ghazalKuch Alfaaz

ये धूप गिरी है जो मिरे लॉन में आ कर ले जाएगी जल्दी ही इसे शाम उठा कर सीने में छुपा शाम की आँखों से बचा कर इक लहर को हम लाए समुंदर से उठा कर हाँ वक़्त से पहले ही उड़ा देगी इसे सुब्ह रक्खी न गई चाँद से गर शब ये दबा कर इक सुब्ह भली सी मिरे नज़दीक से गुज़री मैं बैठा रहा हिज्र की इक रात बिछा कर फिर सुब्ह से ही आज अलम देख रहे हैं यादों की कोई फ़िल्म मिरे दिल में चला कर फिर चाय में बिस्कुट की तरह भूकी सी ये शाम खा जाएगी सूरज को समुंदर में डुबा कर

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए

Khumar Barabankvi

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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नींद से आ कर बैठा है ख़्वाब मिरे घर बैठा है अक्स मिरा आईने में ले कर पत्थर बैठा है पलकें झुकी हैं सहरा की जिस पे समुंदर बैठा है एक बगूला यादों का खा कर चक्कर बैठा है उस की नींदों पर इक ख़्वाब तितली बन कर बैठा है रात की टेबल बुक कर के चाँद डिनर पर बैठा है अँधियारा ख़ामोशी की ओढ़ के चादर बैठा है 'आतिश' धूप गई कब की घर में क्यूँँकर बैठा है

Swapnil Tiwari

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यूँ मैं दिल का ख़याल रखता हूँ इस में तेरा ख़याल रखता हूँ तेरी मर्ज़ी का भी ख़याल नहीं तेरा इतना ख़याल रखता हूँ और मर जाता है वही बीमार जिस का अच्छा ख़याल रखता हूँ तुझ को फिर भी ख़राब होना है फिर भी तेरा ख़याल रखता हूँ

Swapnil Tiwari

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वो लौट आई है ऑफ़िस से हिज्र ख़त्म हुआ हमारे गाल पे इक किस से हिज्र ख़त्म हुआ फिर एक आग लगी जिस में वस्ल की थी चमक ख़याल-ए-यार की माचिस से हिज्र ख़त्म हुआ था बज़्म-ए-दुनिया में मुश्किल हमारा मिलना सो निकल के आ गए मज्लिस से हिज्र ख़त्म हुआ भली शराब है ये वस्ल नाम है उस का बस एक जाम पिया जिस से हिज्र ख़त्म हुआ तुम्हारे हिज्र में सौ वस्ल से गुज़र कर भी ये सोचता हूँ कहाँ किस से हिज्र ख़त्म हुआ

Swapnil Tiwari

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धूप के भीतर छुप कर निकली तारीकी सायों भर निकली रात गिरी थी इक गड्ढे में शाम का हाथ पकड़ कर निकली रोया उस से मिल कर रोया चाहत भेस बदल कर निकली फूल तो फूलों सा होना था तितली कैसी पत्थर निकली सूत हैं घर के हर कोने में मकड़ी पूरी बुन कर निकली ताज़ा-दम होने को उदासी ले कर ग़म का शावर निकली जाँ निकली उस के पहलू में वो ही मेरा मगहर निकली हिज्र की शब से घबराते थे यार यही शब बेहतर निकली जब भी चोर मिरे घर आए एक हँसी ही ज़ेवर निकली 'आतिश' कुंदन रूह मिली है उम्र की आग में जल कर निकली

Swapnil Tiwari

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मज़ाक़ सहना नहीं है हँसी नहीं करनी उदास रहने में कोई कमी नहीं करनी ये ज़िंदगी जो पुकारे तो शक सा होता है कहीं अभी तो मुझे ख़ुद-कुशी नहीं करनी गुनाह-ए-इश्क़ रिहा होते ही करेंगे फिर गवाह बनना नहीं मुख़बिरी नहीं करनी बड़े ही ग़ुस्से में ये कह के उस ने वस्ल किया मुझे तो तुम से कोई बात ही नहीं करनी

Swapnil Tiwari

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