ghazalKuch Alfaaz

फिर मिरे सर पे कड़ी धूप की बौछार गिरी मैं जहाँ जा के छुपा था वहीं दीवार गिरी लोग क़िस्तों में मुझे क़त्ल करेंगे शायद सब से पहले मिरी आवाज़ पे तलवार गिरी और कुछ देर मिरी आस न टूटी होती आख़िरी मौज थी जब हाथ से पतवार गिरी अगले वक़्तों में सुनेंगे दर-ओ-दीवार मुझे मेरी हर चीख़ मिरे अहद के उस पार गिरी ख़ुद को अब गर्द के तूफ़ाँ से बचाओ 'क़ैसर' तुम बहुत ख़ुश थे कि हम-साए की दीवार गिरी

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए

Yasir Khan

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थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री तुम ने तो बस पानी भरना छोड़ दिया लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है जब से मैं ने जंगल जाना छोड़ दिया बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए

Tehzeeb Hafi

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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मुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है आज तुम को देख कर बहुत निखर सँवर गए हो ख़ुश रहो उदास हो किसी की बे-वफ़ाई पर वफ़ा कहीं तो कर गए हो ख़ुश रहो गली में और लोग भी थे आश्ना हमें सलाम कर गए हो ख़ुश रहो तुम्हें तो मेरी दोस्ती पे नाज़ था इसी से अब मुकर गए हो ख़ुश रहो किसी की ज़िन्दगी बनो कि बंदगी मिरे लिए तो मर गए हो ख़ुश रहो

Fazil Jamili

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दीवारों से मिल कर रोना अच्छा लगता है हम भी पागल हो जाएँगे ऐसा लगता है कितने दिनों के प्यासे होंगे यारो सोचो तो शबनम का क़तरा भी जिन को दरिया लगता है आँखों को भी ले डूबा ये दिल का पागल-पन आते जाते जो मिलता है तुम सा लगता है इस बस्ती में कौन हमारे आँसू पोंछेगा जो मिलता है उस का दामन भीगा लगता है दुनिया भर की यादें हम से मिलने आती हैं शाम ढले इस सूने घर में मेला लगता है किस को पत्थर मारूँ 'क़ैसर' कौन पराया है शीश-महल में इक इक चेहरा अपना लगता है

Qaisar-ul-Jafri

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तिरी गली में तमाशा किए ज़माना हुआ फिर इस के बा'द न आना हुआ न जाना हुआ कुछ इतना टूट के चाहा था मेरे दिल ने उसे वो शख़्स मेरी मुरव्वत में बे-वफ़ा न हुआ हवा ख़फ़ा थी मगर इतनी संग-दिल भी न थी हमीं को शम्अ' जलाने का हौसला न हुआ मिरे ख़ुलूस की सैक़ल-गरी भी हार गई वो जाने कौन सा पत्थर था आईना न हुआ मैं ज़हर पीता रहा ज़िंदगी के हाथों से ये और बात है मेरा बदन हरा न हुआ शुऊ'र चाहिए तरतीब-ए-ख़ार-ओ-ख़स के लिए क़फ़स को तोड़ के रक्खा तो आशियाना हुआ हमारे गाँव की मिट्टी ही रेत जैसी थी ये एक रात का सैलाब तो बहाना हुआ किसी के साथ गईं दिल की धड़कनें 'क़ैसर' फिर इस के बा'द मोहब्बत का हादिसा न हुआ

Qaisar-ul-Jafri

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चाँदनी था कि ग़ज़ल था कि सबा था क्या था मैं ने इक बार तिरा नाम सुना था क्या था अब के बिछड़े हैं तो लगता है कि कुछ टूट गया मेरा दिल था कि तिरा अहद-ए-वफ़ा था क्या था ख़ुद-कुशी कर के भी बिस्तर से उठा हूँ ज़िंदा मैं ने कल रात को जो ज़हर पिया था क्या था तुम तो कहते थे ख़ुदा तुम से ख़फ़ा है 'क़ैसर' डूबते वक़्त वो जो इक हाथ बढ़ा था क्या था

Qaisar-ul-Jafri

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काग़ज़ काग़ज़ धूल उड़ेगी फ़न बंजर हो जाएगा जिस दिन सूखे दिल के आँसू सब पत्थर हो जाएगा टूटेंगी जब नींद से पलकें सो जाऊँगा चुपके से जिस जंगल में रात पड़ेगी मेरा घर हो जाएगा ख़्वाबों के ये पंछी कब तक शोर करेंगे पलकों पर शाम ढलेगी और सन्नाटा शाख़ों पर हो जाएगा रात क़लम ले कर आएगी इतनी सियाही छिड़केगी दिन का सारा मंज़र-नामा बे-मंज़र हो जाएगा नाख़ुन से भी ईंट कुरेदें मिल-जुल कर हम-साए तो आँगन की दीवार न टूटे लेकिन दर हो जाएगा 'क़ैसर' रो लो ग़ज़लें कह लो बाक़ी है कुछ दर्द अभी अगली रुतों में यूँँ लगता है सब पत्थर हो जाएगा

Qaisar-ul-Jafri

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मायूसी की बर्फ़ पड़ी थी लेकिन मौसम सर्द न था आज से पहले दिल में यारो! इतना ठंडा दर्द न था तन्हाई की बोझल रातें पहले भी तो बरसी थीं ज़ख़्म नहीं थे इतने क़ातिल ग़म इतना बे-दर्द न था फिरते हैं अब रुस्वा होते कल तक ये रफ़्तार न थी शहर में थीं सौ कू-ए-मलामत दिल आवारा-गर्द न था मरने पर भी लौ देती थी दीवाने के दिल की आग पथराई थीं आँखें लेकिन फूल सा चेहरा ज़र्द न था हर्फ़-ए-तसल्ली मौज-ए-हवा थे मौज-ए-हवा से होता क्या सीने का पत्थर था 'क़ैसर', ग़म दामन की गर्द न था

Qaisar-ul-Jafri

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