ghazalKuch Alfaaz

सोए हुए पलंग के साए जगा गया खिड़की खुली तो आसमाँ कमरे में आ गया आँगन में तेरी याद का झोंका जो आ गया तन्हाई के दरख़्त से पत्ते उड़ा गया हँसते चमकते ख़्वाब के चेहरे भी मिट गए बत्ती जली तो मन में अँधेरा सा छा गया आया था काले ख़ून का सैलाब पिछली रात बरसों पुरानी जिस्म की दीवार ढा गया तस्वीर में जो क़ैद था वो शख़्स रात को ख़ुद ही फ़्रेम तोड़ के पहलू में आ गया वो चाय पी रहा था किसी दूसरे के साथ मुझ पर निगाह पड़ते ही कुछ झेंप सा गया

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सितम ढाते हुए सोचा करोगे हमारे साथ तुम ऐसा करोगे? अँगूठी तो मुझे लौटा रहे हो अँगूठी के निशाँ का क्या करोगे? मैं तुम सेे अब झगड़ता भी नहीं हूँ तो क्या इस बात पर झगड़ा करोगे? मेरा दामन तुम्हीं था में हुए हो मेरा दामन तुम्हीं मैला करोगे बताओ वा'दा कर के आओगे ना? के पिछली बार के जैसा करोगे? वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है कहाँ तक कार का पीछा करोगे? मुझे बस यूँँ ही तुम सेे पूछना था अगर मैं मर गया तो क्या करोगे?

Zubair Ali Tabish

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वो ज़माना गुज़र गया कब का था जो दीवाना मर गया कब का ढूँढ़ता था जो इक नई दुनिया लौट के अपने घर गया कब का वो जो लाया था हम को दरिया तक पार अकेले उतर गया कब का उस का जो हाल है वही जाने अपना तो ज़ख़्म भर गया कब का ख़्वाब-दर-ख़्वाब था जो शीराज़ा अब कहाँ है बिखर गया कब का

Javed Akhtar

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बस इक उसी पे तो पूरी तरह अयाॅं हूँ मैं वो कह रहा है मुझे रायगाॅं तो हाँ हूँ मैं जिसे दिखाई दूँ मेरी तरफ़ इशारा करे मुझे दिखाई नहीं दे रहा कहाॅं हूँ मैं इधर-उधर से नमी का रिसाव रहता है सड़क से नीचे बनाया गया मकाॅं हूँ मैं किसी ने पूछा कि तुम कौन हो तो भूल गया अभी किसी ने बताया तो था फ़लाॅं हूँ मैं मैं ख़ुद को तुझ से मिटाऊॅंगा एहतियात के साथ तू बस निशान लगा दे जहाॅं जहाॅं हूँ मैं मैं किस से पूछूॅं ये रस्ता दुरुस्त है कि ग़लत जहाॅं से कोई गुज़रता नहीं वहाॅं हूँ मैं

Umair Najmi

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

Rahat Indori

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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा यूँँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

Jaun Elia

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चेहरे पे चमचमाती हुई धूप मर गई सूरज को ढलता देख के फिर शाम डर गई मबहूत से खड़े रहे सब बस की लाइन में कूल्हे उछालती हुई बिजली गुज़र गई सूरज वही था धूप वही शहर भी वही क्या चीज़ थी जो जिस्म के अंदर ठिठर गई ख़्वाहिश सुखाने रक्खी थी कोठे पे दोपहर अब शाम हो चली मियाँ देखो किधर गई तहलील हो गई है हवा में उदासियाँ ख़ाली जगह जो रह गई तन्हाई भर गई चेहरे बग़ैर निकला था उस के मकान से रुस्वाइयों की हद से भी आगे ख़बर गई रंगों की सुर्ख़ नाफ़ दाखिल्या गुल-आफ़ताब अंधी हवाएँ ख़ार खटक कान भर गई

Adil Mansuri

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ज़मीं छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा अँधेरों के अंदर उतर जाऊँगा मिरी पत्तियाँ सारी सूखी हुईं नए मौसमों में बिखर जाऊँगा अगर आ गया आइना सामने तो अपने ही चेहरे से डर जाऊँगा वो इक आँख जो मेरी अपनी भी है न आई नज़र तो किधर जाऊँगा वो इक शख़्स आवाज़ देगा अगर मैं ख़ाली सड़क पर ठहर जाऊँगा पलट कर न पाया किसी को अगर तो अपनी ही आहट से डर जाऊँगा तिरी ज़ात में साँस ली है सदा तुझे छोड़ कर मैं किधर जाऊँगा

Adil Mansuri

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बदन पर नई फ़स्ल आने लगी हवा दिल में ख़्वाहिश जगाने लगी कोई ख़ुद-कुशी की तरफ़ चल दिया उदासी की मेहनत ठिकाने लगी जो चुप-चाप रहती थी दीवार पर वो तस्वीर बातें बनाने लगी ख़यालों के तारीक खंडरात में ख़मोशी ग़ज़ल गुनगुनाने लगी ज़रा देर बैठे थे तन्हाई में तिरी याद आँखें दुखाने लगी

Adil Mansuri

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चारों तरफ़ से मौत ने घेरा है ज़ीस्त को और उस के साथ हुक्म कि अब ज़िंदगी करो बाहर गली में शोर है बरसात का सुनो कुंडी लगा के आज तो घर में पड़े रहो छोड़ आए किस की छत पे जवाँ-साल चाँद को ख़ामोश किस लिए हो सितारो जवाब दो क्यूँँ चलते चलते रुक गए वीरान रास्तो तन्हा हूँ आज मैं ज़रा घर तक तो साथ दो जिस ने भी मुड़ के देखा वो पत्थर का हो गया नज़रें झुकाए दोस्तो चुप चुप चले चलो अल्लाह रक्खे तेरी सहर जैसी कम-सिनी दिल काँपता है जब भी तू आती है शाम को वीराँ चमन पे रोई है शबनम तमाम रात ऐसे में कोई नन्ही कली मुस्कुराए तो 'आदिल' हवाएँ कब से भी देती हैं दस्तकें जल्दी से उठ के कमरे का दरवाज़ा खोल दो

Adil Mansuri

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बिस्मिल के तड़पने की अदाओं में नशा था मैं हाथ में तलवार लिए झूम रहा था घूँघट में मिरे ख़्वाब की ता'बीर छुपी थी मेहंदी से हथेली में मिरा नाम लिखा था लब थे कि किसी प्याली के होंटों पे झुके थे और हाथ कहीं गर्दन-ए-मीना में पड़ा था हम्माम के आईने में शब डूब रही थी सिगरेट से नए दिन का धुआँ फैल रहा था दरिया के किनारे पे मिरी लाश पड़ी थी और पानी की तह में वो मुझे ढूँढ़ रहा था मालूम नहीं फिर वो कहाँ छुप गया 'आदिल' साया सा कोई लम्स की सरहद पे मिला था

Adil Mansuri

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