tum se pahle vo jo ik shakhs yahan takht-nashin tha us ko bhi apne khuda hone pe itna hi yaqin tha koi thahra ho jo logon ke muqabil to batao vo kahan hain ki jinhen naaz bahut apne taiin tha aaj soe hain tah-e-khak na jaane yahan kitne koi shola koi shabnam koi mahtab-jabin tha ab vo phirte hain isi shahr men tanha liye dil ko ik zamane men mizaj un ka sar-e-arsh-e-barin tha chhodna ghar ka hamen yaad hai 'jalib' nahin bhule tha vatan zehn men apne koi zindan to nahin tha tum se pahle wo jo ek shakhs yahan takht-nashin tha us ko bhi apne khuda hone pe itna hi yaqin tha koi thahra ho jo logon ke muqabil to batao wo kahan hain ki jinhen naz bahut apne tain tha aaj soe hain tah-e-khak na jaane yahan kitne koi shola koi shabnam koi mahtab-jabin tha ab wo phirte hain isi shahr mein tanha liye dil ko ek zamane mein mizaj un ka sar-e-arsh-e-barin tha chhodna ghar ka hamein yaad hai 'jalib' nahin bhule tha watan zehn mein apne koi zindan to nahin tha
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यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वो लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले वहम मुझ को ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले अदब से माँग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
Tehzeeb Hafi
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चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़ सारी दुनिया उस का चर्बा उस का चेहरा एक तरफ़ वो लड़कर भी सो जाए तो उस का माथा चूमूँ मैं उस सेे मुहब्बत एक तरफ़ है उस सेे झगड़ा एक तरफ़ जिस शय पर वो उँगली रख दे उस को वो दिलवानी है उस की ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़ ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उस के हाथों से चारासाज़ी एक तरफ़ है उस का छूना एक तरफ़ सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है सब का कहना एक तरफ़ है उस का कहना एक तरफ़ उस ने सारी दुनिया माँगी मैं ने उस को माँगा है उस के सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
Varun Anand
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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
Javed Akhtar
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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो
Jaun Elia
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उस ने जब हँस के नमस्कार किया मुझ को इंसान से अवतार किया दश्त-ए-ग़ुर्बत में दिल-ए-वीराँ ने याद जमुना को कई बार किया प्यार की बात न पूछो यारो हम ने किस किस से नहीं प्यार किया कितनी ख़्वाबीदा तमन्नाओं को उस की आवाज़ ने बेदार किया हम पुजारी हैं बुतों के 'जालिब' हम ने का'बे में भी इक़रार किया
Habib Jalib
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फिर दिल से आ रही है सदा उस गली में चल शायद मिले ग़ज़ल का पता उस गली में चल कब से नहीं हुआ है कोई शे'र काम का ये शे'र की नहीं है फ़ज़ा उस गली में चल वो बाम ओ दर वो लोग वो रुस्वाइयों के ज़ख़्म हैं सब के सब अज़ीज़ जुदा उस गली में चल उस फूल के बग़ैर बहुत जी उदास है मुझ को भी साथ ले के सबा उस गली में चल दुनिया तो चाहती है यूँँही फ़ासले रहें दुनिया के मशवरों पे न जा उस गली में चल बे-नूर ओ बे-असर है यहाँ की सदा-ए-साज़ था उस सुकूत में भी मज़ा उस गली में चल 'जालिब' पुकारती हैं वो शोला-नवाइयाँ ये सर्द रुत ये सर्द हवा उस गली में चल
Habib Jalib
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कुछ लोग ख़यालों से चले जाएँ तो सोएँ बीते हुए दिन रात न याद आएँ तो सोएँ चेहरे जो कभी हम को दिखाई नहीं देंगे आ आ के तसव्वुर में न तड़पाएँ तो सोएँ बरसात की रुत के वो तरब-रेज़ मनाज़िर सीने में न इक आग सी भड़काएँ तो सोएँ सुब्हों के मुक़द्दर को जगाते हुए मुखड़े आँचल जो निगाहों में न लहराएँ तो सोएँ महसूस ये होता है अभी जाग रहे हैं लाहौर के सब यार भी सो जाएँ तो सोएँ
Habib Jalib
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हम ने दिल से तुझे सदा माना तू बड़ा था तुझे बड़ा माना 'मीर'-ओ-'ग़ालिब' के बा'द 'अनीस' के बा'द तुझ को माना बड़ा बजा माना तू कि दीवाना-ए-सदाक़त था तू ने बंदे को कब ख़ुदा माना तुझ को पर्वा न थी ज़माने की तू ने दिल ही का हर कहा माना तुझ को ख़ुद पे था ए'तिमाद इतना ख़ुद ही को तो न रहनुमा माना की न शब की कभी पज़ीराई सुब्ह को लाएक़-ए-सना माना हँस दिया सत्ह-ए-ज़ेहन-ए-आलम पर जब किसी बात का बुरा माना यूँँ तो शाइ'र थे और भी ऐ 'जोश' हम ने तुझ सा न दूसरा माना
Habib Jalib
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कहीं आह बन के लब पर तिरा नाम आ न जाए तुझे बे-वफ़ा कहूँ मैं वो मक़ाम आ न जाए ज़रा ज़ुल्फ़ को सँभालो मिरा दिल धड़क रहा है कोई और ताइर-ए-दिल तह-ए-दाम आ न जाए जिसे सुन के टूट जाए मिरा आरज़ू भरा दिल तिरी अंजुमन से मुझ को वो पयाम आ न जाए वो जो मंज़िलों पे ला कर किसी हम-सफ़र को लूटें उन्हीं रहज़नों में तेरा कहीं नाम आ न जाए इसी फ़िक्र में हैं ग़लताँ ये निज़ाम-ए-ज़र के बंदे जो तमाम-ए-ज़िंदगी है वो निज़ाम आ न जाए ये मह ओ नुजूम हँस लें मिरे आँसुओं पे 'जालिब' मिरा माहताब जब तक लब-ए-बाम आ न जाए
Habib Jalib
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