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ये कौन आ गई दिल-रुबा महकी महकी फ़ज़ा महकी महकी हवा महकी महकी वो आँखों में काजल वो बालों में गजरा हथेली पे उस के हिना महकी महकी ख़ुदा जाने किस किस की ये जान लेगी वो क़ातिल अदा वो क़ज़ा महकी महकी सवेरे सवेरे मिरे घर पे आई ऐ 'हसरत' वो बाद-ए-सबा महकी महकी

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बस इक उसी पे तो पूरी तरह अयाॅं हूँ मैं वो कह रहा है मुझे रायगाॅं तो हाँ हूँ मैं जिसे दिखाई दूँ मेरी तरफ़ इशारा करे मुझे दिखाई नहीं दे रहा कहाॅं हूँ मैं इधर-उधर से नमी का रिसाव रहता है सड़क से नीचे बनाया गया मकाॅं हूँ मैं किसी ने पूछा कि तुम कौन हो तो भूल गया अभी किसी ने बताया तो था फ़लाॅं हूँ मैं मैं ख़ुद को तुझ से मिटाऊॅंगा एहतियात के साथ तू बस निशान लगा दे जहाॅं जहाॅं हूँ मैं मैं किस से पूछूॅं ये रस्ता दुरुस्त है कि ग़लत जहाॅं से कोई गुज़रता नहीं वहाॅं हूँ मैं

Umair Najmi

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बात करनी है बात कौन करे दर्द से दो दो हाथ कौन करे हम सितारे तुम्हें बुलाते हैं चाँद न हो तो रात कौन करे अब तुझे रब कहें या बुत समझें इश्क़ में ज़ात-पात कौन करे ज़िंदगी भर की थे कमाई तुम इस से ज़्यादा ज़कात कौन करे

Kumar Vishwas

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शाहसाज़ी में रियायत भी नहीं करते हो सामने आके हुकूमत भी नहीं करते हो तुम सेे क्या बात करे कौन कहाँ क़त्ल हुआ तुम तो इस ज़ुल्म पे हैरत भी नहीं करते हो अब मेरे हाल पे क्यूँ तुम को परेशानी है अब तो तुम मुझ सेे मुहब्बत भी नहीं करते हो प्यार करने की सनद कैसे तुम्हें जारी करूँँ तुम अभी ठीक से नफ़रत भी नहीं करते हो मश्वरे हँस के दिया करते थे दीवानों को क्या हुआ अब तो नसीहत भी नहीं करते हो

Ali Zaryoun

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चल दिए फेर कर नज़र तुम भी ग़ैर तो ग़ैर थे मगर तुम भी ये गली मेरे दिलरुबा की है दोस्तों ख़ैरियत इधर तुम भी मुझ पे लोगों के साथ हँसते हो लोग रोएँगे ख़ास कर तुम भी मुझ को ठुकरा दिया है दुनिया ने मैं तो मर जाऊँगा अगर तुम भी उस की गाड़ी तो जा चुकी 'ताबिश' अब उठो जाओ अपने घर तुम भी

Zubair Ali Tabish

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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं

Rehman Faris

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मैं उस की आँखों से छलकी शराब पीता हूँ ग़रीब हो के भी महँगी शराब पीता हूँ मुझे नशे में बहकते कभी नहीं देखा वो जानता है मैं कितनी शराब पीता हूँ उसे भी देखूँ तो पहचानने में देर लगे कभी कभी तो मैं इतनी शराब पीता हूँ पुराने चाहने वालों की याद आने लगे इसी लिए मैं पुरानी शराब पीता हूँ

Hasrat Jaipuri

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हम रातों को उठ उठ के जिन के लिए रोते हैं वो ग़ैर की बाँहों में आराम से सोते हैं हम अश्क जुदाई के गिरने ही नहीं देते बेचैन सी पलकों में मोती से पिरोते हैं होता चला आया है बे-दर्द ज़माने में सच्चाई की राहों में काँटे सभी बोते हैं अंदाज़-ए-सितम उन का देखे तो कोई 'हसरत' मिलने को तो मिलते हैं नश्तर से चुभोते हैं

Hasrat Jaipuri

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शो'ला ही सही आग लगाने के लिए आ फिर नूर के मंज़र को दिखाने के लिए आ ये किस ने कहा है मिरी तक़दीर बना दे आ अपने ही हाथों से मिटाने के लिए आ ऐ दोस्त मुझे गर्दिश-ए-हालात ने घेरा तू ज़ुल्फ़ की कमली में छुपाने के लिए आ दीवार है दुनिया इसे राहों से हटा दे हर रस्म-ए-मोहब्बत को मिटाने के लिए आ मतलब तिरी आमद से है दरमाँ से नहीं है 'हसरत' की क़सम दिल ही दुखाने के लिए आ

Hasrat Jaipuri

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जब प्यार नहीं है तो भुला क्यूँँंनहीं देते ख़त किस लिए रक्खे हैं जला क्यूँ नहीं देते किस वास्ते लिक्खा है हथेली पे मिरा नाम मैं हर्फ़-ए-ग़लत हूँ तो मिटा क्यूँ नहीं देते लिल्लाह शब-ओ-रोज़ की उलझन से निकालो तुम मेरे नहीं हो तो बता क्यूँ नहीं देते रह रह के न तड़पाओ ऐ बे-दर्द मसीहा हाथों से मुझे ज़हर पिला क्यूँ नहीं देते जब उस की वफ़ाओं पे यक़ीं तुम को नहीं है 'हसरत' को निगाहों से गिरा क्यूँ नहीं देते

Hasrat Jaipuri

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