नक़्श-ए-नाज़-ए-बुत-ए-तन्नाज़ ब-आग़ोश-ए-रक़ीब पा-ए-ताऊस पए-ख़ामा-ए-मानी माँगे तू वो बद-ख़ू कि तहय्युर को तमाशा जाने ग़म वो अफ़्साना कि आशुफ़्ता-बयानी माँगे वो तप-ए-इश्क़-ए-तमन्ना है कि फिर सूरत-ए-शम्अ' शो'ला ता-नब्ज़-ए-जिगर रेशा-दवानी माँगे तिश्ना-ए-ख़ून-ए-तमाशा जो वो पानी माँगे आइना रुख़्सत-ए-अंदाज़-ए-रवानी माँगे रंग ने गुल से दम-ए-अर्ज़-ए-परेशानी-ए-बज़्म बर्ग-ए-गुल रेज़ा-ए-मीना की निशानी माँगे ज़ुल्फ़ तहरीर-ए-परेशान-ए-तक़ाज़ा है मगर शाना-साँ मू-ब-ज़बाँ ख़ामा-ए-मानी माँगे आमद-ए-ख़त से न कर ख़ंदा-ए-शीरीं कि मबाद चश्म-ए-मोर आईना-ए-दिल निगरानी माँगे हूँ गिरफ़्तार-ए-कमीं-गाह-ए-तग़ाफ़ुल कि जहाँ ख़्वाब सय्याद से पर्वाज़-ए-गिरानी माँगे चश्म परवाज़ ओ नफ़स ख़ुफ़्ता मगर ज़ोफ़-ए-उमीद शहपर-ए-काह पए-मुज़्दा-रिसानी माँगे वहशत-ए-शोर-ए-तमाशा है कि जूँ निकहत-ए-गुल नमक-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर बाल-फ़िशानी माँगे गर मिले हज़रत-ए-'बेदिल' का ख़त-ए-लौह-ए-मज़ार 'असद' आईना-ए-पर्वाज़-ए-मआनी माँगे रंग ने गुल से दम-ए-अर्ज़-ए-परेशानी-ए-बज़्म बर्ग-ए-गुल रेज़ा-ए-मीना की निशानी माँगे
Related Ghazal
ऐसी सर्दी है कि सूरज भी दुहाई माँगे जो हो परदेस में वो किस सेे रज़ाई माँगे अपने हाकिम की फ़क़ीरी पर तरस आता है जो ग़रीबों से पसीने की कमाई माँगे अपने मुंसिफ़ की ज़िहानत पे मैं क़ुर्बान कि जो क़त्ल भी हम हो हमीं से ही वो सफ़ाई माँगे
Rahat Indori
25 likes
आशिक़ी में 'मीर' जैसे ख़्वाब मत देखा करो बावले हो जाओगे महताब मत देखा करो जस्ता जस्ता पढ़ लिया करना मज़ामीन-ए-वफ़ा पर किताब-ए-इश्क़ का हर बाब मत देखा करो इस तमाशे में उलट जाती हैं अक्सर कश्तियाँ डूबने वालों को ज़ेर-ए-आब मत देखा करो मय-कदे में क्या तकल्लुफ़ मय-कशी में क्या हिजाब बज़्म-ए-साक़ी में अदब आदाब मत देखा करो हम से दरवेशों के घर आओ तो यारों की तरह हर जगह ख़स-ख़ाना ओ बर्फ़ाब मत देखा करो माँगे-ताँगे की क़बाएँ देर तक रहती नहीं यार लोगों के लक़ब-अलक़ाब मत देखा करो तिश्नगी में लब भिगो लेना भी काफ़ी है 'फ़राज़' जाम में सहबा है या ज़हराब मत देखा करो
Ahmad Faraz
4 likes
बोले तो अच्छा बुरा महसूस हो उस की ख़ामोशी से क्या महसूस हो इस तरह दीवार पर तस्वीर रख आदमी बैठा हुआ महसूस हो दाम मुँह माँगे मिलेंगे और नक़्द क़त्ल लेकिन हादसा महसूस हो रख लिया अख़बार पैसों की जगह ताकि बटुआ कुछ भरा महसूस हो देखना चाहूँ उसे तो हर कोई मेरी जानिब' देखता महसूस हो पास जाने पर खुले प्यासे पे रेत दूर से पानी खड़ा महसूस हो
Nadir Ariz
3 likes
सिम्पल भोली भाली लड़की, हाए रे दोस्त के जैसी प्यारी लड़की, हाए रे एक शराबी बुत से माँगे व्हिस्की और व्हिस्की पीने वाली लड़की, हाए रे ये तो बिल्कुल सपने जैसी बात हुई जैसा सोचा वैसी लड़की, हाए रे बात मुसलसल करता रहता हूँ उस सेे मेरे यारों जैसी लड़की, हाए रे पतली खम्बे जैसी लड़की से तौबा लंबी चौड़ी भारी लड़की, हाए रे
Asad Akbarabadi
2 likes
बिन माँगे मिल रहा हो तो ख़्वाहिश फ़ुज़ूल है सूरज से रौशनी की गुज़ारिश फ़ुज़ूल है किसी ने कहा था टूटी हुई नाव में चलो दरिया के साथ आप की रंजिश फ़ुज़ूल है नाबूद के सुराग़ की सूरत निकालिए मौजूद की नुमूद ओ नुमाइश फ़ुज़ूल है मैं आप अपनी मौत की तय्यारियों में हूँ मेरे ख़िलाफ़ आप की साज़िश फ़ुज़ूल है ऐ आसमान तेरी इनायत बजा मगर फ़सलें पकी हुई हों तो बारिश फ़ुज़ूल है जी चाहता है कह दूँ ज़मीन ओ ज़माँ से मैं मंज़िल अगर नहीं है तो गर्दिश फ़ुज़ूल है इनआम-ए-नंग-ओ-नाम मिरे काम के नहीं मज्ज़ूब हूँ सो मेरी सताइश फ़ुज़ूल है
Shahid Zaki
1 likes
More from Mirza Ghalib
रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की इतराए क्यूँँ न ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह लोगों में क्यूँँ नुमूद न हो लाला-ज़ार की भूके नहीं हैं सैर-ए-गुलिस्ताँ के हम वले क्यूँँकर न खाइए कि हवा है बहार की
Mirza Ghalib
0 likes
हरीफ़-ए-मतलब-ए-मुश्किल नहीं फ़ुसून-ए-नियाज़ दुआ क़ुबूल हो या रब कि उम्र-ए-ख़िज़्र दराज़ न हो ब-हर्ज़ा बयाबाँ-नवर्द-ए-वहम-ए-वजूद हनूज़ तेरे तसव्वुर में है नशेब-ओ-फ़राज़ विसाल जल्वा तमाशा है पर दिमाग़ कहाँ कि दीजे आइना-ए-इन्तिज़ार को पर्दाज़ हर एक ज़र्रा-ए-आशिक़ है आफ़ताब-परस्त गई न ख़ाक हुए पर हवा-ए-जल्वा-ए-नाज़ न पूछ वुसअत-ए-मय-ख़ाना-ए-जुनूँ 'ग़ालिब' जहाँ ये कासा-ए-गर्दूं है एक ख़ाक-अंदाज़ फ़रेब-ए-सनअत-ए-ईजाद का तमाशा देख निगाह अक्स-फ़रोश ओ ख़याल आइना-साज़ ज़ि-बस-कि जल्वा-ए-सय्याद हैरत-आरा है उड़ी है सफ़्हा-ए-ख़ातिर से सूरत-ए-परवाज़ हुजूम-ए-फ़िक्र से दिल मिस्ल-ए-मौज लरज़े है कि शीशा नाज़ुक ओ सहबा-ए-आबगीन-गुदाज़ 'असद' से तर्क-ए-वफ़ा का गुमाँ वो मा'नी है कि खींचिए पर-ए-ताइर से सूरत-ए-परवाज़ हनूज़ ऐ असर-ए-दीद नंग-ए-रुस्वाई निगाह फ़ित्ना-ख़िराम ओ दर-ए-दो-आलम बाज़
Mirza Ghalib
0 likes
कब वो सुनता है कहानी मेरी और फिर वो भी ज़बानी मेरी ख़लिश-ए-ग़म्ज़ा-ए-ख़ूँ-रेज़ न पूछ देख ख़ूँनाबा-फ़िशानी मेरी क्या बयाँ कर के मिरा रोएँगे यार मगर आशुफ़्ता-बयानी मेरी हूँ ज़-ख़ुद रफ़्ता-ए-बैदा-ए-ख़याल भूल जाना है निशानी मेरी मुतक़ाबिल है मुक़ाबिल मेरा रुक गया देख रवानी मेरी क़द्र-ए-संग-ए-सर-ए-रह रखता हूँ सख़्त अर्ज़ां है गिरानी मेरी गर्द-बाद-ए-रह-ए-बेताबी हूँ सरसर-ए-शौक़ है बानी मेरी दहन उस का जो न मालूम हुआ खुल गई हेच मदानी मेरी कर दिया ज़ोफ़ ने आजिज़ 'ग़ालिब' नंग-ए-पीरी है जवानी मेरी
Mirza Ghalib
0 likes
मंज़ूर थी ये शक्ल तजल्ली को नूर की क़िस्मत खुली तिरे क़द-ओ-रुख़ से ज़ुहूर की इक ख़ूँ-चकाँ कफ़न में करोड़ों बनाओ हैं पड़ती है आँख तेरे शहीदों पे हूर की वाइ'ज़ न तुम पियो न किसी को पिला सको क्या बात है तुम्हारी शराब-ए-तहूर की लड़ता है मुझ से हश्र में क़ातिल कि क्यूँँ उठा गोया अभी सुनी नहीं आवाज़ सूर की आमद बहार की है जो बुलबुल है नग़्मा-संज उड़ती सी इक ख़बर है ज़बानी तुयूर की गो वाँ नहीं प वाँ के निकाले हुए तो हैं का'बे से इन बुतों को भी निस्बत है दूर की क्या फ़र्ज़ है कि सब को मिले एक सा जवाब आओ न हम भी सैर करें कोह-ए-तूर की गर्मी सही कलाम में लेकिन न इस क़दर की जिस से बात उस ने शिकायत ज़रूर की 'ग़ालिब' गर इस सफ़र में मुझे साथ ले चलें हज का सवाब नज़्र करूँँगा हुज़ूर की
Mirza Ghalib
0 likes
ज़िक्र मेरा ब-बदी भी उसे मंज़ूर नहीं ग़ैर की बात बिगड़ जाए तो कुछ दूर नहीं वादा-ए-सैर-ए-गुलिस्ताँ है ख़ुशा ताले-ए-शौक़ मुज़्दा-ए-क़त्ल मुक़द्दर है जो मज़कूर नहीं शाहिद-ए-हस्ती-ए-मुतलक़ की कमर है आलम लोग कहते हैं कि है पर हमें मंज़ूर नहीं क़तरा अपना भी हक़ीक़त में है दरिया लेकिन हम को तक़लीद-ए-तुनुक-ज़र्फ़ी-ए-मंसूर नहीं हसरत ऐ ज़ौक़-ए-ख़राबी कि वो ताक़त न रही इश्क़-ए-पुर-अरबदा की गूँ तन-ए-रंजूर नहीं मैं जो कहता हूँ कि हम लेंगे क़यामत में तुम्हें किस र'ऊनत से वो कहते हैं कि हम हूर नहीं ज़ुल्म कर ज़ुल्म अगर लुत्फ़ दरेग़ आता हो तू तग़ाफ़ुल में किसी रंग से मा'ज़ूर नहीं साफ़ दुर्दी-कश-ए-पैमाना-ए-जम हैं हम लोग वाए वो बादा कि अफ़्शुर्दा-ए-अंगूर नहीं हूँ ज़ुहूरी के मुक़ाबिल में ख़िफ़ाई 'ग़ालिब' मेरे दावे पे ये हुज्जत है कि मशहूर नहीं
Mirza Ghalib
2 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Mirza Ghalib.
Similar Moods
More moods that pair well with Mirza Ghalib's ghazal.







