ghazalKuch Alfaaz

हम को मुश्किल में रहने दे चारा-गर आसानी से मर जाऍंगे समझा कर अव्वल अव्वल हम भी तेरे जैसे थे हम भी ख़ुश होते थे देख के ख़ुश मंज़र नक़्ल-मकानी शौक़ नहीं मजबूरी थी मैं घर से न चलता कैसे चलता घर उन को बस तन्क़ीद ही करनी होती है उन को क्या मालूम ग़ज़ल के पस मंज़र

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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर

Anwar Shaoor

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ज़ने हसीन थी और फूल चुन कर लाती थी मैं शे'र कहता था, वो दास्ताँ सुनाती थी अरब लहू था रगों में, बदन सुनहरा था वो मुस्कुराती नहीं थी, दीए जलाती थी "अली से दूर रहो", लोग उस सेे कहते थे "वो मेरा सच है", बहुत चीख कर बताती थी "अली ये लोग तुम्हें जानते नहीं हैं अभी" गले लगाकर मेरा हौसला बढ़ाती थी ये फूल देख रहे हो, ये उस का लहजा था ये झील देख रहे हो, यहाँ वो आती थी मैं उस के बा'द कभी ठीक से नहीं जागा वो मुझ को ख़्वाब नहीं नींद से जगाती थी उसे किसी से मोहब्बत थी और वो मैं नहीं था ये बात मुझ सेे ज़्यादा उसे रूलाती थी मैं कुछ बता नहीं सकता वो मेरी क्या थी "अली" कि उस को देख कर बस अपनी याद आती थी

Ali Zaryoun

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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उस के हाथों में जो ख़ंजर है ज़्यादा तेज है और फिर बचपन से ही उस का निशाना तेज है जब कभी उस पार जाने का ख़याल आता मुझे कोई आहिस्ता से कहता था की दरिया तेज है आज मिलना था बिछड़ जाने की निय्यत से हमें आज भी वो देर से पहुँचा है कितना तेज है अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास मैं तुम्हें कहता भी रहता की दुनिया तेज है आज उस के गाल चू में हैं तो अंदाज़ा हुआ चाय अच्छी है मगर थोडा सा मीठा तेज है

Tehzeeb Hafi

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बिछड़ कर उस का दिल लग भी गया तो क्या लगेगा वो थक जाएगा और मेरे गले से आ लगेगा मैं मुश्किल में तुम्हारे काम आऊँ या ना आऊँ मुझे आवाज़ दे लेना तुम्हें अच्छा लगेगा मैं जिस कोशिश से उस को भूल जाने में लगा हूँ ज़्यादा भी अगर लग जाए तो हफ़्ता लगेगा

Tehzeeb Hafi

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वो दर बने या राह की दीवार ख़ुश रहे मैं बस ये चाहता हूँ मेरा यार ख़ुश रहे ऐसा कोई नहीं कि जिसे कोई ग़म नहीं ऐसा कोई नहीं जो लगातार ख़ुश रहे मेहमान रह गया है ये बस चंद रोज़ का कोशिश ये कीजिएगा कि बीमार ख़ुश रहे

Vashu Pandey

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हालात इस कदर न थे दुश्वार ठीक थे चारागरी से क़ब्ल ये बीमार ठीक थे बेकार हो गए हुए हैं जब से कार-गर इस सेे तो मेरी जान हम बेकार ठीक थे उस पार लग रहा था कि इस पार मौज है इस पार सोचते हैं कि उस पार ठीक थे थे यूँँ भी अपने चाहने वाले बहुत कि हम इंसान तो जैसे भी थे फ़नकार ठीक थे

Vashu Pandey

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उम्र भर यूँँ ही जलते रहे रौशनी भी नहीं कर सके गाँव करना था रौशन हमें इक गली भी नहीं कर सके हम को इतना डराया गया मेरे मौला तेरे नाम से तेरे बंदे कभी ठीक से बंदगी भी नहीं कर सके बेख़ुदी में उठे थे क़दम आ फँसे ऐसे रस्ते पे हम मंज़िलें भी नहीं मिल सकी वापसी भी नहीं कर सके छोटे घर के बड़े थे सो हम ज़िम्मेदारी निभाते रहे आशिक़ी तो बड़ी बात थी ख़ुद-कुशी भी नहीं कर सके काम दो ही थे करने हमें आशिक़ी या तो फिर शा'इरी आशिक़ी भी नहीं कर सके शा'इरी भी नहीं कर सके

Vashu Pandey

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रात-रात भर जगने वाले तेरी ख़ैर आसमान को तकने वाले तेरी ख़ैर उस की सब तस्वीरें घर से बाहर फेंक ख़ुद दीवार से लगने वाले तेरी ख़ैर वक़्त हमेशा एक सा थोड़ी रहता है मेरे ऊपर हँसने वाले तेरी ख़ैर वो ख़त में आयात लिखा करती थी और लिखती थी कि पढ़ने वाले तेरी ख़ैर

Vashu Pandey

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यूँँ भी कटने लगा हूँ अब मैं ग़ैर-मुनासिब यारों से बारिश वफ़ा नहीं कर सकती मिट्टी की दीवारों से दुखे हुए लोगों की दुखती रग को छूना ठीक नहीं वक़्त नहीं पूछा करते हैं यारों वक़्त के मारों से आशिक़ हैं तो आशिक़ वाले जलवे भी दिखलाएँ आप कपड़े फाड़ें ख़ाक़ उड़ाएँ सर मारें दीवारों से और चमन गर अपना है तो इस का सब कुछ अपना है बेशक फूल पे फूल लुटाएँ ख़ार न खाएँ ख़ारों से

Vashu Pandey

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