वो लौट आई है ऑफ़िस से हिज्र ख़त्म हुआ हमारे गाल पे इक किस से हिज्र ख़त्म हुआ फिर एक आग लगी जिस में वस्ल की थी चमक ख़याल-ए-यार की माचिस से हिज्र ख़त्म हुआ था बज़्म-ए-दुनिया में मुश्किल हमारा मिलना सो निकल के आ गए मज्लिस से हिज्र ख़त्म हुआ भली शराब है ये वस्ल नाम है उस का बस एक जाम पिया जिस से हिज्र ख़त्म हुआ तुम्हारे हिज्र में सौ वस्ल से गुज़र कर भी ये सोचता हूँ कहाँ किस से हिज्र ख़त्म हुआ
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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?
Zubair Ali Tabish
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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
Rahat Indori
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यहाँ तुम देखना रुतबा हमारा हमारी रेत है दरिया हमारा किसी से कल पिताजी कह रहे थे मुहब्बत खा गई लड़का हमारा तअ'ल्लुक़ ख़त्म करने जा रही है कहीं गिरवा न दे बच्चा हमारा
Kushal Dauneria
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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है
Tehzeeb Hafi
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आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं तुम ने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा यारों की मोहब्बत का यक़ीं कर लिया मैं ने फूलों में छुपाया हुआ ख़ंजर नहीं देखा महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनें जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा ख़त ऐसा लिखा है कि नगीने से जड़े हैं वो हाथ कि जिस ने कोई ज़ेवर नहीं देखा पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा
Bashir Badr
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यूँ मैं दिल का ख़याल रखता हूँ इस में तेरा ख़याल रखता हूँ तेरी मर्ज़ी का भी ख़याल नहीं तेरा इतना ख़याल रखता हूँ और मर जाता है वही बीमार जिस का अच्छा ख़याल रखता हूँ तुझ को फिर भी ख़राब होना है फिर भी तेरा ख़याल रखता हूँ
Swapnil Tiwari
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तेरे मिलने का आख़िरी इम्कान जैसे मुझ में है एक नख़लिस्तान घर में लगता नहीं है जी मेरा दश्त में रह गया मिरा सामान रेत में सीपियाँ मिली हैं मुझे क्या समुंदर था पहले रेगिस्तान लौटे शायद इसी बहाने वो रख लिया मैं ने उस का कुछ सामान तू तिरे इर्द-गिर्द ही है कहीं हर तरफ़ ढूँढ़ हर जगह को छान दूर तक कोई भी नहीं दिल में आख़िरी शहर भी मिला वीरान किस ने फूँकी है जिस्म में साँसें किस ने छेड़ी है ज़िंदगी की तान ख़ाक हो जाएगा बदन 'आतिश' होंगे इक दिन धुआँ ये जिस्म ओ जान
Swapnil Tiwari
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किरन इक मो'जिज़ा सा कर गई है धनक कमरे में मेरे भर गई है उचक कर देखती थी नींद तुम को लो ये आँखों से गिर कर मर गई है ख़मोशी छुप रही है अब सदास ये बच्ची अजनबी से डर गई है खुले मिलते हैं मुझ को दर हमेशा मिरे हाथों में दस्तक भर गई है उसे कुछ अश्क लाने को कहा था कहाँ जा कर उदासी मर गई है उजालों में छुपी थी एक लड़की फ़लक का रंग-रोग़न कर गई है वो फिर उभरेगी थोड़ी साँस भरने नदी में लहर जो अंदर गई है
Swapnil Tiwari
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मज़ाक़ सहना नहीं है हँसी नहीं करनी उदास रहने में कोई कमी नहीं करनी ये ज़िंदगी जो पुकारे तो शक सा होता है कहीं अभी तो मुझे ख़ुद-कुशी नहीं करनी गुनाह-ए-इश्क़ रिहा होते ही करेंगे फिर गवाह बनना नहीं मुख़बिरी नहीं करनी बड़े ही ग़ुस्से में ये कह के उस ने वस्ल किया मुझे तो तुम से कोई बात ही नहीं करनी
Swapnil Tiwari
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नींद से आ कर बैठा है ख़्वाब मिरे घर बैठा है अक्स मिरा आईने में ले कर पत्थर बैठा है पलकें झुकी हैं सहरा की जिस पे समुंदर बैठा है एक बगूला यादों का खा कर चक्कर बैठा है उस की नींदों पर इक ख़्वाब तितली बन कर बैठा है रात की टेबल बुक कर के चाँद डिनर पर बैठा है अँधियारा ख़ामोशी की ओढ़ के चादर बैठा है 'आतिश' धूप गई कब की घर में क्यूँँकर बैठा है
Swapnil Tiwari
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