ghazalKuch Alfaaz

kya karoge bachav suraj ka jante ho subhav suraj ka garm hai vo to kam nahin ham bhi kaun sahta hai taao suraj ka mere ghar ka charaghh bujhte hi chadh gaya kitna bhaav suraj ka surmai shaam aae kamre men ab to parda hatao suraj ka raat se jang kar ke aaya hai taaza taaza hai ghaav suraj ka milne jaata hai raat se chhup kar ik fasana banao suraj ka asmanon se dosti kar ke badh gaya hai tanav suraj ka ho gai shaam sochte kya ho ab janaza uthao suraj ka raat bhar munh chhupae phirta raha kam nahin phir bhi taao suraj ka roz dariya kinare baith ke ham jodte hain ghatao suraj ka jugnuon se muqabla tha 'fahim' kaun karta bachao suraj ka kya karoge bachaw suraj ka jaante ho subhaw suraj ka garm hai wo to kam nahin hum bhi kaun sahta hai tao suraj ka mere ghar ka charagh bujhte hi chadh gaya kitna bhaw suraj ka surmai sham aae kamre mein ab to parda hatao suraj ka raat se jang kar ke aaya hai taza taza hai ghaw suraj ka milne jata hai raat se chhup kar ek fasana banao suraj ka aasmanon se dosti kar ke badh gaya hai tanaw suraj ka ho gai sham sochte kya ho ab janaza uthao suraj ka raat bhar munh chhupae phirta raha kam nahin phir bhi tao suraj ka roz dariya kinare baith ke hum jodte hain ghatao suraj ka jugnuon se muqabla tha 'fahim' kaun karta bachao suraj ka

Related Ghazal

तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं

Dagh Dehlvi

84 likes

कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

435 likes

ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

232 likes

वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

244 likes

ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे

Umair Najmi

59 likes

More from Faheem Jogapuri

क्या कोई तस्वीर बन सकती है सूरत के बग़ैर फिर किसी से क्यूँँ मिले कोई ज़रूरत के बग़ैर दुश्मनी तो चाहने की इंतिहा का नाम है ये कहानी भी अधूरी है मोहब्बत के बग़ैर तेरी यादें हो गईं जैसे मुक़द्दस आयतें चैन आता ही नहीं दिल को तिलावत के बग़ैर धूप की हर साँस गिनते शाम तक जो आ गए छाँव में वो क्या जिएँ जीने की आदत के बग़ैर बच गया दामन अगर मेरे लहू के दाग़ से वो मिरा क़ातिल तो मर जाएगा शोहरत के बग़ैर उस की सरदारी से अब इनकार करना चाहिए रौशनी देता नहीं सूरज सियासत के बग़ैर हुस्न की दूकान हो कि इश्क़ का बाज़ार हो याँ कोई सौदा नहीं है दिल की दौलत के बग़ैर शबनमी चेहरा छुपाऊँ कैसे बच्चों से 'फहीम' शाम आती ही नहीं घर में तहारत के बग़ैर

Faheem Jogapuri

0 likes

शाम ख़ामोश है पेड़ों पे उजाला कम है लौट आए हैं सभी एक परिंदा कम है देख कर सूख गया कैसे बदन का पानी मैं न कहता था मिरी प्यास से दरिया कम है ख़ुद से मिलने की कभी गाँव में फ़ुर्सत न मिली शहर आए हैं यहाँ मिलना-मिलाना कम है आज क्यूँँ आँखों में पहले से नहीं हैं आँसू आज क्या बात है क्यूँँ मौज में दरिया कम है अपने मेहमान को पलकों पे बिठा लेती है मुफ़्लिसी जानती है घर मैं बिछौना कम है बस यही सोच के करने लगे हिजरत आँसू अपनी लाशों के मुक़ाबिल यहाँ कांधा कम है दिल की हर बात ज़बाँ पर नहीं आती है 'फहीम' मैं ने सोचा है ज़ियादा उसे लिक्खा कम है

Faheem Jogapuri

0 likes

दोस्ती में न दुश्मनी में हम क्या नज़र आएँगे किसी में हम क्यूँँ सजाते हैं ख़्वाब सदियों के चंद लम्हों की ज़िंदगी में हम सैर करते हैं दोनों आलम की अपने ख़्वाबों की पालकी में हम जब तुम्हारा ख़याल आता है डूब जाते हैं रौशनी में हम कोई आवाज़ क्यूँँ नहीं देता डगमगाते हैं तीरगी में हम प्यास हम को कहीं सताती है तैरते हैं कहीं नदी में हम रात होती तो कोई बात न थी लुट गए दिन की रौशनी में हम अपने माज़ी से बात करते हैं तेरी यादों की चाँदनी में हम

Faheem Jogapuri

1 likes

अपने क़दम की चाप से यूँँ डर रहे हैं हम मक़्तल की सम्त जैसे सफ़र कर रहे हैं हम क्या चाँद और तारों को हम जानते नहीं ऐ आसमान वालो ज़मीं पर रहे हैं हम मुश्किल था सत्ह-ए-आब से हम को खंगालना बाहर नहीं थे जितना कि अंदर रहे हैं हम कल और कोई वक़्त की आँखों में हो तो क्या अब तक तो हर निगाह का मेहवर रहे हैं हम दैर-ओ-हरम से और भी आगे निकल गए हाँ अक़्ल की हुदूद से बाहर रहे हैं हम ऐ हम-सफ़र न पूछ मसाफ़त नसीब से तू जानता है कितने दिनों घर रहे हैं हम बाहर न आए हम भी अना के हिसार से इस जंग में तुम्हारे बराबर रहे हैं हम झरनों की क्या बिसात करें गुफ़्तुगू 'फहीम' दरिया गिरे जहाँ वो समुंदर रहे हैं हम

Faheem Jogapuri

0 likes

आना था जिसे आज वो आया तो नहीं है ये वक़्त बदलने का इशारा तो नहीं है दावत दे कभी क्यूँँ वो मोहब्बत से बुलाए दरिया से मिरी प्यास का रिश्ता तो नहीं है ये कौन गया है कि झपकती नहीं आँखें रस्ते में वो ठहरा हुआ लम्हा तो नहीं है हँसता हुआ चेहरा है दमकता हुआ पैकर गुज़रा हुआ ये मेरा ज़माना तो नहीं है आँखों ने अभी नींद का दामन नहीं छोड़ा ख़्वाबों से भरोसा अभी टूटा तो नहीं है दरिया में सर-ए-शाम है डूबा हुआ सूरज दिन-भर का मुसाफ़िर कोई प्यासा तो नहीं है छोड़ आए हो जिस के लिए आँचल की घनी छाँव इस शहर में वो धूप का टुकड़ा तो नहीं है रस्ते में 'फहीम' उस की तबीअ'त का बिगड़ना घर जाने का इक और बहाना तो नहीं है

Faheem Jogapuri

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Faheem Jogapuri.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Faheem Jogapuri's ghazal.