ghazalKuch Alfaaz

उम्र भर यूँँ ही जलते रहे रौशनी भी नहीं कर सके गाँव करना था रौशन हमें इक गली भी नहीं कर सके हम को इतना डराया गया मेरे मौला तेरे नाम से तेरे बंदे कभी ठीक से बंदगी भी नहीं कर सके बेख़ुदी में उठे थे क़दम आ फँसे ऐसे रस्ते पे हम मंज़िलें भी नहीं मिल सकी वापसी भी नहीं कर सके छोटे घर के बड़े थे सो हम ज़िम्मेदारी निभाते रहे आशिक़ी तो बड़ी बात थी ख़ुद-कुशी भी नहीं कर सके काम दो ही थे करने हमें आशिक़ी या तो फिर शा'इरी आशिक़ी भी नहीं कर सके शा'इरी भी नहीं कर सके

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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जो तेरे साथ रहते हुए सोगवार हो लानत हो ऐसे शख़्स पे और बेशुमार हो अब इतनी देर भी ना लगा, ये हो ना कहीं तू आ चुका हो और तेरा इंतिज़ार हो मैं फूल हूँ तो फिर तेरे बालो में क्यूँ नहीं हूँ तू तीर है तो मेरे कलेजे के पार हो एक आस्तीन चढ़ाने की आदत को छोड़ कर ‘हाफ़ी’ तुम आदमी तो बहुत शानदार हो

Tehzeeb Hafi

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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ख़ाली बैठे हो तो इक काम मेरा कर दो ना मुझ को अच्छा सा कोई ज़ख़्म अदा कर दो ना ध्यान से पंछियों को देते हो दाना पानी इतने अच्छे हो तो पिंजरे से रिहा कर दो ना जब क़रीब आ ही गए हो तो उदासी कैसी जब दिया दे ही रहे हो तो जला कर दो ना

Zubair Ali Tabish

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हालात इस कदर न थे दुश्वार ठीक थे चारागरी से क़ब्ल ये बीमार ठीक थे बेकार हो गए हुए हैं जब से कार-गर इस सेे तो मेरी जान हम बेकार ठीक थे उस पार लग रहा था कि इस पार मौज है इस पार सोचते हैं कि उस पार ठीक थे थे यूँँ भी अपने चाहने वाले बहुत कि हम इंसान तो जैसे भी थे फ़नकार ठीक थे

Vashu Pandey

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वो दर बने या राह की दीवार ख़ुश रहे मैं बस ये चाहता हूँ मेरा यार ख़ुश रहे ऐसा कोई नहीं कि जिसे कोई ग़म नहीं ऐसा कोई नहीं जो लगातार ख़ुश रहे मेहमान रह गया है ये बस चंद रोज़ का कोशिश ये कीजिएगा कि बीमार ख़ुश रहे

Vashu Pandey

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हम को मुश्किल में रहने दे चारा-गर आसानी से मर जाऍंगे समझा कर अव्वल अव्वल हम भी तेरे जैसे थे हम भी ख़ुश होते थे देख के ख़ुश मंज़र नक़्ल-मकानी शौक़ नहीं मजबूरी थी मैं घर से न चलता कैसे चलता घर उन को बस तन्क़ीद ही करनी होती है उन को क्या मालूम ग़ज़ल के पस मंज़र

Vashu Pandey

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ये लगभग ग़ैर-मुमकिन है ख़ुदाया पर निकल जाए चराग़ों के दिमाग़ों से हवा का डर निकल जाए इसी डर से सफ़र भर में कहीं आँखें नहीं झपकी कहीं ऐसा न हो ग़लती से तेरा घर निकल जाए तरीक़ा एक ही है बस सुकूँ पाने का दुनिया में यहाँ से दिल निकल जाए यहाँ से सर निकल जाए

Vashu Pandey

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यूँँ भी कटने लगा हूँ अब मैं ग़ैर-मुनासिब यारों से बारिश वफ़ा नहीं कर सकती मिट्टी की दीवारों से दुखे हुए लोगों की दुखती रग को छूना ठीक नहीं वक़्त नहीं पूछा करते हैं यारों वक़्त के मारों से आशिक़ हैं तो आशिक़ वाले जलवे भी दिखलाएँ आप कपड़े फाड़ें ख़ाक़ उड़ाएँ सर मारें दीवारों से और चमन गर अपना है तो इस का सब कुछ अपना है बेशक फूल पे फूल लुटाएँ ख़ार न खाएँ ख़ारों से

Vashu Pandey

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