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धूप के भीतर छुप कर निकली तारीकी सायों भर निकली रात गिरी थी इक गड्ढे में शाम का हाथ पकड़ कर निकली रोया उस से मिल कर रोया चाहत भेस बदल कर निकली फूल तो फूलों सा होना था तितली कैसी पत्थर निकली सूत हैं घर के हर कोने में मकड़ी पूरी बुन कर निकली ताज़ा-दम होने को उदासी ले कर ग़म का शावर निकली जाँ निकली उस के पहलू में वो ही मेरा मगहर निकली हिज्र की शब से घबराते थे यार यही शब बेहतर निकली जब भी चोर मिरे घर आए एक हँसी ही ज़ेवर निकली 'आतिश' कुंदन रूह मिली है उम्र की आग में जल कर निकली

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा

Hasan Abbasi

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जुदाई का ज़माना यूँँ ठिकाने लग गया था बिछड़ कर उस सेे मैं लिखने लिखाने लग गया था तभी तो ज़ंग आलूदा हुई तलवार मेरी मैं दुश्मन पर मुहब्बत आज़माने लग गया था अभी समझा रहा था वो मुझे बोसे का मतलब कि मैं शहतूत के रस में नहाने लग गया था मोहब्बत हो नहीं पाई तो उस का क्या करूँँ मैं कि मैं तो उस गली में आने जाने लगे गया था तभी तो मेरी आँखों को नहीं रोने की आदत मैं छोटी उम्र में आँसू छुपाने लग गया था

Abbas Tabish

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आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं तुम ने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा यारों की मोहब्बत का यक़ीं कर लिया मैं ने फूलों में छुपाया हुआ ख़ंजर नहीं देखा महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनें जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा ख़त ऐसा लिखा है कि नगीने से जड़े हैं वो हाथ कि जिस ने कोई ज़ेवर नहीं देखा पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा

Bashir Badr

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कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया किस लिए जीते हैं हम किस के लिए जीते हैं बारहा ऐसे सवालात पे रोना आया कौन रोता है किसी और की ख़ातिर ऐ दोस्त सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया

Sahir Ludhianvi

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यूँ मैं दिल का ख़याल रखता हूँ इस में तेरा ख़याल रखता हूँ तेरी मर्ज़ी का भी ख़याल नहीं तेरा इतना ख़याल रखता हूँ और मर जाता है वही बीमार जिस का अच्छा ख़याल रखता हूँ तुझ को फिर भी ख़राब होना है फिर भी तेरा ख़याल रखता हूँ

Swapnil Tiwari

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वो लौट आई है ऑफ़िस से हिज्र ख़त्म हुआ हमारे गाल पे इक किस से हिज्र ख़त्म हुआ फिर एक आग लगी जिस में वस्ल की थी चमक ख़याल-ए-यार की माचिस से हिज्र ख़त्म हुआ था बज़्म-ए-दुनिया में मुश्किल हमारा मिलना सो निकल के आ गए मज्लिस से हिज्र ख़त्म हुआ भली शराब है ये वस्ल नाम है उस का बस एक जाम पिया जिस से हिज्र ख़त्म हुआ तुम्हारे हिज्र में सौ वस्ल से गुज़र कर भी ये सोचता हूँ कहाँ किस से हिज्र ख़त्म हुआ

Swapnil Tiwari

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ये धूप गिरी है जो मिरे लॉन में आ कर ले जाएगी जल्दी ही इसे शाम उठा कर सीने में छुपा शाम की आँखों से बचा कर इक लहर को हम लाए समुंदर से उठा कर हाँ वक़्त से पहले ही उड़ा देगी इसे सुब्ह रक्खी न गई चाँद से गर शब ये दबा कर इक सुब्ह भली सी मिरे नज़दीक से गुज़री मैं बैठा रहा हिज्र की इक रात बिछा कर फिर सुब्ह से ही आज अलम देख रहे हैं यादों की कोई फ़िल्म मिरे दिल में चला कर फिर चाय में बिस्कुट की तरह भूकी सी ये शाम खा जाएगी सूरज को समुंदर में डुबा कर

Swapnil Tiwari

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नींद से आ कर बैठा है ख़्वाब मिरे घर बैठा है अक्स मिरा आईने में ले कर पत्थर बैठा है पलकें झुकी हैं सहरा की जिस पे समुंदर बैठा है एक बगूला यादों का खा कर चक्कर बैठा है उस की नींदों पर इक ख़्वाब तितली बन कर बैठा है रात की टेबल बुक कर के चाँद डिनर पर बैठा है अँधियारा ख़ामोशी की ओढ़ के चादर बैठा है 'आतिश' धूप गई कब की घर में क्यूँँकर बैठा है

Swapnil Tiwari

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तुम्हारे शहर में मुझ ऐसे जंगली के लिए दरख़्त ही नहीं दिखते हैं ख़ुद-कुशी के लिए मैं रोज़ रात यही सोच कर तो सोता हूँ के कल से वक़्त निकालूँगा ज़िन्दगी के लिए वो लम्हा आ ही गया इंतिज़ार का लम्हा घड़ी भी बंद है पहले से इस घड़ी के

Swapnil Tiwari

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