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परिंदे सह में सह में उड़ रहे हैं बराबर में फ़रिश्ते उड़ रहे हैं ख़ुशी से कब ये तिनके उड़ रहे हैं हवा के डर के मारे उड़ रहे हैं कहीं कोई कमाँ ता'ने हुए है कबूतर आड़े-तिरछे उड़ रहे हैं तुम्हारा ख़त हवा में उड़ रहा है तआ'क़ुब में लिफ़ाफ़े उड़ रहे हैं बहुत कहती रही आँधी से चिड़िया कि पहली बार बच्चे उड़ रहे हैं शजर के सब्ज़ पत्तों की हवा से फ़ज़ा में ख़ुश्क पत्ते उड़ रहे हैं

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले

Anand Raj Singh

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे

Rahat Indori

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चलती साँसों को जाम करने लगा वो नज़र से कलाम करने लगा रात फ़रहाद ख़्वाब में आया और फ़र्शी सलाम करने लगा फिर मैं ज़हरीले कार-ख़ानों में ज़िंदा रहने का काम करने लगा साफ़ इनकार कर नहीं पाया वो मिरा एहतिराम करने लगा लैला घर में सिलाई करने लगी क़ैस दिल्ली में काम करने लगा हिज्र के माल से दिल-ए-नादाँ वस्ल का इंतिज़ाम करने लगा

Fahmi Badayuni

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जब रेतीले हो जाते हैं पर्वत टीले हो जाते हैं तोड़े जाते हैं जो शीशे वो नोकीले हो जाते हैं बाग़ धुएँ में रहता है तो फल ज़हरीले हो जाते हैं नादारी में आग़ोशों के बंधन ढीले हो जाते हैं फूलों को सुर्ख़ी देने में पत्ते पीले हो जाते हैं

Fahmi Badayuni

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मौत की सम्त जान चलती रही ज़िंदगी की दुकान चलती रही सारे किरदार सो गए थक कर बस तिरी दास्तान चलती रही मैं लरज़ता रहा हदफ़ बन कर मश्क़-ए-तीर-ओ-कमान चलती रही उल्टी सीधी चराग़ सुनते रहे और हवा की ज़बान चलती रही दो ही मौसम थे धूप या बारिश छतरियों की दुकान चलती रही जिस्म लम्बे थे चादरें छोटी रात भर खींच-तान चलती रही पर निकलते रहे बिखरते रहे ऊँची नीची उड़ान चलती रही

Fahmi Badayuni

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सहराओं ने माँगा पानी दरियाओं पर बरसा पानी बुनियादें कमज़ोर नहीं थीं दीवारों से आया पानी आख़िर किस किस नीम की जड़ में कब तक डालें मीठा पानी छत का हाल बता देता है परनाले से गिरता पानी फ़िक्र-ओ-मसाइल याद-ए-जानाँ गर्म हवाएँ ठंडा पानी प्यासे बच्चे खेल रहे हैं मछली मछली कितना पानी

Fahmi Badayuni

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चारासाज़ों के बस की बात नहीं मैं दवाओं के बस की बात नहीं चाहता हूँ मैं दीमकों से नजात जो किताबों के बस की बात नहीं तेरी ख़ुशबू को क़ैद में रखना इत्रदानों के बस की बात नहीं ख़त्म कर दे अज़ाब क़ब्रों का ताज-महलों के बस की बात नहीं आँसुओं में जो झिलमिलाहट है वो सितारों के बस की बात नहीं ऐसा लगता है अब तेरा दीदार सिर्फ़ आँखों के बस की बात नहीं

Fahmi Badayuni

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