ye kaj-adai ye ghhamza tira kabhi phir yaar! ki tera shahr naya aur main musafir yaar! tu aur kuchh na sahi, dost to hai akhir yaar! dukhi raha hai bahut aaj tera shair yaar! kahan ka lams, kahan ki havas, kahan ka visal tadap raha huun tiri hamdami ki khatir yaar! sambhal bhi jaata tha dil tere hijr men, yaani raha huun main bhi tiri aarzu ka munkir yaar! pukarti hain mujhe ghantiyan tiri aise ki jaisa tera madina ho koi mandir yaar! ye kaj-adai ye ghamza tera kabhi phir yar! ki tera shahr naya aur main musafir yar! tu aur kuchh na sahi, dost to hai aakhir yar! dukhi raha hai bahut aaj tera shair yar! kahan ka lams, kahan ki hawas, kahan ka visal tadap raha hun teri hamdami ki khatir yar! sambhal bhi jata tha dil tere hijr mein, yani raha hun main bhi teri aarzu ka munkir yar! pukarti hain mujhe ghantiyan teri aise ki jaisa tera madina ho koi mandir yar!
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ग़ज़ल तो सब को मीठी लग रही थी मगर नातिक को मिर्ची लग रही थी तुम्हारे लब नहीं चू में थे जब तक मुझे हर चीज़ कड़वी लग रही थी मैं जिस दिन छोड़ने वाला था उस को वो उस दिन सब सेे प्यारी लग रही थी
Zubair Ali Tabish
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नया इक रिश्ता पैदा क्यूँँ करें हम बिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँँ करें हम ख़मोशी से अदा हो रस्म-ए-दूरी कोई हंगामा बरपा क्यूँँ करें हम ये काफ़ी है कि हम दुश्मन नहीं हैं वफ़ा-दारी का दावा क्यूँँ करें हम वफ़ा इख़्लास क़ुर्बानी मोहब्बत अब इन लफ़्ज़ों का पीछा क्यूँँ करें हम हमारी ही तमन्ना क्यूँँ करो तुम तुम्हारी ही तमन्ना क्यूँँ करें हम किया था अहद जब लम्हों में हम ने तो सारी उम्र ईफ़ा क्यूँँ करें हम नहीं दुनिया को जब पर्वा हमारी तो फिर दुनिया की पर्वा क्यूँँ करें हम ये बस्ती है मुसलामानों की बस्ती यहाँ कार-ए-मसीहा क्यूँँ करें हम
Jaun Elia
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सो रहेंगे के जागते रहेंगे हम तेरे ख़्वाब देखते रहेंगे तू कही और ही ढूंढता रहेंगा हम कही और ही खिले रहेंगे राहगीरों ने राह बदलनी है पेड़ अपनी जगह खड़े रहेंगे सभी मौसम है दस्तरस में तेरी तू ने चाहा तो हम हरे रहेंगे लौटना कब है तू ने पर तुझ को आदतन ही पुकारते रहेंगे तुझ को पाने में मसअला ये है तुझ को खोने के वसवसे रहेंगे तू इधर देख मुझ सेे बातें कर यार चश्में तो फूटते रहेंगे एक मुद्दत हुई है तुझ सेे मिले तू तो कहता था राब्ते रहेंगे
Tehzeeb Hafi
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पायल कभी पहने कभी कंगन उसे कहना ले आए मुहब्बत में नयापन उसे कहना मयकश कभी आँखों के भरोसे नहीं रहते शबनम कभी भरती नहीं बर्तन उसे कहना घर-बार भुला देती है दरिया की मुहब्बत कश्ती में गुज़ार आया हूँ जीवन उसे कहना इक शब से ज़ियादा नहीं दुनिया की मसेरी इक शब से ज़ियादा नहीं दुल्हन उसे कहना रह रह के दहक उठती है ये आतिश-ए-वहशत दीवाने है सहराओं का ईंधन उसे कहना
Tehzeeb Hafi
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नहीं आता किसी पर दिल हमारा वही कश्ती वही साहिल हमारा तेरे दर पर करेंगे नौकरी हम तेरी गलियाँ हैं मुस्तक़बिल हमारा कभी मिलता था कोई होटलों में कभी भरता था कोई बिल हमारा
Tehzeeb Hafi
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