ज़बाँ तक जो न आए वो मोहब्बत और होती है फ़साना और होता है हक़ीक़त और होती है नहीं मिलते तो इक अदना शिकायत है न मिलने की मगर मिल कर न मिलने की शिकायत और होती है ये माना शीशा-ए-दिल रौनक़-ए-बाज़ार-ए-उल्फ़त है मगर जब टूट जाता है तो क़ीमत और होती है निगाहें ताड़ लेती हैं मोहब्बत की अदाओं को छुपाने से ज़माने भर की शोहरत और होती है ये माना हुस्न की फ़ितरत बहुत नाज़ुक है ऐ 'वामिक़' मिज़ाज-ए-इश्क़ की लेकिन नज़ाकत और होती है
Related Ghazal
मैं भी तुम जैसा हूँ अपने से जुदा मत समझो आदमी ही मुझे रहने दो ख़ुदा मत समझो ये जो मैं होश में रहता नहीं तुम सेे मिल कर ये मिरा इश्क़ है तुम इस को नशा मत समझो रास आता नहीं सब को ये मोहब्बत का मरज़ मेरी बीमारी को तुम अपनी दवा मत समझो
Shakeel Azmi
51 likes
तू समझता है तेरा हिज्र गवारा कर के बैठ जाएँगे मोहब्बत से किनारा कर के ख़ुद-कुशी करने नहीं दी तेरी आँखों ने मुझे लौट आया हूँ मैं दरिया का नज़ारा कर के जी तो करता है उसे पाँव तले रौंदने को छोड़ देता हूँ मुक़द्दर का सितारा कर के करना हो तर्क-ए-त'अल्लुक़ तो कुछ ऐसे करना हम को तकलीफ़ न हो ज़िक्र तुम्हारा कर के इस लिए उस को दिलाता हूँ मैं ग़ुस्सा 'ताबिश' ताकि देखूँ मैं उसे और भी प्यारा कर के
Abbas Tabish
31 likes
ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है? जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
Rahat Indori
190 likes
चीख़ते हैं दर-ओ-दीवार नहीं होता मैं आँख खुलने पे भी बेदार नहीं होता मैं ख़्वाब करना हो सफ़र करना हो या रोना हो मुझ में ख़ूबी है बेज़ार नहीं होता में अब भला अपने लिए बनना सँवरना कैसा ख़ुद से मिलना हो तो तय्यार नहीं होता मैं कौन आएगा भला मेरी अयादत के लिए बस इसी ख़ौफ़ से बीमार नहीं होता मैं मंज़िल-ए-इश्क़ पे निकला तो कहा रस्ते ने हर किसी के लिए हमवार नहीं होता मैं तेरी तस्वीर से तस्कीन नहीं होती मुझे तेरी आवाज़ से सरशार नहीं होता मैं लोग कहते हैं मैं बारिश की तरह हूँ 'हाफ़ी' अक्सर औक़ात लगातार नहीं होता मैं
Tehzeeb Hafi
35 likes
हालत जो हमारी है तुम्हारी तो नहीं है ऐसा है तो फिर ये कोई यारी तो नहीं है तहक़ीर ना कर ये मेरी उधड़ी हुई गुदड़ी जैसी भी है अपनी है उधारी तो नहीं है तन्हा ही सही लड़ तो रही है वो अकेली बस थक के गिरी है अभी हारी तो नहीं है ये तू जो मोहब्बत में सिला माँग रहा है ऐ शख़्स तू अंदर से भिखारी तो नहीं है जितनी भी कमा ली हो बना ली हो ये दुनिया दुनिया है तो फिर दोस्त तुम्हारी तो नहीं है
Ali Zaryoun
33 likes
Similar Writers
Our suggestions based on Wamiq Jaunpuri.
Similar Moods
More moods that pair well with Wamiq Jaunpuri's ghazal.







