ye aankh kyuun hai ye haath kya hai ye din hai kya chiiz raat kya hai firaq-e-khurshid-o-mah kyuun hai ye un ka aur mera saath kya hai guman hai kya is sanam-kade par khayal-e-marg-o-hayat kya hai fughhan hai kis ke liye dilon men kharosh-e-dariya-e-zat kya hai falak hai kyuun qaid-e-mustaqil men zamin pe harf-e-najat kya hai hai kaun kis ke liye pareshan pata to de asal baat kya hai hai lams kyuun raegan hamesha fana men khauf-e-sabat kya hai 'munir' is shahr-e-ghham-zada par tira ye sehar-e-nashat kya hai ye aankh kyun hai ye hath kya hai ye din hai kya chiz raat kya hai firaq-e-khurshid-o-mah kyun hai ye un ka aur mera sath kya hai guman hai kya is sanam-kade par khayal-e-marg-o-hayat kya hai fughan hai kis ke liye dilon mein kharosh-e-dariya-e-zat kya hai falak hai kyun qaid-e-mustaqil mein zamin pe harf-e-najat kya hai hai kaun kis ke liye pareshan pata to de asal baat kya hai hai lams kyun raegan hamesha fana mein khauf-e-sabaat kya hai 'munir' is shahr-e-gham-zada par tera ye sehar-e-nashat kya hai
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इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए जलते दियों में जलते घरों जैसी ज़ौ कहाँ सरकार रौशनी का मज़ा हम से पूछिए वो जान ही गए कि हमें उन सेे प्यार है आँखों की मुख़बिरी का मज़ा हम सेे पूछिए हँसने का शौक़ हम को भी था आप की तरह हँसिए मगर हँसी का मज़ा हम से पूछिए हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ 'ख़ुमार' तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए
Khumar Barabankvi
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किया बादलों में सफ़र ज़िंदगी भर ज़मीं पर बनाया न घर ज़िंदगी भर सभी ज़िंदगी के मज़े लूटते हैं न आया हमें ये हुनर ज़िंदगी भर मोहब्बत रही चार दिन ज़िंदगी में रहा चार दिन का असर ज़िंदगी भर
Anwar Shaoor
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चला है सिलसिला कैसा ये रातों को मनाने का तुम्हें हक़ दे दिया किस ने दियों के दिल दुखाने का इरादा छोड़िए अपनी हदों से दूर जाने का ज़माना है ज़माने की निगाहों में न आने का कहाँ की दोस्ती किन दोस्तों की बात करते हो मियाँ दुश्मन नहीं मिलता कोई अब तो ठिकाने का निगाहों में कोई भी दूसरा चेहरा नहीं आया भरोसा ही कुछ ऐसा था तुम्हारे लौट आने का ये मैं ही था बचा के ख़ुद को ले आया किनारे तक समुंदर ने बहुत मौक़ा' दिया था डूब जाने का
Waseem Barelvi
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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को
Naseer Turabi
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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है
Shabeena Adeeb
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बे-ख़याली में यूँँ ही बस इक इरादा कर लिया अपने दिल के शौक़ को हद से ज़ियादा कर लिया जानते थे दोनों हम उस को निभा सकते नहीं उस ने वा'दा कर लिया मैं ने भी वा'दा कर लिया ग़ैर से नफ़रत जो पा ली ख़र्च ख़ुद पर हो गई जितने हम थे हम ने ख़ुद को उस से आधा कर लिया शाम के रंगों में रख कर साफ़ पानी का गिलास आब-ए-सादा को हरीफ़-ए-रंग-ए-बादा कर लिया हिजरतों का ख़ौफ़ था या पुर-कशिश कोहना मक़ाम क्या था जिस को हम ने ख़ुद दीवार-ए-जादा कर लिया एक ऐसा शख़्स बनता जा रहा हूँ मैं 'मुनीर' जिस ने ख़ुद पर बंद हुस्न ओ जाम-ओ-बादा कर लिया
Muneer Niyazi
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हँसी छुपा भी गया और नज़र मिला भी गया ये इक झलक का तमाशा जिगर जला भी गया उठा तो जा भी चुका था अजीब मेहमाँ था सदाएँ दे के मुझे नींद से जगा भी गया ग़ज़ब हुआ जो अँधेरे में जल उठी बिजली बदन किसी का तिलिस्मात कुछ दिखा भी गया न आया कोई लब-ए-बाम शाम ढलने लगी वुफ़ूर-ए-शौक़ से आँखों में ख़ून आ भी गया हवा थी गहरी घटा थी हिना की ख़ुशबू थी ये एक रात का क़िस्सा लहू रुला भी गया चलो 'मुनीर' चलें अब यहाँ रहें भी तो क्या वो संग-दिल तो यहाँ से कहीं चला भी गया
Muneer Niyazi
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ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या दुनिया से ख़ामुशी से गुज़र जाएँ हम तो क्या हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने इक ख़्वाब हैं जहाँ में बिखर जाएँ हम तो क्या अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिए वहाँ शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या दिल की ख़लिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र दरिया-ए-ग़म के पार उतर जाएँ हम तो क्या
Muneer Niyazi
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