लाखों सद में ढेरों ग़म, फिर भी नहीं हैं आँखें नम इक मुद्दत से रोए नहीं, क्या पत्थर के हो गए हम यूँ पलकों पे हैं आँसू, जैसे फूलों पर शबनम ख़्वाब में वो आ जाते हैं, इतना तो रखते हैं भरम हम उस बस्ती में हैं जहाँ, धूप ज़ियादा साए कम अब ज़ख़्मों में ताब नहीं, अब क्यूँ लाए हो मरहम
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
Tehzeeb Hafi
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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
Ahmad Faraz
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उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है नई 'उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है बहुत बेबाक आँखों में तअल्लुक़ टिक नहीं पाता मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो कि इस के बा'द भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
Waseem Barelvi
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जितना तेरा हुक्म था उतनी सँवारी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से कहाँ हम ने गुज़ारी ज़िंदगी मेरे अंदर इक नया ग़म रोज़ रख जाता है कौन रफ़्ता रफ़्ता हो रही है और भारी ज़िंदगी रूह की तस्कीन के सारे दरीचे खुल गए दर्द के पहलू में जब आई हमारी ज़िंदगी सिर्फ़ थी ख़ाना-बदोशी या मोहब्बत का जुनूँ हिजरतें करता रहा इक शख़्स सारी ज़िंदगी एक लफ़्ज़-ए-कुन कहा आबाद सन्नाटे हुए आसमानों से ज़मीनों पर उतारी ज़िंदगी
Azm Shakri
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दिल में हसरत कोई बची ही नहीं आग ऐसी लगी बुझी ही नहीं उस ने जब ख़ुद को बे-नक़ाब किया फिर किसी की नज़र उठी ही नहीं जैसा इस बार खुल के रोए हम ऐसी बारिश कभी हुई ही नहीं ज़िंदगी को गले लगाते क्या ज़िंदगी उम्र-भर मिली ही नहीं मुंतज़िर कब से चाँद छत पर है कोई खिड़की अभी खुली ही नहीं मैं जिसे अपनी ज़िंदगी समझा सच तो ये है वो मेरी थी ही नहीं
Azm Shakri
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ख़ून आँसू बन गया आँखों में भर जाने के बा'द आप आए तो मगर तूफ़ाँ गुज़र जाने के बा'द चाँद का दुख बाँटने निकले हैं अब अहल-ए-वफ़ा रौशनी का सारा शीराज़ा बिखर जाने के बा'द होश क्या आया मुसलसल जल रहा हूँ हिज्र में इक सुनहरी रात का नश्शा उतर जाने के बा'द ज़ख़्म जो तुम ने दिया वो इस लिए रक्खा हरा ज़िंदगी में क्या बचेगा ज़ख़्म भर जाने के बा'द शाम होते ही चराग़ों से तुम्हारी गुफ़्तुगू हम बहुत मसरूफ़ हो जाते हैं घर जाने के बा'द ज़िंदगी के नाम पर हम उमर भर जीते रहे ज़िंदगी को हम ने पाया भी तो मर जाने के बा'द
Azm Shakri
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ये मत कहो कि भीड़ में तन्हा खड़ा हूँ मैं टकरा के आबगीने से पत्थर हुआ हूँ मैं आँखों के जंगलों में मुझे मत करो तलाश दामन पे आँसुओं की तरह आ गया हूँ मैं यूँँ बे-रुख़ी के साथ न मुँह फेर के गुज़र ऐ साहब-ए-जमाल तिरा आइना हूँ मैं यूँँ बार बार मुझ को सदाएँ न दीजिए अब वो नहीं रहा हूँ कोई दूसरा हूँ मैं मेरी बुराइयों पे किसी की नज़र नहीं सब ये समझ रहे हैं बड़ा पारसा हूँ मैं वो बे-वफ़ा समझता है मुझ को उसे कहो आँखों में उस के ख़्वाब लिए फिर रहा हूँ मैं
Azm Shakri
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चाहता ये हूँ कि बेनाम-ओ-निशाँ हो जाऊँ शाम की तरह जलूँ और धुआँ हो जाऊँ पहले दहलीज़ पे रौशन करूँँ आँखों के चराग़ और फिर ख़ुद किसी पर्दे में निहाँ हो जाऊँ तोड़ कर फेंक दूँ ये फ़िरक़ा-परस्ती के महल और पेशानी पे सज्दे का निशाँ हो जाऊँ दिल से फिर दर्द महकने की सदाएँ उट्ठें काश ऐसा हो मैं तेरी रग-ए-जाँ हो जाऊँ बस तिरे ज़िक्र में कट जाएँ मिरे रोज़-ओ-शब नूर की शाख़ पे चिड़ियों की ज़बाँ हो जाऊँ ख़ाक जिस कूचे की मलते हैं फ़रिश्ते आ कर मैं उसी ख़ाक के ज़र्रों में निहाँ हो जाऊँ मेरी आवारा-मिज़ाजी को सुकूँ मिल जाए दर्द बन कर तिरे सीने में रवाँ हो जाऊँ
Azm Shakri
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