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न छेड़ ज़ाहिद-ए-नादाँ शराब पीने दे शराब पीने दे ख़ाना-ख़राब पीने दे अभी से अपनी नसीहत का ज़हर दे न मुझे अभी तो पीने दे और बे-हिसाब पीने दे मैं जानता हूँ छलकता हुआ गुनाह है ये तू इस गुनाह को बे-एहतिसाब पीने दे फिर ऐसा वक़्त कहाँ हम कहाँ शराब कहाँ तिलिस्म-ए-दहर है नक़्श-ए-बर-आब पीने दे मिरे दिमाग़ की दुनिया का आफ़्ताब है ये मिला के बर्फ़ में ये आफ़्ताब पीने दे किसी हसीना के बोसों के क़ाबिल अब न रहे तो इन लबों से हमेशा शराब पीने दे समझ के उस को ग़फ़ूर-उर-रहीम पीता हूँ न छेड़ ज़िक्र-ए-अज़ाब-ओ-सवाब पीने दे जो रूह हो चुकी इक बार दाग़-दार मिरी तो और होने दे लेकिन शराब पीने दे शराब-ख़ाने में ये शोर क्यूँँ मचाया है ख़मोश 'अख़्तर'-ए-ख़ाना-ख़राब पीने दे

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"प्रीत" ये मुहब्बत जब बे-हिसाब होती है लब गुलाब, क़ातिल आँखें शराब होती हैं तुम वहाँ कभी जो बीमार होते हो, जानाँ हालतें यहाँ मेरी भी ख़राब होती हैं प्यार के बिना सजदों में असर नहीं आता सारी कोशिशें ही नाकामयाब होती हैं प्यार गर बड़ी शिद्दत से निभाया जाए तो बा'द उस के नफ़रत भी लाज़वाब होती है

Prit

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तेरे ख़याल से फूटा था ख़्वाब कहते हैं तुझे हयात का लुब्ब-ए-लुबाब कहते हैं चुना है तू ने मुझे ज़िन्दगी के दामन में मुझे ये लोग तेरा इंतिख़ाब कहते हैं इसी का नाम रवानी है बर-सर-ए-दरिया इसी को दश्त में प्यासे शराब कहते हैं गुनाहगार है उस के सो उस की महफ़िल में हम उस के हुस्न को उस का नक़ाब कहते हैं

Abbas Qamar

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पड़ी है रात कोई ग़म-शनास भी नहीं है शराब खाने में आधा गिलास भी नहीं है मैं दिल को ले कर कहा निकलूं इतनी रात गए मकान उस का कहीं आसपास भी नहीं है यहाँ तो लड़कियां अच्छा सा घर भी चाहती है हमारे पास तो अच्छा लिबास भी नहीं है

Ismail Raaz

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कहीं चाँद राहों में खो गया कहीं चाँदनी भी भटक गई  मैं चराग़ वो भी बुझा हुआ मेरी रात कैसे चमक गई  मिरी दास्ताँ का उरूज था तिरी नर्म पलकों की छाँव में  मिरे साथ था तुझे जागना तिरी आँख कैसे झपक गई  भला हम मिले भी तो क्या मिले वही दूरियाँ वही फ़ासले  न कभी हमारे क़दम बढ़े न कभी तुम्हारी झिजक गई  तिरे हाथ से मेरे होंट तक वही इंतिज़ार की प्यास है  मिरे नाम की जो शराब थी कहीं रास्ते में छलक गई  तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी कामयाब न हो सकीं  तिरी याद शाख़-ए-गुलाब है जो हवा चली तो लचक गई

Bashir Badr

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कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया और कुछ तल्ख़ी-ए-हालात ने दिल तोड़ दिया हम तो समझे थे के बरसात में बरसेगी शराब आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया दिल तो रोता रहे और आँख से आँसू न बहे इश्क़ की ऐसी रिवायात ने दिल तोड़ दिया वो मिरे हैं मुझे मिल जाएँगे आ जाएँगे ऐसे बेकार ख़यालात ने दिल तोड़ दिया आप को प्यार है मुझ से कि नहीं है मुझ से जाने क्यूँँ ऐसे सवालात ने दिल तोड़ दिया

Sudarshan Fakir

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ला पिला साक़ी शराब-ए-अर्ग़वानी फिर कहाँ ज़िंदगानी फिर कहाँ नादाँ जवानी फिर कहाँ दो घड़ी मिल बैठने को भी ग़नीमत जानिए उम्र फ़ानी ही सही ये उम्र-ए-फ़ानी फिर कहाँ आ कि हम भी इक तराना झूम कर गाते चलें इस चमन के ताएरों की हम-ज़बानी फिर कहाँ है ज़माना इश्क़-ए-सलमा में गँवा दे ज़िंदगी ये ज़माना फिर कहाँ ये ज़िंदगानी फिर कहाँ एक ही बस्ती में हैं आसाँ है मिलना आ मिलो क्या ख़बर ले जाए दौर-ए-आसमानी फिर कहाँ फ़स्ल-ए-गुल जाने को है दौर-ए-ख़िज़ाँ आने को है ये चमन ये बुलबुलें ये नग़्मा-ख़्वानी फिर कहाँ फूल चुन जी खोल कर ऐश-ओ-तरब के फूल चुन मौसम-ए-गुल फिर कहाँ फस्ल-ए-जवानी फिर कहाँ आख़िरी रात आ गई जी भर के मिल लें आज तो तुम से मिलने देगा दौर-ए-आसमानी फिर कहाँ आज आए हो तो सुनते जाओ ये ताज़ा ग़ज़ल वर्ना 'अख़्तर' फिर कहाँ ये शेर-ख़्वानी फिर कहाँ

Akhtar Shirani

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ग़म-ए-ज़माना नहीं इक अज़ाब है साक़ी शराब ला मिरी हालत ख़राब है साक़ी शबाब के लिए तौबा अज़ाब है साक़ी शराब ला मुझे पास-ए-शबाब है साक़ी उठा पियाला कि गुलशन पे फिर बरसने लगी वो मय कि जिस का क़दह माहताब है साक़ी निकाल पर्दा-ए-मीना से दुख़्तर-ए-रज़ को घटा में किस लिए ये माहताब है साक़ी तू वाइ'ज़ों की न सुन मय-कशों की ख़िदमत कर गुनह सवाब की ख़ातिर सवाब है साक़ी ज़माने-भर के ग़मों को है दावत-ए-ग़र्रा कि एक जाम में सब का जवाब है साक़ी कलाम जिस का है मे'राज 'हाफ़िज़'-ओ-'ख़य्याम' यही वो 'अख़्तर'-ए-ख़ाना-ख़राब है साक़ी

Akhtar Shirani

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ज़मान-ए-हिज्र मिटे दौर-ए-वस्ल-ए-यार आए इलाही अब तो ख़िज़ाँ जाए और बहार आए सितम-ज़रीफ़ी-ए-फ़ितरत ये क्या मुअ'म्मा है कि जिस कली को भी सूंघूँ मैं बू-ए-यार आए चमन की हर कली आमादा-ए-तबस्सुम है बहार बन के मिरी जान-ए-नौ-बहार आए हैं तिश्ना-काम हम उन बादलों से पूछे कोई कहाँ बहार की परियों के तख़्त उतार आए तिरे ख़याल की बे-ताबियाँ मआ'ज़-अल्लाह कि एक बार भुलाएँ तो लाख बार आए वो आएँ यूँँ मिरे आग़ोश-ए-इश्क़ में 'अख़्तर' कि जैसे आँखों में इक ख़्वाब-ए-बे-क़रार आए

Akhtar Shirani

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काम आ सकीं न अपनी वफ़ाएँ तो क्या करें उस बे-वफ़ा को भूल न जाएँ तो क्या करें मुझ को ये ए'तिराफ़ दु'आओं में है असर जाएँ न अर्श पर जो दुआएँ तो क्या करें इक दिन की बात हो तो उसे भूल जाएँ हम नाज़िल हों दिल पे रोज़ बलाएँ तो क्या करें ज़ुल्मत-ब-दोश है मिरी दुनिया-ए-आशिक़ी तारों की मिशअले न चुराएँ तो क्या करें शब भर तो उन की याद में तारे गिना किए तारे से दिन को भी नज़र आएँ तो क्या करें अहद-ए-तरब की याद में रोया किए बहुत अब मुस्कुरा के भूल न जाएँ तो क्या करें अब जी में है कि उन को भुला कर ही देख लें वो बार बार याद जो आएँ तो क्या करें वअ'दे के ए'तिबार में तस्कीन-ए-दिल तो है अब फिर वही फ़रेब न खाएँ तो क्या करें तर्क-ए-वफ़ा भी जुर्म-ए-मोहब्बत सही मगर मिलने लगें वफ़ा की सज़ाएँ तो क्या करें

Akhtar Shirani

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याद आओ मुझे लिल्लाह न तुम याद करो अपनी और मेरी जवानी को न बर्बाद करो शर्म रोने भी न दे बेकली सोने भी न दे इस तरह तो मिरी रातों को न बर्बाद करो हद है पीने की कि ख़ुद पीर-ए-मुग़ाँ कहता है इस बुरी तरह जवानी को न बर्बाद करो याद आते हो बहुत दिल से भुलाने वालो तुम हमें याद करो तुम हमें क्यूँँ याद करो आसमाँ रुत्बा महल अपने बनाने वालो दिल का उजड़ा हुआ घर भी कोई आबाद करो हम कभी आएँ तिरे घर मगर आएँगे ज़रूर तुम ने ये वा'दा किया था कि नहीं याद करो चाँदनी रात में गुल-गश्त को जब जाते थे आह अज़रा कभी उस वक़्त को भी याद करो मैं भी शाइस्ता-ए-अल्ताफ़-ए-सितम हूँ शायद मेरे होते हुए क्यूँँ ग़ैर पे बेदाद करो सदक़े उस शोख़ के 'अख़्तर' ये लिखा है जिस ने इश्क़ में अपनी जवानी को न बर्बाद करो

Akhtar Shirani

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