ghazalKuch Alfaaz

शो'ला ही सही आग लगाने के लिए आ फिर नूर के मंज़र को दिखाने के लिए आ ये किस ने कहा है मिरी तक़दीर बना दे आ अपने ही हाथों से मिटाने के लिए आ ऐ दोस्त मुझे गर्दिश-ए-हालात ने घेरा तू ज़ुल्फ़ की कमली में छुपाने के लिए आ दीवार है दुनिया इसे राहों से हटा दे हर रस्म-ए-मोहब्बत को मिटाने के लिए आ मतलब तिरी आमद से है दरमाँ से नहीं है 'हसरत' की क़सम दिल ही दुखाने के लिए आ

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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सीना दहक रहा हो तो क्या चुप रहे कोई क्यूँँ चीख़ चीख़ कर न गला छील ले कोई साबित हुआ सुकून-ए-दिल-ओ-जाँ कहीं नहीं रिश्तों में ढूँढ़ता है तो ढूँडा करे कोई तर्क-ए-तअल्लुक़ात कोई मसअला नहीं ये तो वो रास्ता है कि बस चल पड़े कोई दीवार जानता था जिसे मैं वो धूल थी अब मुझ को ए'तिमाद की दावत न दे कोई मैं ख़ुद ये चाहता हूँ कि हालात हों ख़राब मेरे ख़िलाफ़ ज़हर उगलता फिरे कोई ऐ शख़्स अब तो मुझ को सभी कुछ क़ुबूल है ये भी क़ुबूल है कि तुझे छीन ले कोई हाँ ठीक है मैं अपनी अना का मरीज़ हूँ आख़िर मेरे मिज़ाज में क्यूँँ दख़्ल दे कोई इक शख़्स कर रहा है अभी तक वफ़ा का ज़िक्र काश उस ज़बाँ-दराज़ का मुँह नोच ले कोई

Jaun Elia

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फिर मिरी याद आ रही होगी फिर वो दीपक बुझा रही होगी फिर मिरे फेसबुक पे आ कर वो ख़ुद को बैनर बना रही होगी अपने बेटे का चूम कर माथा मुझ को टीका लगा रही होगी फिर उसी ने उसे छुआ होगा फिर उसी से निभा रही होगी जिस्म चादर सा बिछ गया होगा रूह सिलवट हटा रही होगी फिर से इक रात कट गई होगी फिर से इक रात आ रही होगी

Kumar Vishwas

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जो भी इज़्ज़त के डर से डर जाए मत करे इश्क़ अपने घर जाए बात आ जाए जब दु'आओं पर इस सेे बेहतर है बंदा मर जाए थोड़ी सी और देर सामने रह मेरी आँखों का पेट भर जाए अल-मुहैमिन के घर भी ख़तरे हैं जाए भी तो कोई किधर जाए हाँ अक़ीदा अगर न क़ैद रखे फिर तो इंसान कुछ भी कर जाए बेबसी की ये आख़िरी हद है मेरी औलाद आप पर जाए उस के चेहरे पर आज उदासी थी हाए 'अफ़्कार अल्वी' मर जाए

Afkar Alvi

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हम रातों को उठ उठ के जिन के लिए रोते हैं वो ग़ैर की बाँहों में आराम से सोते हैं हम अश्क जुदाई के गिरने ही नहीं देते बेचैन सी पलकों में मोती से पिरोते हैं होता चला आया है बे-दर्द ज़माने में सच्चाई की राहों में काँटे सभी बोते हैं अंदाज़-ए-सितम उन का देखे तो कोई 'हसरत' मिलने को तो मिलते हैं नश्तर से चुभोते हैं

Hasrat Jaipuri

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मैं उस की आँखों से छलकी शराब पीता हूँ ग़रीब हो के भी महँगी शराब पीता हूँ मुझे नशे में बहकते कभी नहीं देखा वो जानता है मैं कितनी शराब पीता हूँ उसे भी देखूँ तो पहचानने में देर लगे कभी कभी तो मैं इतनी शराब पीता हूँ पुराने चाहने वालों की याद आने लगे इसी लिए मैं पुरानी शराब पीता हूँ

Hasrat Jaipuri

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ये कौन आ गई दिल-रुबा महकी महकी फ़ज़ा महकी महकी हवा महकी महकी वो आँखों में काजल वो बालों में गजरा हथेली पे उस के हिना महकी महकी ख़ुदा जाने किस किस की ये जान लेगी वो क़ातिल अदा वो क़ज़ा महकी महकी सवेरे सवेरे मिरे घर पे आई ऐ 'हसरत' वो बाद-ए-सबा महकी महकी

Hasrat Jaipuri

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जब प्यार नहीं है तो भुला क्यूँँंनहीं देते ख़त किस लिए रक्खे हैं जला क्यूँ नहीं देते किस वास्ते लिक्खा है हथेली पे मिरा नाम मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूँ तो मिटा क्यूँ नहीं देते लिल्लाह शब-ओ-रोज़ की उलझन से निकालो तुम मेरे नहीं हो तो बता क्यूँ नहीं देते रह रह के न तड़पाओ ऐ बे-दर्द मसीहा हाथों से मुझे ज़हर पिला क्यूँ नहीं देते जब उस की वफ़ाओं पे यक़ीं तुम को नहीं है 'हसरत' को निगाहों से गिरा क्यूँ नहीं देते

Hasrat Jaipuri

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