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vo kab aaen khuda jaane sitaro tum to so jaao hue hain ham to divane sitaro tum to so jaao kahan tak mujh se hamdardi kahan tak meri ghham-khvari hazaron ghham hain anjane sitaro tum to so jaao guzar jaegi ghham ki raat ummido to jaag uttho sambhal jaenge divane sitaro tum to so jaao hamen rudad-e-hasti raat bhar men khatm karni hai na chhedo aur afsane sitaro tum to so jaao hamare dida-e-be-khvab ko taskin kya doge hamen luuta hai duniya ne sitaro tum to so jaao use 'qabil' ki chashm-e-nam se derina taalluq hai shab-e-ghham tum ko kya jaane sitaro tum to so jaao wo kab aaen khuda jaane sitaro tum to so jao hue hain hum to diwane sitaro tum to so jao kahan tak mujh se hamdardi kahan tak meri gham-khwari hazaron gham hain anjaane sitaro tum to so jao guzar jaegi gham ki raat ummido to jag uttho sambhal jaenge diwane sitaro tum to so jao hamein rudad-e-hasti raat bhar mein khatm karni hai na chhedo aur afsane sitaro tum to so jao hamare dida-e-be-khwab ko taskin kya doge hamein luta hai duniya ne sitaro tum to so jao use 'qabil' ki chashm-e-nam se derina talluq hai shab-e-gham tum ko kya jaane sitaro tum to so jao

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उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे पलट के आए तो सब सेे पहले तुझे मिलेंगे अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे

Tehzeeb Hafi

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ये ग़म क्या दिल की आदत है नहीं तो किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को भुला देने की निय्यत है नहीं तो किसी के बिन किसी की याद के बिन जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो तेरे इस हाल पर है सब को हैरत तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी तुझे इस पर नदामत है नहीं तो हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या यही सारी हिकायत है नहीं तो अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझ को अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम तो इस की वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो सबब जो इस जुदाई का बना है वो मुझ सेे ख़ूब-सूरत है नहीं तो

Jaun Elia

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क्यूँँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा कुछ न होगा तो तजरबा होगा हँसती आँखों में झाँक कर देखो कोई आँसू कहीं छुपा होगा इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं शायद उस ने भी ये सुना होगा देख कर तुम को सोचता हूँ मैं क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा

Javed Akhtar

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू और इतने ही बेमुरव्वत हो किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो किसलिए देखते हो आईना तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो दास्ताँ ख़त्म होने वाली है तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो

Jaun Elia

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इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाएँ हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाएँ इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाएँ चलिए कुछ और नहीं आह-शुमारी ही सही हम किसी काम तो इस दिल के बहाने लग जाएँ हम वो गुम-गश्त-ए-मोहब्बत हैं कि तुम तो क्या हो ख़ुद को हम ढूँडने निकलें तो ज़माने लग जाएँ ख़्वाब कुछ ऐसे दिखाए हैं फ़क़ीरी ने मुझे जिन की ता'बीर में शाहों के ख़ज़ाने लग जाएँ मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से ये जो लौंडे हैं मिरे पाँव दबाने लग जाएँ

Mehshar Afridi

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अब ये आलम है कि ग़म की भी ख़बर होती नहीं अश्क बह जाते हैं लेकिन आँख तर होती नहीं फिर कोई कम-बख़्त कश्ती नज़र-ए-तूफ़ाँ हो गई वर्ना साहिल पर उदासी इस क़दर होती नहीं तेरा अंदाज़-ए-तग़ाफ़ुल है जुनूँ में आज कल चाक कर लेता हूँ दामन और ख़बर होती नहीं हाए किस आलम में छोड़ा है तुम्हारे ग़म ने साथ जब क़ज़ा भी ज़िंदगी की चारा-गर होती नहीं रंग-ए-महफ़िल चाहता है इक मुकम्मल इंक़लाब चंद शम्ओं के भड़कने से सहर होती नहीं इज़्तिराब-ए-दिल से 'क़ाबिल' वो निगाह-ए-बे-नियाज़ बे-ख़बर मालूम होती है मगर होती नहीं

Qabil Ajmeri

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वो कब आएँ ख़ुदा जाने सितारो तुम तो सो जाओ हुए हैं हम तो दीवाने सितारो तुम तो सो जाओ कहाँ तक मुझ से हमदर्दी कहाँ तक मेरी ग़म-ख़्वारी हज़ारों ग़म हैं अनजाने सितारो तुम तो सो जाओ गुज़र जाएगी ग़म की रात उम्मीदो तो जाग उट्ठो सँभल जाएँगे दीवाने सितारो तुम तो सो जाओ हमें रूदाद-ए-हस्ती रात भर में ख़त्म करनी है न छेड़ो और अफ़्साने सितारो तुम तो सो जाओ हमारे दीदा-ए-बे-ख़्वाब को तस्कीन क्या दोगे हमें लूटा है दुनिया ने सितारो तुम तो सो जाओ उसे 'क़ाबिल' की चश्म-ए-नम से देरीना तअ'ल्लुक़ है शब-ए-ग़म तुम को क्या जाने सितारो तुम तो सो जाओ

Qabil Ajmeri

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हैरतों के सिलसिले सोज़-ए-निहाँ तक आ गए हम नज़र तक चाहते थे तुम तो जाँ तक आ गए ना-मुरादी अपनी क़िस्मत गुमरही अपना नसीब कारवाँ की ख़ैर हो हम कारवाँ तक आ गए उन की पलकों पर सितारे अपने होंटों पे हँसी क़िस्सा-ए-ग़म कहते कहते हम कहाँ तक आ गए ज़ुल्फ़ में ख़ुशबू न थी या रंग आरिज़ में न था आप किस की आरज़ू में गुल्सिताँ तक आ गए रफ़्ता रफ़्ता रंग लाया जज़्बा-ए-ख़ामोश-ए-इश्क़ वो तग़ाफ़ुल करते करते इम्तिहाँ तक आ गए ख़ुद तुम्हें चाक-ए-गरेबाँ का शुऊ'र आ जाएगा तुम वहाँ तक आ तो जाओ हम जहाँ तक आ गए आज 'क़ाबिल' मय-कदे में इंक़लाब आने को है अहल-ए-दिल अंदेशा-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ तक आ गए

Qabil Ajmeri

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तुम न मानो मगर हक़ीक़त है इश्क़ इंसान की ज़रूरत है जी रहा हूँ इस ए'तिमाद के साथ ज़िंदगी को मिरी ज़रूरत है हुस्न ही हुस्न जल्वे ही जल्वे सिर्फ़ एहसास की ज़रूरत है उस के वादे पे नाज़ थे क्या क्या अब दर-ओ-बाम से नदामत है उस की महफ़िल में बैठ कर देखो ज़िंदगी कितनी ख़ूब-सूरत है रास्ता कट ही जाएगा 'क़ाबिल' शौक़-ए-मंज़िल अगर सलामत है

Qabil Ajmeri

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