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shikasta-hal sa be-asra sa lagta hai ye shahr dil se ziyada dukha sa lagta hai har ik ke saath koi vaqia sa lagta hai jise bhi dekho vo khoya hua sa lagta hai zamin hai so vo apni gardishon men kahin jo chand hai so vo tuuta hua sa lagta hai mere vatan pe utarte hue andheron ko jo tum kaho mujhe qahr-e-khuda sa lagta hai jo shaam aai to phir shaam ka laga darbar jo din hua to vo din karbala sa lagta hai ye raat kha gai ik ek kar ke saare charaghh jo rah gaya hai vo bujhta hua sa lagta hai dua karo ki main us ke liye dua ho jaun vo ek shakhs jo dil ko dua sa lagta hai to dil men bujhne si lagti hai kaenat tamam kabhi kabhi jo mujhe tu bujha sa lagta hai jo aa rahi hai sada ghhaur se suno us ko ki is sada men khuda bolta sa lagta hai abhi kharid len duniya kahan ki mahngi hai magar zamir ka sauda bura sa lagta hai ye maut hai ya koi akhiri visal ke baad ajab sukun men soya hua sa lagta hai hava-e-rang-e-do-alam men jagti hui lai 'alim' hi kahin naghhma-sara sa lagta hai shikasta-haal sa be-asra sa lagta hai ye shahr dil se ziyaada dukha sa lagta hai har ek ke sath koi waqia sa lagta hai jise bhi dekho wo khoya hua sa lagta hai zamin hai so wo apni gardishon mein kahin jo chand hai so wo tuta hua sa lagta hai mere watan pe utarte hue andheron ko jo tum kaho mujhe qahr-e-khuda sa lagta hai jo sham aai to phir sham ka laga darbar jo din hua to wo din karbala sa lagta hai ye raat kha gai ek ek kar ke sare charagh jo rah gaya hai wo bujhta hua sa lagta hai dua karo ki main us ke liye dua ho jaun wo ek shakhs jo dil ko dua sa lagta hai to dil mein bujhne si lagti hai kaenat tamam kabhi kabhi jo mujhe tu bujha sa lagta hai jo aa rahi hai sada ghaur se suno us ko ki is sada mein khuda bolta sa lagta hai abhi kharid len duniya kahan ki mahngi hai magar zamir ka sauda bura sa lagta hai ye maut hai ya koi aakhiri visal ke baad ajab sukun mein soya hua sa lagta hai hawa-e-rang-e-do-alam mein jagti hui lai 'alim' hi kahin naghma-sara sa lagta hai

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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मेरे बस में नहीं वरना क़ुदरत का लिखा हुआ काटता तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता लारियों से ज़्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता मैं ने भी ज़िंदगी और शब ए हिज्र काटी है सबकी तरह वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने क्या ख़ुशी रह गई थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो जेल में तेरी तस्वीर होती तो हँसकर सज़ा काटता

Tehzeeb Hafi

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पागल कैसे हो जाते हैं देखो ऐसे हो जाते हैं ख़्वाबों का धंधा करती हो कितने पैसे हो जाते हैं दुनिया सा होना मुश्किल है तेरे जैसे हो जाते हैं मेरे काम ख़ुदा करता है तेरे वैसे हो जाते हैं

Ali Zaryoun

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तुम्हें बस ये बताना चाहता हूँ मैं तुम से क्या छुपाना चाहता हूँ कभी मुझ से भी कोई झूठ बोलो मैं हाँ में हाँ मिलाना चाहता हूँ ये जो खिड़की है नक़्शे में तुम्हारे यहाँ मैं दर बनाना चाहता हूँ अदाकारी बहुत दुख दे रही है मैं सच-मुच मुस्कुराना चाहता हूँ परों में तीर है पंजों में तिनके मैं ये चिड़िया उड़ाना चाहता हूँ लिए बैठा हूँ घुँघरू फूल मोती तिरा हँसना बनाना चाहता हूँ अमीरी इश्क़ की तुम को मुबारक मैं बस खाना-कमाना चाहता हूँ मैं सारे शहर की बैसाखियों को तिरे दर पर नचाना चाहता हूँ मुझे तुम सेे बिछड़ना ही पड़ेगा मैं तुम को याद आना चाहता हूँ

Fahmi Badayuni

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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का

Waseem Barelvi

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अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए मिले हैं यूँँ तो बहुत आओ अब मिलें यूँँ भी कि रूह गर्मी-ए-अनफ़ास से पिघल जाए मोहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाए ज़हे वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा-तर में रहे ख़ोशा वो उम्र जो ख़्वाबों ही में बहल जाए मैं वो चराग़ सर-ए-रहगुज़ार-ए-दुनिया हूँ जो अपनी ज़ात की तन्हाइयों में जल जाए हर एक लहजा यही आरज़ू यही हसरत जो आग दिल में है वो शे'र में भी ढल जाए

Obaidullah Aleem

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वो रात बे-पनाह थी और मैं ग़रीब था वो जिस ने ये चराग़ जलाया अजीब था वो रौशनी कि आँख उठाई नहीं गई कल मुझ से मेरा चाँद बहुत ही क़रीब था देखा मुझे तो तब्अ रवाँ हो गई मिरी वो मुस्कुरा दिया तो मैं शाइ'र अदीब था रखता न क्यूँँ मैं रूह ओ बदन उस के सामने वो यूँँ भी था तबीब वो यूँँ भी तबीब था हर सिलसिला था उस का ख़ुदा से मिला हुआ चुप हो कि लब-कुशा हो बला का ख़तीब था मौज-ए-नशात ओ सैल-ए-ग़म-ए-जाँ थे एक साथ गुलशन में नग़्मा-संज अजब अंदलीब था मैं भी रहा हूँ ख़ल्वत-ए-जानाँ में एक शाम ये ख़्वाब है या वाक़ई मैं ख़ुश-नसीब था हर्फ़-ए-दुआ ओ दस्त-ए-सख़ावत के बाब में ख़ुद मेरा तजरबा है वो बे-हद नजीब था देखा है उस को ख़ल्वत ओ जल्वत में बार-हा वो आदमी बहुत ही अजीब-ओ-ग़रीब था लिक्खो तमाम उम्र मगर फिर भी तुम 'अलीम' उस को दिखा न पाओ वो ऐसा हबीब था

Obaidullah Aleem

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शिकस्ता-हाल सा बे-आसरा सा लगता है ये शहर दिल से ज़ियादा दुखा सा लगता है हर इक के साथ कोई वाक़िआ' सा लगता है जिसे भी देखो वो खोया हुआ सा लगता है ज़मीन है सो वो अपनी गर्दिशों में कहीं जो चाँद है सो वो टूटा हुआ सा लगता है मेरे वतन पे उतरते हुए अँधेरों को जो तुम कहो मुझे क़हर-ए-ख़ुदा सा लगता है जो शाम आई तो फिर शाम का लगा दरबार जो दिन हुआ तो वो दिन कर्बला सा लगता है ये रात खा गई इक एक कर के सारे चराग़ जो रह गया है वो बुझता हुआ सा लगता है दुआ करो कि मैं उस के लिए दुआ हो जाऊँ वो एक शख़्स जो दिल को दुआ सा लगता है तो दिल में बुझने सी लगती है काएनात तमाम कभी कभी जो मुझे तू बुझा सा लगता है जो आ रही है सदा ग़ौर से सुनो उस को कि इस सदा में ख़ुदा बोलता सा लगता है अभी ख़रीद लें दुनिया कहाँ की महँगी है मगर ज़मीर का सौदा बुरा सा लगता है ये मौत है या कोई आख़िरी विसाल के बा'द अजब सुकून में सोया हुआ सा लगता है हवा-ए-रंग-ए-दो-आलम में जागती हुई लय 'अलीम' ही कहीं नग़्मा-सरा सा लगता है

Obaidullah Aleem

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कोई धुन हो मैं तिरे गीत ही गाए जाऊँ दर्द सीने में उठे शोर मचाए जाऊँ ख़्वाब बन कर तू बरसता रहे शबनम शबनम और बस मैं इसी मौसम में नहाए जाऊँ तेरे ही रंग उतरते चले जाएँ मुझ में ख़ुद को लिक्खूँ तिरी तस्वीर बनाए जाऊँ जिस को मिलना नहीं फिर उस से मोहब्बत कैसी सोचता जाऊँ मगर दिल में बसाए जाऊँ अब तू उस की हुई जिस पे मुझे प्यार आता है ज़िंदगी आ तुझे सीने से लगाए जाऊँ यही चेहरे मिरे होने की गवाही देंगे हर नए हर्फ़ में जाँ अपनी समाए जाऊँ जान तो चीज़ है क्या रिश्ता-ए-जाँ से आगे कोई आवाज़ दिए जाए मैं आए जाऊँ शायद इस राह पे कुछ और भी राही आएँ धूप में चलता रहूँ साए बिछाए जाऊँ अहल-ए-दिल होंगे तो समझेंगे सुख़न को मेरे बज़्म में आ ही गया हूँ तो सुनाए जाऊँ

Obaidullah Aleem

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अज़ाब आए थे ऐसे कि फिर न घर से गए वो ज़िंदा लोग मिरे घर के जैसे मर से गए हज़ार तरह के सद में उठाने वाले लोग न जाने क्या हुआ इक आन में बिखर से गए बिछड़ने वालों का दुख हो तो सोच लेना यही कि इक नवा-ए-परेशाँ थे रहगुज़र से गए हज़ार राह चले फिर वो रहगुज़र आई कि इक सफ़र में रहे और हर सफ़र से गए कभी वो जिस्म हुआ और कभी वो रूह तमाम उसी के ख़्वाब थे आँखों में हम जिधर से गए ये हाल हो गया आख़िर तिरी मोहब्बत में कि चाहते हैं तुझे और तिरी ख़बर से गए मिरा ही रंग थे तो क्यूँँ न बस रहे मुझ में मिरा ही ख़्वाब थे तो क्यूँँ मिरी नज़र से गए जो ज़ख़्म ज़ख़्म-ए-ज़बाँ भी है और नुमू भी है तो फिर ये वहम है कैसा कि हम हुनर से गए

Obaidullah Aleem

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