उस की गली जितना सुनसान नहीं होता है वीराना इतना वीरान नहीं होता है इश्क़ में कोई भी एहसान नहीं होता है तू नइँ मानता है मत मान नहीं होता है वो उस बात पे मुझ सेे झगड़ा कर लेते हैं जिस का मुझ को बिल्कुल ध्यान नहीं होता है कुछ रिश्तों में दिल को आज़ादी नइँ रहती कुछ कमरों में रौशनदान नहीं होता है दोस्त भिखारी भी आते हैं दरवाज़े पर हर आने वाला मेहमान नहीं होता है
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चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ सारे मर्द एक जैसे हैं तुम ने कैसे कह डाला मैं भी तो एक मर्द हूँ तुम को ख़ुद से बेहतर मानता हूँ मैं ने उस सेे प्यार किया है मिल्कियत का दावा नहीं वो जिस के भी साथ है मैं उस को भी अपना मानता हूँ चादर की इज़्ज़त करता हूँ और पर्दे को मानता हूँ हर पर्दा पर्दा नहीं होता इतना मैं भी जानता हूँ
Ali Zaryoun
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पूछ लेते वो बस मिज़ाज मिरा कितना आसान था इलाज मिरा चारा-गर की नज़र बताती है हाल अच्छा नहीं है आज मिरा मैं तो रहता हूँ दश्त में मसरूफ़ क़ैस करता है काम-काज मिरा कोई कासा मदद को भेज अल्लाह मेरे बस में नहीं है ताज मिरा मैं मोहब्बत की बादशाहत हूँ मुझ पे चलता नहीं है राज मिरा
Fahmi Badayuni
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तेरे पीछे होगी दुनिया पागल बन क्या बोला मैं ने कुछ समझा? पागल बन सहरा में भी ढूँढ़ ले दरिया पागल बन वरना मर जाएगा प्यासा पागल बन आधा दाना आधा पागल नइँ नइँ नइँ उस को पाना है तो पूरा पागल बन दानाई दिखलाने से कुछ हासिल नहीं पागल खाना है ये दुनिया पागल बन देखें तुझ को लोग तो पागल हो जाएँ इतना उम्दा इतना आला पागल बन लोगों से डर लगता है तो घर में बैठ जिगरा है तो मेरे जैसा पागल बन
Varun Anand
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कब पानी गिरने से ख़ुशबू फूटी है मिट्टी को भी इल्म है बारिश झूठी है एक रिश्ते को लापरवाही ले डूबी एक रस्सी ढीली पड़ने पर टूटी है हाथ मिलाने पर भी उस पे खुला नहीं ये उँगली पर ज़ख़्म है या अँगूठी है उस का हँसना ना-मुमकिन था यूँँ समझो सी मेंट की दीवार से कोपल फूटी है हम ने इन पर शे'र नहीं लिक्खे हाफ़ी हम ने इन पेड़ों की इज़्ज़त लूटी है यूँँ लगता है दीन-ओ-दुनिया छूट गए मुझ से तेरे शहर की बस क्या छूटी है
Tehzeeb Hafi
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नहीं आता किसी पर दिल हमारा वही कश्ती वही साहिल हमारा तेरे दर पर करेंगे नौकरी हम तेरी गलियाँ हैं मुस्तक़बिल हमारा कभी मिलता था कोई होटलों में कभी भरता था कोई बिल हमारा
Tehzeeb Hafi
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ये शाहज़ादी की एक अदा है कमी नहीं है वो बोलने जब लगे तो फिर सोचती नहीं है कोई जो पूछे ख़मोश क्यूँँ हो तो हम बताएँ हमारी नाराज़गी है ये ख़ामुशी नहीं है ख़ला का चेहरा मुसव्विरों ने परख लिया है पर उस की तस्वीर इनसे अब तक बनी नहीं है कल उस की आँखों में फिर से आँसू थे मुझ को ले कर तो आग अब तक दहक रही है बुझी नहीं है मुझी को महफ़िल में ढूँढ़ने वो हुआ था दाख़िल मुझी पे उस की निगाह अब तक पड़ी नहीं है
Vikram Gaur Vairagi
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जब भी दीवाना कोई राह भटक जाता है सब से पहले तो मेरा आप पे शक जाता है शर्त पूरी हो यही जीत नहीं कहलाती शिव धनुष राम के हाथों में चटक जाता है पहले कह देता है ग़ुस्से में कोई बात बुरी और फिर अपने ही ग़ुस्से पे भड़क जाता है वो बताते हैं मुझे पीने पिलाने का शऊर जिन से नश्शे में अभी जाम छलक जाता है आप के शहर के आशिक़ भी हमें सुनते हैं उस तरफ़ भी इसी दरिया का नमक जाता है
Vikram Gaur Vairagi
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चेहरा धुँदला सा था और सुनहरे झुमके थे बादल ने कानों में चाँद के टुकड़े पहने थे इक दूजे को खोने से हम इतना डरते थे ग़ुस्सा भी होते तो बातें करते रहते थे मैं तो सजदे में था देखने वाले कहते हैं क़ातिल की तलवार से पहले आँसू निकले थे
Vikram Gaur Vairagi
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मैं राह-ए-जन्नत का अस्ल नक़्शा चुरा रहा था सो उँगलियों को तेरे लबों पर फिरा रहा था मैं इस लिए भी सर अपना हाँ में हिला रहा था मुझे पता है तू सिर्फ़ बातें बना रहा था बिछड़ के हम सेे हमारी ग़लती गिना रहा था हमारा ग़म था हमीं को आँखें दिखा रहा था वो ख़ुद को दुनिया का एक हिस्सा बना चुकी थी मैं अपने हिस्से का प्यार जिस पर लुटा रहा था तुम्हीं ने जाने को कह दिया है तुम्हीं कहोगे उसे बुलाओ, वो शे'र अच्छे सुना रहा था
Vikram Gaur Vairagi
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तेरे आगे है सब तुझ को दिखाई दे रहा है तेरा ग़म ख़ुद-ब-ख़ुद मुझ को रिहाई दे रहा है मेरे सीने पे सर रक्खा है तो ख़ामोश मत रह मुझे बतला तुझे जो भी सुनाई दे रहा है तेरी ग़लती है ये हरगिज़ नहीं है तेरी ग़लती तेरी ग़लती है तू उस पर सफ़ाई दे रहा है अँधेरा वो कि जिस में देखना मुमकिन नहीं है मगर फिर भी अँधेरा क्यूँँ दिखाई दे रहा है मुझे पूछे बिना मुझ सेे मुहब्बत कर रहा है मरज़ जाने बिना मुझ को दवाई दे रहा है
Vikram Gaur Vairagi
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