kar liya din men kaam aath se panch ab chale daur-e-jam aath se panch chand hai aur asman hai saaf rahiye bala-e-bam aath se panch ab to ham ban gae hain ek machine ab hamara hai naam aath se panch sher kya shairi ke baare men sochna bhi haram aath se panch kuchh khariden to bhaav panch ke aath aur bechen to daam aath se panch vo mile bhi to bas ye puchhenge kuchh mila kam-vam aath se panch sohbat-e-ahl-e-zauq hai 'basir' ab sunao kalam aath se panch kar liya din mein kaam aath se panch ab chale daur-e-jam aath se panch chand hai aur aasman hai saf rahiye baala-e-baam aath se panch ab to hum ban gae hain ek machine ab hamara hai nam aath se panch sher kya shairi ke bare mein sochna bhi haram aath se panch kuchh khariden to bhaw panch ke aath aur bechen to dam aath se panch wo mile bhi to bas ye puchhenge kuchh mila kaam-wam aath se panch sohbat-e-ahl-e-zauq hai 'basir' ab sunao kalam aath se panch
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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हम जैसे तेग़-ए-ज़ुल्म से डर भी गए तो क्या कुछ वो भी हैं जो कहते हैं सर भी गए तो क्या उठती रहेंगी दर्द की टीसें तमाम उम्र हैं ज़ख़्म तेरे हाथ के भर भी गए तो क्या हैं कौन से बहार के दिन अपने मुंतज़िर ये दिन किसी तरह से गुज़र भी गए तो क्या इक मक्र ही था आप का ईफ़ा-ए-अहद भी अपने कहे से आज मुकर भी गए तो क्या हम तो इसी तरह से फिरेंगे ख़राब-हाल ये शे'र तेरे दिल में उतर भी गए तो क्या 'बासिर' तुम्हें यहाँ का अभी तजरबा नहीं बीमार हो? पड़े रहो, मर भी गए तो क्या
Basir Sultan Kazmi
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कितनी ही बे-ज़रर सही तेरी ख़राबियाँ 'बासिर' ख़राबियाँ तो हैं फिर भी ख़राबियाँ हालत जगह बदलने से बदली नहीं मिरी होती हैं हर जगह की कुछ अपनी ख़राबियाँ तू चाहता है अपनी नई ख़ूबियों की दाद मुझ को अज़ीज़ तेरी पुरानी ख़राबियाँ जूँही तअ'ल्लुक़ात किसी से हुए ख़राब सारे जहाँ की उस में मिलेंगी ख़राबियाँ सरकार का है अपना ही मेआ'र-ए-इंतिख़ाब यारो कहाँ की ख़ूबियाँ कैसी ख़राबियाँ आदम ख़ता का पुतला है गर मान लें ये बात निकलेंगी इस ख़राबी से कितनी ख़राबियाँ उन हस्तियों की राह पे देखेंगे चल के हम जिन में न थीं किसी भी तरह की ख़राबियाँ बोएँगे अपने बाग़ में सब ख़ूबियों के बीज जड़ से उखाड़ फेंकेंगे सारी ख़राबियाँ 'बासिर' की शख़्सियत भी अजब है कि इस में हैं कुछ ख़ूबियाँ ख़राब कुछ अच्छी ख़राबियाँ
Basir Sultan Kazmi
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ये नहीं है कि तुझे मैं ने पुकारा कम है मेरे नालों को हवाओं का सहारा कम है इस क़दर हिज्र में की नज्म-शुमारी हम ने जान लेते हैं कहाँ कोई सितारा कम है दोस्ती में तो कोई शक नहीं उस की पर वो दोस्त दुश्मन का ज़ियादा है हमारा कम है साफ़ इज़हार हो और वो भी कम-अज़-कम दो बार हम वो आक़िल हैं जिन्हें एक इशारा कम है एक रुख़्सार पे देखा है वो तिल हम ने भी हो समरक़ंद मुक़ाबिल कि बुख़ारा कम है इतनी जल्दी न बना राय मिरे बारे में हम ने हमराह अभी वक़्त गुज़ारा कम है बाग़ इक हम को मिला था मगर उस को अफ़्सोस हम ने जी भर के बिगाड़ा है सँवारा कम है आज तक अपनी समझ में नहीं आया 'बासिर' कौन सा काम है वो जिस में ख़सारा कम है
Basir Sultan Kazmi
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ज़ख़्म तुम्हारे भर जाएँगे थोड़ी देर लगेगी बे-सब्री से काम लिया तो और भी देर लगेगी साहब आज तो अपना काम करा के जाएँगे हम सारी शर्तें पूरी हैं फिर कैसी देर लगेगी यूँँ बेहाल न हो ऐ दिल बस आते ही होंगे वो कल भी देर लगी थी उन को आज भी देर लगेगी सीख लिया है मैं ने अपने आप से बातें करना फ़िक्र नहीं उन को आने में कितनी देर लगेगी कौन रुके अब उस के दर पर शाम हुई घर जाएँ इतना ज़रूरी काम नहीं है जितनी देर लगेगी इतनी देर में कुछ के कुछ हो जाएँगे हालात ख़त लिखने से ख़त मिलने तक जितनी देर लगेगी मार-गज़ीदा कौन बचा है 'बासिर' शुक्र करो तुम ठीक भी हो जाओगे लेकिन ख़ासी देर लगेगी
Basir Sultan Kazmi
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कर लिया दिन में काम आठ से पाँच अब चले दौर-ए-जाम आठ से पाँच चाँद है और आसमान है साफ़ रहिए बाला-ए-बाम आठ से पाँच अब तो हम बन गए हैं एक मशीन अब हमारा है नाम आठ से पाँच शे'र क्या शाइ'री के बारे में सोचना भी हराम आठ से पाँच कुछ ख़रीदें तो भाव पाँच के आठ और बेचें तो दाम आठ से पाँच वो मिले भी तो बस ये पूछेंगे कुछ मिला काम-वाम आठ से पाँच सोहबत-ए-अहल-ए-ज़ौक़ है 'बासिर' अब सुनाओ कलाम आठ से पाँच
Basir Sultan Kazmi
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