ghazalKuch Alfaaz

تجھ مکھ کوں کوئی چندر کتے کوئی سورتیں انور کتے کوئی حسن کا بندر کتے کوئی کچھ کتے کوئی کچھ کتے تجھ لب کوں کوئی شکر کتے کوئی شہد سوں برتر کتے کوئی حضر جاں پرور کتے کوئی کچھ کتے کوئی کچھ کتے کوئی جیو کی پیاری کتے کوئی سول اچھن ناری کتے ناریاں تیں کوئی نیاری کتے کوئی کچھ کتے کوئی کچھ کتے زلفاں کوں کئی ہاراں کتے کئی مشک کے دھاراں کتے کئی دام کئی ماراں کتے کوئی کچھ کتے کوئی کچھ کتے قد کوں الف اکثر کتے کوئی سرو نازک تر کتے کوئی صنع کا مظہر کتے کوئی کچھ کتے کوئی کچھ کتے تجھ چک کوں کوئی کھنجن کتے کوئی ساحر پرفن کتے کوئی حقۂ انجن کتے کوئی کچھ کتے کوئی کچھ کتے جو بن کو تجھ کوئی کچ کتے یا دو ٹیناں سنج کتے یاور بھرے پنکج کتے کوئی کچھ کتے کوئی کچھ کتے رخسار کوں چندر کتے کوئی حسن کا بندر کتے کوئی زیب کا سمدر کتے کوئی کچھ کتے کوئی کچھ کتے دائم و دانا موجھ کتے کوئی عاشقی سوں سج کتے لوگاں میں یو اچرج کتے کوئی کچھ کتے کوئی کچھ کتے

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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन

Varun Anand

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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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ये सात आठ पड़ोसी कहाँ से आए मेरे तुम्हारे दिल में तो कोई न था सिवाए मेरे किसी ने पास बिठाया बस आगे याद नहीं मुझे तो दोस्त वहाँ से उठा के लाए मेरे ये सोच कर न किए अपने दर्द उस के सुपुर्द वो लालची है असासे न बेच खाए मेरे इधर किधर तू नया है यहाँ कि पागल है किसी ने क्या तुझे क़िस्से नहीं सुनाए मेरे वो आज़माए मेरे दोस्त को ज़रूर मगर उसे कहो कि तरीके न आज़माए मेरे

Umair Najmi

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