mire junun ka natija zarur niklega isi siyah samundar se nuur niklega gira diya hai to sahil pe intizar na kar agar vo duub gaya hai to duur niklega usi ka shahr vahi muddai vahi munsif hamen yaqin tha hamara qusur niklega yaqin na aae to ik baat puchh kar dekho jo hans raha hai vo zakhmon se chuur niklega us astin se ashkon ko pochhne vaale us astin se khanjar zarur niklega mere junun ka natija zarur niklega isi siyah samundar se nur niklega gira diya hai to sahil pe intizar na kar agar wo dub gaya hai to dur niklega usi ka shahr wahi muddai wahi munsif hamein yaqin tha hamara qusur niklega yaqin na aae to ek baat puchh kar dekho jo hans raha hai wo zakhmon se chur niklega us aastin se ashkon ko pochhne wale us aastin se khanjar zarur niklega
Related Ghazal
ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी
Ali Zaryoun
102 likes
वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
244 likes
ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे
Tehzeeb Hafi
292 likes
मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो
Fazil Jamili
73 likes
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़ सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ 'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
Ahmad Faraz
65 likes
More from Ameer Qazalbash
फ़िक्र-ए-ग़ुर्बत है न अंदेशा-ए-तन्हाई है ज़िंदगी कितने हवादिस से गुज़र आई है लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है हम न सुक़रात न मंसूर न ईसा लेकिन जो भी क़ातिल है हमारा ही तमन्नाई है ज़िंदगी और हैं कितने तिरे चेहरे ये बता तुझ से इक उम्र की हालाँकि शनासाई है कौन ना-वाक़िफ़-ए-अंजाम-ए-तबस्सुम है 'अमीर' मेरे हालात पे ये किस को हँसी आई है
Ameer Qazalbash
2 likes
पाईं हर एक राह-गुज़र पर उदासियाँ निकली हुई हैं कब से सफ़र पर उदासियाँ ख़्वाबीदा शहर जागने वाला है लौट आओ बैठी हुई हैं शाम से घर पर उदासियाँ मैं ख़ौफ़ से लरज़ता रहा पढ़ नहीं सका फैली हुई थीं एक ख़बर पर उदासियाँ सूरज के हाथ सब्ज़ क़बाओं तक आ गए अब हैं यहाँ हर एक शजर पर उदासियाँ अपने भी ख़त्त-ओ-ख़ाल निगाहों में अब नहीं इस तरह छा गई हैं नज़र पर उदासियाँ फैला रहा है कौन कभी सोचता हूँ मैं ख़्वाबों के एक एक नगर पर उदासियाँ सब लोग बन गए हैं अगर अजनबी तो क्या छोड़ आएँगी मुझे मिरे दर पर उदासियाँ
Ameer Qazalbash
0 likes
ख़ौफ़ बन कर ये ख़याल आता है अक्सर मुझ को दश्त कर जाएगा इक रोज़ समुंदर मुझ को मैं सरापा हूँ ख़बर-नामा-ए-इमरोज़-ए-जहाँ कल भुला दे न ये दुनिया कहीं पढ़ कर मुझ को हर नफ़स मुझ में तग़य्युर की हवाए लर्ज़ां मुर्तसिम कर न सका कोई भी मंज़र मुझ को अपने साहिल पे मैं ख़ुद तिश्ना-दहन बैठा हूँ देख दरिया की तराई से निकल कर मुझ को मिरे साए में भी मुझ को नहीं रहने देगा मेरे ही घर में रखेगा कोई बे-घर मुझ को कार-गर कोई भी तदबीर न होने देगा क्या मुक़द्दर है कि ले जाएगा दर-दर मुझ को काम आएगी न बेदार-निगाही भी 'अमीर' ख़्वाब कह जाएगा इक दिन मिरा पैकर मुझ को
Ameer Qazalbash
0 likes
मिरे हाल पर मेहरबानी करे ख़ुदा से कहो हुक्म-ए-सानी करे मैं इक बूँद पानी बड़ी चीज़ हूँ समुंदर मिरी पासबानी करे पढ़ें लोग तहरीर-ए-दीवार ओ दर ख़ुलासा मिरी बे-ज़बानी करे अज़ल से मैं उस के तआक़ुब में हूँ जो लम्हा मुझे ग़ैर-फ़ानी करे वो बख़्शे उजाले किसी सुब्ह को कोई शाम रौशन सुहानी करे मिरे साए में सब हैं मेरे सिवा कोई तो मिरी साएबानी करे कोई है जो बढ़ के उठा ले 'अमीर' वो तेशा जो पत्थर को पानी करे
Ameer Qazalbash
0 likes
मेरी पहचान है क्या मेरा पता दे मुझ को कोई आईना अगर है तो दिखा दे मुझ को तुझ से मिलता हूँ तो अक्सर ये ख़याल आता है इस बुलंदी से अगर कोई गिरा दे मुझ को कब से पत्थर की चट्टानों में हूँ गुमनाम ओ असीर देवताओं की तरह कोई जगा दे मुझ को एक आईना सर-ए-राह लिए बैठा हूँ जुर्म ऐसा है कि हर शख़्स सज़ा दे मुझ को इन अँधेरों में अकेला ही जलूँगा कब तक कोई शय तू भी तो ख़ुर्शीद-नुमा दे मुझ को
Ameer Qazalbash
1 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Ameer Qazalbash.
Similar Moods
More moods that pair well with Ameer Qazalbash's ghazal.







