्खी थी

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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ

Ali Zaryoun

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक‌ तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़

Varun Anand

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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फ़ैसले लम्हात के नस्लों पे भारी हो गए बाप हाकिम था मगर बेटे भिकारी हो गए देवियाँ पहुँचीं थीं अपने बाल बिखराए हुए देवता मंदिर से निकले और पुजारी हो गए रौशनी की जंग में तारीकियाँ पैदा हुईं चाँद पागल हो गया तारे भिकारी हो गए रख दिए जाएँगे नेज़े लफ़्ज़ और होंटों के बीच ज़िल्ल-ए-सुब्हानी के अहकामात जारी हो गए नर्म-ओ-नाज़ुक हल्के-फुल्के रूई जैसे ख़्वाब थे आँसुओं में भीगने के बा'द भारी हो गए

Rahat Indori

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चेहरों की धूप आँखों की गहराई ले गया आईना सारे शहर की बीनाई ले गया डूबे हुए जहाज़ पे क्या तब्सिरा करें ये हादिसा तो सोच की गहराई ले गया हालाँकि बे-ज़बान था लेकिन अजीब था जो शख़्स मुझ से छीन के गोयाई ले गया मैं आज अपने घर से निकलने न पाऊँगा बस इक क़मीस थी जो मिरा भाई ले गया 'ग़ालिब' तुम्हारे वास्ते अब कुछ नहीं रहा गलियों के सारे संग तो सौदाई ले गया

Rahat Indori

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इसे सामान-ए-सफ़र जान ये जुगनू रख ले राह में तीरगी होगी मिरे आँसू रख ले तू जो चाहे तो तिरा झूट भी बिक सकता है शर्त इतनी है कि सोने की तराज़ू रख ले वो कोई जिस्म नहीं है कि उसे छू भी सकें हाँ अगर नाम ही रखना है तो ख़ुश्बू रख ले तुझ को अन-देखी बुलंदी में सफ़र करना है एहतियातन मिरी हिम्मत मिरे बाज़ू रख ले मिरी ख़्वाहिश है कि आँगन में न दीवार उठे मिरे भाई मिरे हिस्से की ज़मीं तू रख ले

Rahat Indori

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मेरे अश्कों ने कई आँखों में जल-थल कर दिया एक पागल ने बहुत लोगों को पागल कर दिया अपनी पलकों पर सजा कर मेरे आँसू आप ने रास्ते की धूल को आँखों का काजल कर दिया मैं ने दिल दे कर उसे की थी वफ़ा की इब्तिदा उस ने धोका दे के ये क़िस्सा मुकम्मल कर दिया ये हवाएँ कब निगाहें फेर लें किस को ख़बर शोहरतों का तख़्त जब टूटा तो पैदल कर दिया देवताओं और ख़ुदाओं की लगाई आग ने देखते ही देखते बस्ती को जंगल कर दिया ज़ख़्म की सूरत नज़र आते हैं चेहरों के नुक़ूश हम ने आईनों को तहज़ीबों का मक़्तल कर दिया शहर में चर्चा है आख़िर ऐसी लड़की कौन है जिस ने अच्छे-ख़ासे इक शाइ'र को पागल कर दिया

Rahat Indori

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वो इक इक बात पे रोने लगा था समुंदर आबरू खोने लगा था लगे रहते थे सब दरवाज़े फिर भी मैं आँखें खोल कर सोने लगा था चुराता हूँ अब आँखें आइनों से ख़ुदा का सामना होने लगा था वो अब आईने धोता फिर रहा है उसे चेहरे पे शक होने लगा था मुझे अब देख कर हँसती है दुनिया मैं सब के सामने रोने लगा था

Rahat Indori

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