nazmKuch Alfaaz

ये तुम सब कि जिन के सरों में जवानी का ख़ूँ लहलहाता है मुझ से रसीद अपनी मेहनत की भी लेते जाओ मोहब्बत के बारे में जो भी किसी ने बताया है पूरी हक़ीक़त नहीं क्यूँँकि चाहत रिवायत नहीं तज्रबा है हक़ीक़त में हर आदमी मोहतरम है वो ख़ुद उस की जब तक न तरदीद कर दे ये पहले भी मैं ने कहा था तुम्हारे लबों से जो कानों को पहुँचे वो हर्फ़ इस्म-ए-आज़म हो देखो वही जिस में कल की बशारत हिदायत हर इक ख़ैर की ताज़ा एहसास की रौशनी हो जो कानों में उतरे तुम उस में से अमृत निथारो कि अमृत में दिल रूह और ज़ह्न की तीस बीमारियों की शिफ़ा है ज़बाँ पर वो तासीर रखना कि जिस से ज़माने को ख़ुद अपनी पहचान हो अपने हर इल्म को आप ही देखना और अपनी ज़बाँ से ही पढ़ना ज़माने को छूना कि हर नस्ल ने जो हक़ाएक़ तराशे वो अपने ही हाथों घड़े हैं कि हर अहद ने आग को छू के ही आग माना ये तुम भी करोगे ये सब तुम भी करना किताबों को बस सूँघना छोड़ देना ये कुल्ली सदाक़त नहीं हैं तुम्हारे ज़माने से पहले के लिखे हुए नादिर औराक़ कल की हर इक पेश-बीनी से आरी हैं इन सब किताबों के पहले वरक़ सिर्फ़ इस वास्ते ख़ाली रक्खे गए हैं कि तुम इन पे अपने ज़माने की सच्चाइयाँ लिख के जाओ हम ऐसों की ख़ातिर जिन्हें कल तुम्हारा लिखा पढ़ के फिर याद करना है आते हुओं को सुनाना है

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ

Faiz Ahmad Faiz

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जब वो इस दुनिया के शोर और ख़ामोशी से कता तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरें की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिस को सिर्फ़ दहकने से मतलब है वो एक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है उस को छूने की ख़्वाहिश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाक़िफ है बल्कि हर एक रंग के शजरे तक से वाक़िफ है हम ने जिन फूलों को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खेंचती है, सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है सिर्फ़ उसी के हाथों से दुनिया तरतीब में आ सकती है हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाहिश में ज़िंदा लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ हैं हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की क़िस्मत में वो जिस्म कहाँ हैं मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कालेज आ जाती है

Tehzeeb Hafi

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"हाल-ए-दिल" मेरी दिलरुबा तुम ख़ूब-सूरत हो सूरत से नहीं सीरत से मुझे तुम्हारी सीरत से मुहब्बत है इसीलिए सीरत का जानता हूँ शर्म दहशत परेशानी जिन्हें सुख़नवरों कवियों ने इश्क़ की लज़्ज़त बताया है फ़िलहाल ये मेरे दरमियाँ आ रहे हैं बहरहाल मेरी चाहतें तुम्हारे नफ़स में धड़कती हैं ज़िंदा रहती हैं मैं ने तुम्हें देखा है देखते हुए मुझे चाहते हुए मुझे सोचते हुए और मेरे लिए परेशान होते हुए वैसे चाहत हो तो कहना लाज़मी होता है ज़रूरी होता है लेकिन इश्क़ की क़ायनात में लफ़्ज़ ख़ामोश रहते हैं और निग़ाहें बात कर लेती हैं मुझे पता है एक दिन तुम मेरी निग़ाहों से बात कर लोगी पूछ लोगी और तुम्हें जवाब मिलेगा हाँ मैं भी चाहता हूँ ख़ूब चाहता हूँ वैसे मैं भी अपने नग़्मों अपनी ग़ज़लों में मुहब्बत ख़ूब लिखता हूँ हालाँकि सदाक़त ये है कि मैं भी कहने में ख़ौफ़ खाता हूँ वैसे बुरा न मानना कि मैं ने तुम सेे कभी इज़हार नहीं किया सोच लेना कि थियोरी और प्रैक्टिकल में फ़र्क़ होता है ख़ैर अब जो मेरा मौज़ुदा हाल है वो ये है कि आए दिन दिल और दिमाग़ मसअला खड़ा कर देते हैं दिल कहता है तुम ख़ूब-सूरत हो दिमाग़ कहता है मंज़िल पे इख़्तियार करो बहरहाल तुम ख़ूब-सूरत हो तुम ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम सब सेे ज़ियादा ख़ूब-सूरत हो तुम ही ख़ूब-सूरत हो

Rakesh Mahadiuree

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बचपने की दुनिया थी जिस के दम से दम लेती ख़ौफ़ की पिच्छल-पाई ख़्वाब जिस की ज़द में थे सुब्ह ख़्वाब सुनने पर सब बुज़ुर्ग कह देते ख़्वाब की ये बातें हैं हम से दूर बीतेंगी दूर से सुनेंगे हम अब जुदा सी दुनिया है अन-कहे ज़मानों के जीते जागते लम्हे ध्यान से गुज़रते हैं सोच में उतरते हैं पर वो दिन नहीं आए जिस में जागती तक़दीर सुब्ह वो नहीं छूटी ख़्वाब की जो दे ता'बीर दूर से सुना हम ने बर्फ़ में खुली कोंपल ग़र्ब में मची हलचल हुर्रियत हुक़ूक़ अफ़्कार ज़ौक़-ए-आरज़ू आसार ज़ह्न की कमाँ-दारी रंग-नादिरा-कारी इल्म उस की तामीरें बर्क़ एटम आहन से जिस्म खेल सेहत तक इर्तिक़ा की ता'बीरें दूर सब समुंदर पार अपने ख़्वाब कैसे हैं जो नज़र नहीं आते इंतिशार इतना है सौ तरह की ता'बीरें

Ehsan Akbar

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क़दम मिट्टी पे रखती हो कि अर्श ऊपर ठहरते हैं कि जब तुम पाँव धरती हो तो धरती के जिगर की धड़कनें भी आज़माती हो बहारों में बिखरतीं तो तुम्हें बस ढूँडते फिरते मगर तुम रंग-ओ-बू को अपना पस-मंज़र बनाती हो ख़ुश-दिली के क़हक़हे की नुक़रई घंटी के नग़्मों की खनक के साथ सारे मंज़रों पर फैल जाती हो वो साअ'त जिस में तुम दम लो ज़माने की हर इक तक़दीम से बाहर कोई फैला हुआ लम्हा ठहरती है वो सब गोशे जहाँ तन्हाई तुम को खींच ले जाए वहीं तो रेशमी निकहत की तनवीरें बिखरती हैं ये तस्वीरें कि जिन में तुम ने देखा लोग दिन के हफ़्त-ख़्वाँ को काटते गुज़रे ये सब ख़ूँ थूकते ज़ख़्म अपने अपने चाटते इंसाँ फ़क़त उस शाम की आहट पे जाते हैं जहाँ तुम हो

Ehsan Akbar

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ये रंग-ओ-निकहत में बहती दुनिया ये हुस्न-ए-सूरत ये जल्वा-गाहें ये बिजलियों सी लपक अदा की ये बदलियों सी गुदाज़ बाँहें ये नक़्श से फूटते करिश्में ये निकहत-ओ-नूर की पनाहें इक आरज़ू के हज़ार पैकर इक इल्तिजा लाख बारगाहें हयात के सरफ़राज़ी चश्में नशा पिलाती हुई निगाहें जमाल का दिल-नशीं तसव्वुर ख़याल की दिल-पज़ीर राहें हयात मदहोश हो गई है मरी मरी है

Ehsan Akbar

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मिरे हाथों में सूरज की सवारी के सुआगत के लिए गजरे नहीं होते सरों पर हुक्मराँ मेहर-ए-दरख़्शाँ इक क़सीदा मेरे लब से सुन नहीं पाया जब ऐसा है तो क्यूँ नदिया में गिरते ज़र्द लम्हे की दुआ चाहूँ मैं अपनी रात को क्यूँ चाँद की झोली में फैला दूँ कि रात आती नज़र आती है जाती का पता तक भी नहीं चलता सो हैरत क्यूँ जो मैं नय मर्सिया शब का नहीं लिखा

Ehsan Akbar

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हवा से बात करो कहो कि उस की लगाई हुई गिरह न खुली वो धूल थम न सकी दिल के रुख़ जो उड़ती थी वो गर्द उठी नहीं जो आइनों पे बैठी थी सबास बात करो सबास बात करो क्या सवाल था उस का विसाल जिस का तअ'य्युन न था जुदाई से किसे पुकार गया सदास बात करो यही कि जिन को सर-ए-दश्त-ओ-बर पुकारा गया वो सर-कशीदा क़बाइल की सर-फिरी औलाद किस ज़मीं में खपी किस फ़लक का रिज़्क़ हुई क़ज़ा से बात करो क़ज़ा से बात मगर क्या कि हर क़बीला-ए-दर्द इक ऐसे जब्र-ए-अज़ल-याब का हवाला है जो पहले दिन की गवाही सनद में लाता है अगर जवाब से फिर इक सवाल बनता है फ़ना के वास्ते क्यूँ बाब-ए-हर्फ़ बाज़ रहे बहा जहान की ला है तो ला से बात करो इब्तिदास बात करो

Ehsan Akbar

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