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ज़रा मोहतात होना चाहिए था बग़ैर अश्कों के रोना चाहिए था अब उन को याद कर के रो रहे हैं बिछड़ते वक़्त रोना चाहिए था मिरी वादा-ख़िलाफ़ी पर वो चुप है उसे नाराज़ होना चाहिए था चला आता यक़ीनन ख़्वाब में वो हमें कल रात सोना चाहिए था सुई धागा मोहब्बत ने दिया था तो कुछ सीना पिरोना चाहिए था हमारा हाल तुम भी पूछते हो तुम्हें मालूम होना चाहिए था वफ़ा मजबूर तुम को कर रही थी तो फिर मजबूर होना चाहिए था

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बरसों पुराना दोस्त मिला जैसे ग़ैर हो देखा रुका झिझक के कहा तुम उमैर हो मिलते हैं मुश्किलों से यहाँ हम-ख़याल लोग तेरे तमाम चाहने वालों की ख़ैर हो कमरे में सिगरेटों का धुआँ और तेरी महक जैसे शदीद धुंध में बाग़ों की सैर हो हम मुत्मइन बहुत हैं अगर ख़ुश नहीं भी हैं तुम ख़ुश हो क्या हुआ जो हमारे बग़ैर हो पैरों में उस के सर को धरें इल्तिजा करें इक इल्तिजा कि जिस का न सर हो न पैर हो

Umair Najmi

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कोई मिसाल नहीं है तिरी मिसाल के बा'द मैं बे ख़याल हुआ हूँ तिरे ख़याल के बा'द बस इक मलाल पे तू ज़िन्दगी तमाम न कर बड़े मलाल मिलेगें मिरे मलाल के बा'द हर एक ज़ख़्म को अश्कों से धो के चूम लिया मैं ऐसे ठीक हुआ उस की देख-भाल के बा'द उलझ के रह गया वो जाल में तबीबों के मरीज़ घर नहीं लौटा है अस्पताल के बा'द दुआ सलाम से आगे मैं बढ़ नहीं पाता उसे भी सोचना पड़ता है हाल-चाल के बा'द हमारे बीच में जो है सही नहीं है वो उसे ये याद भी आया तो चार साल के बा'द हज़ारों ख़्वाब जो आँखों के आसरे थे कभी यतीम हो गए आँखों के इंतिक़ाल के बा'द

Varun Anand

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मैं इस उमीद पे डूबा कि तू बचा लेगा अब इस के बा'द मिरा इम्तिहान क्या लेगा ये एक मेला है वा'दा किसी से क्या लेगा ढलेगा दिन तो हर इक अपना रास्ता लेगा मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा कोई चराग़ नहीं हूँ कि फिर जला लेगा कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा मैं उस का हो नहीं सकता बता न देना उसे लकीरें हाथ की अपनी वो सब जला लेगा हज़ार तोड़ के आ जाऊँ उस से रिश्ता 'वसीम' मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा

Waseem Barelvi

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अपनी मंज़िल का रास्ता भेजो जान हम को वहाँ बुला भेजो क्या हमारा नहीं रहा सावन ज़ुल्फ़ याँ भी कोई घटा भेजो नई कलियाँ जो अब खिली हैं वहाँ उन की ख़ुश्बू को इक ज़रा भेजो हम न जीते हैं और न मरते हैं दर्द भेजो न तुम दवा भेजो धूल उड़ती है जो उस आँगन में उस को भेजो सबा सबा भेजो ऐ फकीरो गली के उस गुल की तुम हमें अपनी ख़ाक-ए-पा भेजो शफ़क़-ए-शाम-ए-हिज्र के हाथों अपनी उतरी हुई क़बा भेजो कुछ तो रिश्ता है तुम से कम-बख़्तों कुछ नहीं कोई बद-दुआ' भेजो

Jaun Elia

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अक्स कितने उतर गए मुझ में फिर न जाने किधर गए मुझ में मैं ने चाहा था ज़ख़्म भर जाएँ ज़ख़्म ही ज़ख़्म भर गए मुझ में मैं वो पल था जो खा गया सदियाँ सब ज़माने गुज़र गए मुझ में ये जो मैं हूँ ज़रा सा बाक़ी हूँ वो जो तुम थे वो मर गए मुझ में मेरे अंदर थी ऐसी तारीकी आ के आसेब डर गए मुझ में पहले उतरा मैं दिल के दरिया में फिर समुंदर उतर गए मुझ में कैसा मुझ को बना दिया 'अम्मार' कौन सा रंग भर गए मुझ में

Ammar Iqbal

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सहराओं ने माँगा पानी दरियाओं पर बरसा पानी बुनियादें कमज़ोर नहीं थीं दीवारों से आया पानी आख़िर किस किस नीम की जड़ में कब तक डालें मीठा पानी छत का हाल बता देता है परनाले से गिरता पानी फ़िक्र-ओ-मसाइल याद-ए-जानाँ गर्म हवाएँ ठंडा पानी प्यासे बच्चे खेल रहे हैं मछली मछली कितना पानी

Fahmi Badayuni

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जब रेतीले हो जाते हैं पर्वत टीले हो जाते हैं तोड़े जाते हैं जो शीशे वो नोकीले हो जाते हैं बाग़ धुएँ में रहता है तो फल ज़हरीले हो जाते हैं नादारी में आग़ोशों के बंधन ढीले हो जाते हैं फूलों को सुर्ख़ी देने में पत्ते पीले हो जाते हैं

Fahmi Badayuni

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मौत की सम्त जान चलती रही ज़िंदगी की दुकान चलती रही सारे किरदार सो गए थक कर बस तिरी दास्तान चलती रही मैं लरज़ता रहा हदफ़ बन कर मश्क़-ए-तीर-ओ-कमान चलती रही उल्टी सीधी चराग़ सुनते रहे और हवा की ज़बान चलती रही दो ही मौसम थे धूप या बारिश छतरियों की दुकान चलती रही जिस्म लम्बे थे चादरें छोटी रात भर खींच-तान चलती रही पर निकलते रहे बिखरते रहे ऊँची नीची उड़ान चलती रही

Fahmi Badayuni

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जाहिलों को सलाम करना है और फिर झूट-मूट डरना है काश वो रास्ते में मिल जाए मुझ को मुँह फेर कर गुज़रना है पूछती है सदा-ए-बाल-ओ-पर क्या ज़मीं पर नहीं उतरना है सोचना कुछ नहीं हमें फ़िलहाल उन से कोई भी बात करना है भूक से डगमगा रहे हैं पाँव और बाज़ार से गुज़रना है

Fahmi Badayuni

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चारासाज़ों के बस की बात नहीं मैं दवाओं के बस की बात नहीं चाहता हूँ मैं दीमकों से नजात जो किताबों के बस की बात नहीं तेरी ख़ुशबू को क़ैद में रखना इत्रदानों के बस की बात नहीं ख़त्म कर दे अज़ाब क़ब्रों का ताज-महलों के बस की बात नहीं आँसुओं में जो झिलमिलाहट है वो सितारों के बस की बात नहीं ऐसा लगता है अब तेरा दीदार सिर्फ़ आँखों के बस की बात नहीं

Fahmi Badayuni

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