नींद से आ कर बैठा है ख़्वाब मिरे घर बैठा है अक्स मिरा आईने में ले कर पत्थर बैठा है पलकें झुकी हैं सहरा की जिस पे समुंदर बैठा है एक बगूला यादों का खा कर चक्कर बैठा है उस की नींदों पर इक ख़्वाब तितली बन कर बैठा है रात की टेबल बुक कर के चाँद डिनर पर बैठा है अँधियारा ख़ामोशी की ओढ़ के चादर बैठा है 'आतिश' धूप गई कब की घर में क्यूँँकर बैठा है
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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो
Fazil Jamili
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सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो
Nida Fazli
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सो रहेंगे के जागते रहेंगे हम तेरे ख़्वाब देखते रहेंगे तू कही और ही ढूंढता रहेंगा हम कही और ही खिले रहेंगे राहगीरों ने राह बदलनी है पेड़ अपनी जगह खड़े रहेंगे सभी मौसम है दस्तरस में तेरी तू ने चाहा तो हम हरे रहेंगे लौटना कब है तू ने पर तुझ को आदतन ही पुकारते रहेंगे तुझ को पाने में मसअला ये है तुझ को खोने के वसवसे रहेंगे तू इधर देख मुझ सेे बातें कर यार चश्में तो फूटते रहेंगे एक मुद्दत हुई है तुझ सेे मिले तू तो कहता था राब्ते रहेंगे
Tehzeeb Hafi
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी
Kumar Vishwas
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यूँ मैं दिल का ख़याल रखता हूँ इस में तेरा ख़याल रखता हूँ तेरी मर्ज़ी का भी ख़याल नहीं तेरा इतना ख़याल रखता हूँ और मर जाता है वही बीमार जिस का अच्छा ख़याल रखता हूँ तुझ को फिर भी ख़राब होना है फिर भी तेरा ख़याल रखता हूँ
Swapnil Tiwari
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वो लौट आई है ऑफ़िस से हिज्र ख़त्म हुआ हमारे गाल पे इक किस से हिज्र ख़त्म हुआ फिर एक आग लगी जिस में वस्ल की थी चमक ख़याल-ए-यार की माचिस से हिज्र ख़त्म हुआ था बज़्म-ए-दुनिया में मुश्किल हमारा मिलना सो निकल के आ गए मज्लिस से हिज्र ख़त्म हुआ भली शराब है ये वस्ल नाम है उस का बस एक जाम पिया जिस से हिज्र ख़त्म हुआ तुम्हारे हिज्र में सौ वस्ल से गुज़र कर भी ये सोचता हूँ कहाँ किस से हिज्र ख़त्म हुआ
Swapnil Tiwari
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धूप के भीतर छुप कर निकली तारीकी सायों भर निकली रात गिरी थी इक गड्ढे में शाम का हाथ पकड़ कर निकली रोया उस से मिल कर रोया चाहत भेस बदल कर निकली फूल तो फूलों सा होना था तितली कैसी पत्थर निकली सूत हैं घर के हर कोने में मकड़ी पूरी बुन कर निकली ताज़ा-दम होने को उदासी ले कर ग़म का शावर निकली जाँ निकली उस के पहलू में वो ही मेरा मगहर निकली हिज्र की शब से घबराते थे यार यही शब बेहतर निकली जब भी चोर मिरे घर आए एक हँसी ही ज़ेवर निकली 'आतिश' कुंदन रूह मिली है उम्र की आग में जल कर निकली
Swapnil Tiwari
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ये धूप गिरी है जो मिरे लॉन में आ कर ले जाएगी जल्दी ही इसे शाम उठा कर सीने में छुपा शाम की आँखों से बचा कर इक लहर को हम लाए समुंदर से उठा कर हाँ वक़्त से पहले ही उड़ा देगी इसे सुब्ह रक्खी न गई चाँद से गर शब ये दबा कर इक सुब्ह भली सी मिरे नज़दीक से गुज़री मैं बैठा रहा हिज्र की इक रात बिछा कर फिर सुब्ह से ही आज अलम देख रहे हैं यादों की कोई फ़िल्म मिरे दिल में चला कर फिर चाय में बिस्कुट की तरह भूकी सी ये शाम खा जाएगी सूरज को समुंदर में डुबा कर
Swapnil Tiwari
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मज़ाक़ सहना नहीं है हँसी नहीं करनी उदास रहने में कोई कमी नहीं करनी ये ज़िंदगी जो पुकारे तो शक सा होता है कहीं अभी तो मुझे ख़ुद-कुशी नहीं करनी गुनाह-ए-इश्क़ रिहा होते ही करेंगे फिर गवाह बनना नहीं मुख़बिरी नहीं करनी बड़े ही ग़ुस्से में ये कह के उस ने वस्ल किया मुझे तो तुम से कोई बात ही नहीं करनी
Swapnil Tiwari
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