हवा से बात करो कहो कि उस की लगाई हुई गिरह न खुली वो धूल थम न सकी दिल के रुख़ जो उड़ती थी वो गर्द उठी नहीं जो आइनों पे बैठी थी सबास बात करो सबास बात करो क्या सवाल था उस का विसाल जिस का तअ'य्युन न था जुदाई से किसे पुकार गया सदास बात करो यही कि जिन को सर-ए-दश्त-ओ-बर पुकारा गया वो सर-कशीदा क़बाइल की सर-फिरी औलाद किस ज़मीं में खपी किस फ़लक का रिज़्क़ हुई क़ज़ा से बात करो क़ज़ा से बात मगर क्या कि हर क़बीला-ए-दर्द इक ऐसे जब्र-ए-अज़ल-याब का हवाला है जो पहले दिन की गवाही सनद में लाता है अगर जवाब से फिर इक सवाल बनता है फ़ना के वास्ते क्यूँ बाब-ए-हर्फ़ बाज़ रहे बहा जहान की ला है तो ला से बात करो इब्तिदास बात करो
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"तू किसी और ही दुनिया में मिली थी मुझ सेे" तू किसी और ही मौसम की महक लाई थी डर रहा था कि कहीं ज़ख़्म न भर जाएँ मेरे और तू मुट्ठियाँ भर-भर के नमक लाई थी और ही तरह की आँखें थी तेरे चेहरे पर तू किसी और सितारे से चमक लाई थी तेरी आवाज़ ही सब कुछ थी मुझे मोनिस-ए-जाँ क्या करुँ मैं कि तू बोली ही बहुत कम मुझ सेे तेरी चुप से ही यही महसूस किया था मैं ने जीत जाएगा तेरा ग़म किसी रोज़ मुझ सेे शहर आवाज़ें लगाता था मगर तू चुप थी ये तअल्लुक़ मुझे खाता था मगर तू चुप थी वही अंजाम था जो इश्क़ का आगाज़ से है तुझ को पाया भी नहीं था कि तुझे खोना था चली आती है यही रस्म कई सदियों से यही होता है, यही होगा, यही होना था पूछता रहता था तुझ सेे कि “बता क्या दुख है?” और मेरी आँख में आँसू भी नहीं होते थे मैं ने अंदाज़े लगाए के सबब क्या होगा पर मेरे तीर तराजू भी नहीं होते थे जिस का डर था मुझे मालूम पड़ा लोगों से फिर वो ख़ुश-बख़्त पलट आया तेरी दुनिया में जिस के जाने पे मुझे तू ने जगह दी दिल में मेरी क़िस्मत में ही जब ख़ाली जगह लिखी थी तुझ सेे शिकवा भी अगर करता तो कैसे करता मैं वो सब्ज़ा था जिसे रौंद दिया जाता है मैं वो जंगल था जिसे काट दिया जाता है मैं वो दर्द था जिसे दस्तक की कमी खाती है मैं वो मंज़िल था जहाँ टूटी सड़क जाती है मैं वो घर था जिसे आबाद नहीं करता कोई मैं तो वो था जिसे याद नहीं करता कोई ख़ैर इस बात को तू छोड़, बता कैसी है? तू ने चाहा था जिसे, वो तेरे नज़दीक तो है? कौन से ग़म ने तुझे चाट लिया अंदर से आज कल फिर से तू चुप रहती है, सब ठीक तो है?
Tehzeeb Hafi
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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
Muneer Niyazi
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ये रंग-ओ-निकहत में बहती दुनिया ये हुस्न-ए-सूरत ये जल्वा-गाहें ये बिजलियों सी लपक अदा की ये बदलियों सी गुदाज़ बाँहें ये नक़्श से फूटते करिश्में ये निकहत-ओ-नूर की पनाहें इक आरज़ू के हज़ार पैकर इक इल्तिजा लाख बारगाहें हयात के सरफ़राज़ी चश्में नशा पिलाती हुई निगाहें जमाल का दिल-नशीं तसव्वुर ख़याल की दिल-पज़ीर राहें हयात मदहोश हो गई है मरी मरी है
Ehsan Akbar
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बचपने की दुनिया थी जिस के दम से दम लेती ख़ौफ़ की पिच्छल-पाई ख़्वाब जिस की ज़द में थे सुब्ह ख़्वाब सुनने पर सब बुज़ुर्ग कह देते ख़्वाब की ये बातें हैं हम से दूर बीतेंगी दूर से सुनेंगे हम अब जुदा सी दुनिया है अन-कहे ज़मानों के जीते जागते लम्हे ध्यान से गुज़रते हैं सोच में उतरते हैं पर वो दिन नहीं आए जिस में जागती तक़दीर सुब्ह वो नहीं छूटी ख़्वाब की जो दे ता'बीर दूर से सुना हम ने बर्फ़ में खुली कोंपल ग़र्ब में मची हलचल हुर्रियत हुक़ूक़ अफ़्कार ज़ौक़-ए-आरज़ू आसार ज़ह्न की कमाँ-दारी रंग-नादिरा-कारी इल्म उस की तामीरें बर्क़ एटम आहन से जिस्म खेल सेहत तक इर्तिक़ा की ता'बीरें दूर सब समुंदर पार अपने ख़्वाब कैसे हैं जो नज़र नहीं आते इंतिशार इतना है सौ तरह की ता'बीरें
Ehsan Akbar
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क़दम मिट्टी पे रखती हो कि अर्श ऊपर ठहरते हैं कि जब तुम पाँव धरती हो तो धरती के जिगर की धड़कनें भी आज़माती हो बहारों में बिखरतीं तो तुम्हें बस ढूँडते फिरते मगर तुम रंग-ओ-बू को अपना पस-मंज़र बनाती हो ख़ुश-दिली के क़हक़हे की नुक़रई घंटी के नग़्मों की खनक के साथ सारे मंज़रों पर फैल जाती हो वो साअ'त जिस में तुम दम लो ज़माने की हर इक तक़दीम से बाहर कोई फैला हुआ लम्हा ठहरती है वो सब गोशे जहाँ तन्हाई तुम को खींच ले जाए वहीं तो रेशमी निकहत की तनवीरें बिखरती हैं ये तस्वीरें कि जिन में तुम ने देखा लोग दिन के हफ़्त-ख़्वाँ को काटते गुज़रे ये सब ख़ूँ थूकते ज़ख़्म अपने अपने चाटते इंसाँ फ़क़त उस शाम की आहट पे जाते हैं जहाँ तुम हो
Ehsan Akbar
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शहर-ए-ला-मकाँ से हूँ जिस में इक मकाँ मेरा ख़्वाब से उभरता है दूधिया सवेरा सा ध्यान में निखरता है जो हदों से आरी है इंतिहा नहीं रखता चौखटें दरीचे दर क्या गुमान में आएँ (सेहन आँगन और दीवार का ख़याल ही बे-कार) चार सम्त की दीवार चाहे कितनी फैली हो आप का अहाता है आप का है घेराव क्यूँँ गिरफ़्त में आऊँ क्यूँँ मुझे कोई घेरे सिर्फ़ एक ख़्वाहिश है बे-हुदूद आज़ादी!
Ehsan Akbar
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हवा मिरी राज़-दाँ नहीं है कि चतर इस का हज़ार सायों पे मेहरबाँ है करोड़ों लोगों के सोज़-ए-अन्फ़ास का धुआँ है हवा फ़क़त उस नहीफ़ लम्हे की दास्ताँ है कि जिस का आलम गुज़िश्तनी है जो इक नफ़स का ही मेहमाँ है हवा ही सारी महक उगलती हुई बहारों की तर्जुमाँ है हमारे अंदर छुपे वजूदों सुबुक मसामों की राज़-दाँ है गुज़रते जिस्मों को नश्र करती हुई हवा राज़-दाँ नहीं है मगर हवा तेरे मेरे ख़्वाबों के दरमियाँ साँस फूँकती है हमारी साँसों की डोरियों को हमारे जिस्मों से जोड़ती है हमारे ताँबे हमारे पीतल हमारे सब सागवान चेहरे हमारे अपनों के तन की ठंडी महक के ग़ाज़े से ढाँपती है मिरा हवा से फ़क़त यही एक राब्ता है उसे मिरा राज़-दाँ न कहना हवा से अपने अज़ाब-ए-लम्हात की कोई दास्ताँ न कहना
Ehsan Akbar
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