ये लगभग ग़ैर-मुमकिन है ख़ुदाया पर निकल जाए चराग़ों के दिमाग़ों से हवा का डर निकल जाए इसी डर से सफ़र भर में कहीं आँखें नहीं झपकी कहीं ऐसा न हो ग़लती से तेरा घर निकल जाए तरीक़ा एक ही है बस सुकूँ पाने का दुनिया में यहाँ से दिल निकल जाए यहाँ से सर निकल जाए
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बा'द में मुझ से ना कहना घर पलटना ठीक है वैसे सुनने में यही आया है रस्ता ठीक है शाख से पत्ता गिरे, बारिश रुके, बादल छटें मैं ही तो सब कुछ ग़लत करता हूँ अच्छा ठीक है जेहन तक तस्लीम कर लेता है उस की बरतरी आँख तक तस्दीक़ कर देती है बंदा ठीक है एक तेरी आवाज़ सुनने के लिए ज़िंदा है हम तू ही जब ख़ामोश हो जाए तो फिर क्या ठीक है
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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अब मेरे साथ नहीं है समझे ना समझाने की बात नहीं है समझे ना तुम माँगोगे और तुम्हें मिल जाएगा प्यार है ये ख़ैरात नहीं है समझे ना मैं बादल हूँ जिस पर चाहूँ बरसूँगा मेरी कोई ज़ात नहीं है समझे ना अपना ख़ाली हाथ मुझे मत दिखलाओ इस में मेरा हाथ नहीं है समझे ना
Zubair Ali Tabish
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हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए
Yasir Khan
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बिछड़ कर उस का दिल लग भी गया तो क्या लगेगा वो थक जाएगा और मेरे गले से आ लगेगा मैं मुश्किल में तुम्हारे काम आऊँ या ना आऊँ मुझे आवाज़ दे लेना तुम्हें अच्छा लगेगा मैं जिस कोशिश से उस को भूल जाने में लगा हूँ ज़्यादा भी अगर लग जाए तो हफ़्ता लगेगा
Tehzeeb Hafi
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हालात इस कदर न थे दुश्वार ठीक थे चारागरी से क़ब्ल ये बीमार ठीक थे बेकार हो गए हुए हैं जब से कार-गर इस सेे तो मेरी जान हम बेकार ठीक थे उस पार लग रहा था कि इस पार मौज है इस पार सोचते हैं कि उस पार ठीक थे थे यूँँ भी अपने चाहने वाले बहुत कि हम इंसान तो जैसे भी थे फ़नकार ठीक थे
Vashu Pandey
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वो दर बने या राह की दीवार ख़ुश रहे मैं बस ये चाहता हूँ मेरा यार ख़ुश रहे ऐसा कोई नहीं कि जिसे कोई ग़म नहीं ऐसा कोई नहीं जो लगातार ख़ुश रहे मेहमान रह गया है ये बस चंद रोज़ का कोशिश ये कीजिएगा कि बीमार ख़ुश रहे
Vashu Pandey
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हम को मुश्किल में रहने दे चारा-गर आसानी से मर जाऍंगे समझा कर अव्वल अव्वल हम भी तेरे जैसे थे हम भी ख़ुश होते थे देख के ख़ुश मंज़र नक़्ल-मकानी शौक़ नहीं मजबूरी थी मैं घर से न चलता कैसे चलता घर उन को बस तन्क़ीद ही करनी होती है उन को क्या मालूम ग़ज़ल के पस मंज़र
Vashu Pandey
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यूँँ भी कटने लगा हूँ अब मैं ग़ैर-मुनासिब यारों से बारिश वफ़ा नहीं कर सकती मिट्टी की दीवारों से दुखे हुए लोगों की दुखती रग को छूना ठीक नहीं वक़्त नहीं पूछा करते हैं यारों वक़्त के मारों से आशिक़ हैं तो आशिक़ वाले जलवे भी दिखलाएँ आप कपड़े फाड़ें ख़ाक़ उड़ाएँ सर मारें दीवारों से और चमन गर अपना है तो इस का सब कुछ अपना है बेशक फूल पे फूल लुटाएँ ख़ार न खाएँ ख़ारों से
Vashu Pandey
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अपना पूरा ज़ोर लगा कर बोल मोहब्बत ज़िन्दाबाद नफ़रत की दीवार गिरा कर बोल मोहब्बत ज़िन्दाबाद इश्क़ के मुनकिर पूछ रहे हैं पहले गर्दन देगा कौन अब तो दोनों हाथ उठा कर बोल मोहब्बत ज़िन्दाबाद तेरी चुप्पी ये साबित कर देगी कि तू बुज़दिल है वरना आँख से आँख मिलाकर बोल मोहब्बत ज़िन्दाबाद इस धरती से उस अंबर तक एक ही नारा गूँजेगा मेरे संग आवाज़ मिलाकर बोल मोहब्बत ज़िन्दाबाद
Vashu Pandey
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