रात-रात भर जगने वाले तेरी ख़ैर आसमान को तकने वाले तेरी ख़ैर उस की सब तस्वीरें घर से बाहर फेंक ख़ुद दीवार से लगने वाले तेरी ख़ैर वक़्त हमेशा एक सा थोड़ी रहता है मेरे ऊपर हँसने वाले तेरी ख़ैर वो ख़त में आयात लिखा करती थी और लिखती थी कि पढ़ने वाले तेरी ख़ैर
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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तेरी मुश्किल न बढ़ाऊँगा चला जाऊँगा अश्क आँखों में छुपाऊँगा चला जाऊँगा अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे जैसे ही होश में आऊँगा चला जाऊँगा ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई मैं तो आवाज़ लगाऊँगा चला जाऊँगा चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं उन को सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा मुद्दतों बा'द मैं आया हूँ पुराने घर में ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन' हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
Hasan Abbasi
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जिस तरह वक़्त गुज़रने के लिए होता है आदमी शक्ल पे मरने के लिए होता है तेरी आँखों से मुलाक़ात हुई तब ये खुला डूबने वाला उभरने के लिए होता है इश्क़ क्यूँँ पीछे हटा बात निभाने से मियाँ हुस्न तो ख़ैर मुकरने के लिए होता है आँख होती है किसी राह को तकने के लिए दिल किसी पाँव पे धरने के लिए होता है दिल की दिल्ली का चुनाव ही अलग है साहब जब भी होता है ये हरने के लिए होता है कोई बस्ती हो उजड़ने के लिए बसती है कोई मज़मा हो बिखरने के लिए होता है
Ali Zaryoun
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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा
Tehzeeb Hafi
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बरसों पुराना दोस्त मिला जैसे ग़ैर हो देखा रुका झिझक के कहा तुम उमैर हो मिलते हैं मुश्किलों से यहाँ हम-ख़याल लोग तेरे तमाम चाहने वालों की ख़ैर हो कमरे में सिगरेटों का धुआँ और तेरी महक जैसे शदीद धुंध में बाग़ों की सैर हो हम मुत्मइन बहुत हैं अगर ख़ुश नहीं भी हैं तुम ख़ुश हो क्या हुआ जो हमारे बग़ैर हो पैरों में उस के सर को धरें इल्तिजा करें इक इल्तिजा कि जिस का न सर हो न पैर हो
Umair Najmi
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हालात इस कदर न थे दुश्वार ठीक थे चारागरी से क़ब्ल ये बीमार ठीक थे बेकार हो गए हुए हैं जब से कार-गर इस सेे तो मेरी जान हम बेकार ठीक थे उस पार लग रहा था कि इस पार मौज है इस पार सोचते हैं कि उस पार ठीक थे थे यूँँ भी अपने चाहने वाले बहुत कि हम इंसान तो जैसे भी थे फ़नकार ठीक थे
Vashu Pandey
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हम को मुश्किल में रहने दे चारा-गर आसानी से मर जाऍंगे समझा कर अव्वल अव्वल हम भी तेरे जैसे थे हम भी ख़ुश होते थे देख के ख़ुश मंज़र नक़्ल-मकानी शौक़ नहीं मजबूरी थी मैं घर से न चलता कैसे चलता घर उन को बस तन्क़ीद ही करनी होती है उन को क्या मालूम ग़ज़ल के पस मंज़र
Vashu Pandey
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वो दर बने या राह की दीवार ख़ुश रहे मैं बस ये चाहता हूँ मेरा यार ख़ुश रहे ऐसा कोई नहीं कि जिसे कोई ग़म नहीं ऐसा कोई नहीं जो लगातार ख़ुश रहे मेहमान रह गया है ये बस चंद रोज़ का कोशिश ये कीजिएगा कि बीमार ख़ुश रहे
Vashu Pandey
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उम्र भर यूँँ ही जलते रहे रौशनी भी नहीं कर सके गाँव करना था रौशन हमें इक गली भी नहीं कर सके हम को इतना डराया गया मेरे मौला तेरे नाम से तेरे बंदे कभी ठीक से बंदगी भी नहीं कर सके बेख़ुदी में उठे थे क़दम आ फँसे ऐसे रस्ते पे हम मंज़िलें भी नहीं मिल सकी वापसी भी नहीं कर सके छोटे घर के बड़े थे सो हम ज़िम्मेदारी निभाते रहे आशिक़ी तो बड़ी बात थी ख़ुद-कुशी भी नहीं कर सके काम दो ही थे करने हमें आशिक़ी या तो फिर शा'इरी आशिक़ी भी नहीं कर सके शा'इरी भी नहीं कर सके
Vashu Pandey
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यूँँ भी कटने लगा हूँ अब मैं ग़ैर-मुनासिब यारों से बारिश वफ़ा नहीं कर सकती मिट्टी की दीवारों से दुखे हुए लोगों की दुखती रग को छूना ठीक नहीं वक़्त नहीं पूछा करते हैं यारों वक़्त के मारों से आशिक़ हैं तो आशिक़ वाले जलवे भी दिखलाएँ आप कपड़े फाड़ें ख़ाक़ उड़ाएँ सर मारें दीवारों से और चमन गर अपना है तो इस का सब कुछ अपना है बेशक फूल पे फूल लुटाएँ ख़ार न खाएँ ख़ारों से
Vashu Pandey
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