वक़्त की इंतिहा तलक वक़्त की जस्त 'अमीर-इमाम' हस्त की बूद 'अमीर-इमाम' बूद की हस्त 'अमीर-इमाम' हिज्र का माहताब है नींद न कोई ख़्वाब है तिश्ना-लबी शराब है नश्शे में मस्त 'अमीर-इमाम' सख़्त बहुत है मरहला देखिए क्या हो फ़ैसला तेग़-ब-कफ़ हक़ीक़तें क़ल्ब-ब-दस्त 'अमीर-इमाम' ज़ख़्म बहुत मिले मगर आज भी है उठाए सर देख जहान-ए-फ़ित्ना-गर तेरी शिकस्त 'अमीर-इमाम' उस के तमाम हम-सफ़र नींद के साथ जा चुके ख़्वाब-कदे में रह गया ख़्वाब-परस्त 'अमीर-इमाम'
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किसे फ़ुर्सत-ए-मह-ओ-साल है ये सवाल है कोई वक़्त है भी कि जाल है ये सवाल है न है फ़िक्र-ए-गर्दिश-ए-आसमाँ न ख़याल-ए-जाँ मुझे फिर ये कैसा मलाल है ये सवाल है वो सवाल जिस का जवाब है मेरी ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी का सवाल है ये सवाल है मैं बिछड़ के तुझ सेे बुलंदियों पे जो पस्त हूँ ये उरूज है कि ज़वाल है ये सवाल है
Abbas Qamar
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मैं ने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं मैं ने तुझ को अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है हाँ अगर मुझ सेे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा
Tehzeeb Hafi
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आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा बे-वक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं तुम ने मिरा काँटों भरा बिस्तर नहीं देखा यारों की मोहब्बत का यक़ीं कर लिया मैं ने फूलों में छुपाया हुआ ख़ंजर नहीं देखा महबूब का घर हो कि बुज़ुर्गों की ज़मीनें जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा ख़त ऐसा लिखा है कि नगीने से जड़े हैं वो हाथ कि जिस ने कोई ज़ेवर नहीं देखा पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला मैं मोम हूँ उस ने मुझे छू कर नहीं देखा
Bashir Badr
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किस तरह होगा फ़कीरों का गुज़ारा सोचे उस सेे कहना कि वो इक बार दुबारा सोचे कैसे मुमकिन है उसे और कोई काम न हो कैसे मुमकिन है कि वो सिर्फ़ हमारा सोचे तेरे अफ़लाक पे जाए तो सितारा चमके मेरे अफ़लाक पे आए तो सितारा सोचे टूटे पतवार की कश्ती का मुक़द्दर क्या है ये तो दरिया ही बताए या किनारा सोचे ऐसा मौका हो कि बस एक ही बच सकता हो और उस वक़्त भी एक शख़्स तुम्हारा सोचे
Zahid Bashir
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बैठे हैं चैन से कहीं जाना तो है नहीं हम बे-घरों का कोई ठिकाना तो है नहीं तुम भी हो बीते वक़्त के मानिंद हू-ब-हू तुम ने भी याद आना है आना तो है नहीं अहद-ए-वफ़ा से किस लिए ख़ाइफ़ हो मेरी जान कर लो कि तुम ने अहद निभाना तो है नहीं वो जो हमें अज़ीज़ है कैसा है कौन है क्यूँँ पूछते हो हम ने बताना तो है नहीं दुनिया हम अहल-ए-इश्क़ पे क्यूँँ फेंकती है जाल हम ने तिरे फ़रेब में आना तो है नहीं वो इश्क़ तो करेगा मगर देख भाल के 'फ़ारिस' वो तेरे जैसा दिवाना तो है नहीं
Rehman Faris
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यूँँ मिरे होने को मुझ पर आश्कार उस ने किया मुझ में पोशीदा किसी दरिया को पार उस ने किया पहले सहरा से मुझे लाया समुंदर की तरफ़ नाव पर काग़ज़ की फिर मुझ को सवार उस ने किया मैं था इक आवाज़ मुझ को ख़ामुशी से तोड़ कर किर्चियों को देर तक मेरी शुमार उस ने किया दिन चढ़ा तो धूप की मुझ को सलीबें दे गया रात आई तो मिरे बिस्तर को दार उस ने किया जिस को उस ने रौशनी समझा था मेरी धूप थी शाम होने का मिरी फिर इंतिज़ार उस ने किया देर तक बुनता रहा आँखों के करघे पर मुझे बुन गया जब मैं तो मुझ को तार तार उस ने किया
Ameer Imam
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ज़मीं के सारे मनाज़िर से कट के सोता हूँ मैं आसमाँ के सफ़र से पलट के सोता हूँ मैं जम्अ'' करता हूँ शब के सियाही क़तरों को ब-वक़्त-ए-सुब्ह फिर उन को पलट के सोता हूँ तलाश धूप में करता हूँ सारा दिन ख़ुद को तमाम-रात सितारों में बट के सोता हूँ कहाँ सुकूँ कि शब-ओ-रोज़ घूमना उस का ज़रा ज़मीन के मेहवर से हट के सोता हूँ तिरे बदन की ख़लाओं में आँख खुलती है हवा के जिस्म से जब जब लिपट के सोता हूँ मैं जाग जाग के रातें गुज़ारने वाला इक ऐसी रात भी आती है डट के सोता हूँ
Ameer Imam
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उन को ख़ला में कोई नज़र आना चाहिए आँखों को टूटे ख़्वाब का हर्जाना चाहिए वो काम रह के करना पड़ा शहर में हमें मजनूँ को जिस के वास्ते वीराना चाहिए इस ज़ख़्म-ए-दिल पे आज भी सुर्ख़ी को देख कर इतरा रहे हैं हम हमें इतराना चाहिए तन्हाइयों पे अपनी नज़र कर ज़रा कभी ऐ बेवक़ूफ़ दिल तुझे घबराना चाहिए है हिज्र तो कबाब न खाने से क्या उसूल गर इश्क़ है तो क्या हमें मर जाना चाहिए दानाइयाँ भी ख़ूब हैं लेकिन अगर मिले धोखा हसीन सा तो उसे खाना चाहिए बीते दिनों की कोई निशानी तो साथ हो जान-ए-हया तुम्हें ज़रा शर्माना चाहिए इस शाइ'री में कुछ नहीं नक़्क़ाद के लिए दिलदार चाहिए कोई दीवाना चाहिए
Ameer Imam
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बन के साया ही सही सात तो होती होगी कम से कम तुझ में तिरी ज़ात तो होती होगी ये अलग बात कोई चाँद उभरता न हो अब दिल की बस्ती में मगर रात तो होती होगी धूप में कौन किसे याद किया करता है पर तिरे शहर में बरसात तो होती होगी हम तो सहरा में हैं तुम लोग सुनाओ अपनी शहर से रोज़ मुलाक़ात तो होती होगी कुछ भी हो जाए मगर तेरे तरफ़-दार हैं सब ज़िंदगी तुझ में कोई बात तो होती होगी
Ameer Imam
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उन को ख़ला में कोई नज़र आना चाहिए आँखों को टूटे ख़्वाब का हर्जाना चाहिए वो काम रह के करना पड़ा शहर में हमें मजनूँ को जिस के वास्ते वीराना चाहिए इस ज़ख़्म-ए-दिल पे आज भी सुर्ख़ी को देख कर इतरा रहे हैं हम हमें इतराना चाहिए तन्हाइयों पे अपनी नज़र कर ज़रा कभी ऐ बेवक़ूफ़ दिल तुझे घबराना चाहिए है हिज्र तो कबाब न खाने से क्या उसूल गर इश्क़ है तो क्या हमें मर जाना चाहिए दानाइयाँ भी ख़ूब हैं लेकिन अगर मिले धोखा हसीन सा तो उसे खाना चाहिए बीते दिनों की कोई निशानी तो साथ हो जान-ए-हया तुम्हें ज़रा शर्माना चाहिए इस शाइ'री में कुछ नहीं नक़्क़ाद के लिए दिलदार चाहिए कोई दीवाना चाहिए
Ameer Imam
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