ghazalKuch Alfaaz

यूँँ न मिल मुझ से ख़फ़ा हो जैसे साथ चल मौज-ए-सबा हो जैसे लोग यूँँ देख के हँस देते हैं तू मुझे भूल गया हो जैसे इश्क़ को शिर्क की हद तक न बढ़ा यूँँ न मिल हम से ख़ुदा हो जैसे मौत भी आई तो इस नाज़ के साथ मुझ पे एहसान किया हो जैसे ऐसे अंजान बने बैठे हो तुम को कुछ भी न पता हो जैसे हिचकियाँ रात को आती ही रहीं तू ने फिर याद किया हो जैसे ज़िंदगी बीत रही है 'दानिश' एक बे-जुर्म सज़ा हो जैसे

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कैसे उस ने ये सब कुछ मुझ सेे छुप कर बदला चेहरा बदला रस्ता बदला बा'द में घर बदला मैं उस के बारे में ये कहता था लोगों से मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला वो भी ख़ुश था उस ने दिल देकर दिल माँगा है मैं भी ख़ुश हूँ मैं ने पत्थर से पत्थर बदला मैं ने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे और फिर उस ने नज़रें बदलीं और नंबर बदला

Tehzeeb Hafi

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वो बे-वफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उस को कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उस को नज़र न आए तो उस की तलाश में रहना कहीं मिले तो पलट कर न देखना उस को वो सादा-ख़ू था ज़माने के ख़म समझता क्या हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उस को वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-गुमाँ देखो जब उस को मैं भी न देखूँ तो देखना उस को अभी से जाना भी क्या उस की कम-ख़याली पर अभी तो और बहुत होगा सोचना उस को उसे ये धुन कि मुझे कम से कम उदास रखे मिरी दु'आ कि ख़ुदा दे ये हौसला उस को पनाह ढूँढ़ रही है शब-ए-गिरफ़्ता-दिलाँ कोई बताओ मिरे घर का रास्ता उस को ग़ज़ल में तज़्किरा उस का न कर 'नसीर' कि अब भुला चुका वो तुझे तू भी भूल जा उस को

Naseer Turabi

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ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है अभी न आएँगी नींद तुम को, अभी न हम को सुकूँ मिलेगा अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में अभी क्यूँ उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिस की ताक़त नई नई है

Shabeena Adeeb

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ये मैं ने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे मैं उस के साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे मेरी दुआ है और इक तरह से बद-दुआ भी है ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा अगर किसी को चाहिए तो मुझ सेे राब्ता करे

Tehzeeb Hafi

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अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँँ इतने हिजाबों में मिलें आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़' जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें

Ahmad Faraz

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नज़र फ़रेब-ए-क़ज़ा खा गई तो क्या होगा हयात मौत से टकरा गई तो क्या होगा ब-ज़ोम-ए-होश तजल्ली की जुस्तुजू बे-सूद जुनूँ की ज़द पे ख़िरद आ गई तो क्या होगा नई सहर के बहुत लोग मुंतज़िर हैं मगर नई सहर भी जो कजला गई तो क्या होगा न रहनुमाओं की मज्लिस में ले चलो मुझ को मैं बे-अदब हूँ हँसी आ गई तो क्या होगा शबाब-ए-लाला-ओ-गुल को पुकारने वालो ख़िज़ाँ-सरिश्त बहार आ गई तो क्या होगा ख़ुशी छनी है तो ग़म का भी ए'तिमाद न कर जो रूह ग़म से भी उकता गई तो क्या होगा ये फ़िक्र कर कि इन आसूदगी के धोकों में तिरी ख़ुदी को भी मौत आ गई तो क्या होगा लरज़ रहे हैं जिगर जिस से कोहसारों के अगर वो लहर यहाँ आ गई तो क्या होगा वो मौत जिस की हम 'एहसान' सुन रहे हैं ख़बर रुमूज़-ए-ज़ीस्त भी समझा गई तो क्या होगा

Ehsan Danish

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