क़दम मिट्टी पे रखती हो कि अर्श ऊपर ठहरते हैं कि जब तुम पाँव धरती हो तो धरती के जिगर की धड़कनें भी आज़माती हो बहारों में बिखरतीं तो तुम्हें बस ढूँडते फिरते मगर तुम रंग-ओ-बू को अपना पस-मंज़र बनाती हो ख़ुश-दिली के क़हक़हे की नुक़रई घंटी के नग़्मों की खनक के साथ सारे मंज़रों पर फैल जाती हो वो साअ'त जिस में तुम दम लो ज़माने की हर इक तक़दीम से बाहर कोई फैला हुआ लम्हा ठहरती है वो सब गोशे जहाँ तन्हाई तुम को खींच ले जाए वहीं तो रेशमी निकहत की तनवीरें बिखरती हैं ये तस्वीरें कि जिन में तुम ने देखा लोग दिन के हफ़्त-ख़्वाँ को काटते गुज़रे ये सब ख़ूँ थूकते ज़ख़्म अपने अपने चाटते इंसाँ फ़क़त उस शाम की आहट पे जाते हैं जहाँ तुम हो
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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी
Tehzeeb Hafi
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"ख़्वाब नहीं देखा" मैं ने मुद्दत से कोई ख़्वाब नहीं देखा है रात खिलने का गुलाबों से महक आने का ओस की बूंदों में सूरज के समा जाने का चाँद सी मिट्टी के ज़र्रों से सदा आने का शहर से दूर किसी गाँव में रह जाने का खेत खलियानों में बाग़ों में कहीं गाने का सुब्ह घर छोड़ने का देर से घर आने का बहते झरनों की खनकती हुई आवाज़ों का चहचहाती हुई चिड़ियों से लदी शाख़ों का नर्गिसी आँखों में हँसती हुई नादानी का मुस्कुराते हुए चेहरे की ग़ज़ल ख़्वानी का तेरा हो जाने तिरे प्यार में खो जाने का तेरा कहलाने का तेरा ही नज़र आने का मैं ने मुद्दत से कोई ख़्वाब नहीं देखा है हाथ रख दे मिरी आँखों पे कि नींद आ जाए
Waseem Barelvi
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"बन्दा और ख़ुदा" एक मुख़्तसर सी कहानी है जो ज़फ़र कि मुँह-ज़बानी है ये हुकूमत आसमानी है हर मख़्लूक़ रूहानी है ये ख़ुदा की मेहरबानी है की सज्दों में झुकती पेशानी है ये सारी दुनिया फ़ानी है हर शख़्स को मौत आनी है ये इंसानियत अय्याशी की दीवानी है हर शख़्स की ढलती जवानी है क़ुदरत की पकड़ से कोई नहीं बचा ये आ रहे अज़ाब क़यामत की निशानी है ये लोगों की गुमराही और बड़ी नादानी है की कहाँ ऊपर ख़ुदा को शक्ल हमें दिखानी है
ZafarAli Memon
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"कब" कब ये पेड़ हरे होंगे फिर से कब ये कलियाँ फूटेंगी और ये फूल हसेंगे कब ये झरने अपनी प्यास भरेंगे कब ये नदियाँ शोर मचाएँगी कब ये आज़ाद किए जाएँगे सब पंछी कब जंगल साँसे लेंगे कब सब जाएँगे अपने घर कब हाथों से ज़ंजीरें खोली जाएँगी कब हम ऐसों को पूछेगा कोई और ये फ़क़ीरों को भी क़िस्से में लाया जाएगा कब इन काँटों की भी क़ीमत होगी और मिट्टी सोने के भाव में आएगी कब लोगों की ग़लती टाली जाएगी कब ये हवाएँ पायल पहने झूमेगी कब अंबर से परियाँ उतरेंगी कब पत्थरों से भी ख़ुशबू आएगी कब हंसों के जोड़ें नदियों पे बैठेंगे बरखा गीत बनाएगी और मोर उठा के पर कत्थक करते देखे जाएँगे नीलकमल पानी से इश्क़ लड़ाएंगे मछलियाँ ख़ुशी के गोते मारेंगी कब कोयल की कूक सुनाई देगी कब भॅंवरे फिर गुन- गुन करते लौटेंगे बागों में और कब ये प्यारी तितलियाँ कलर फेकेंगी फिर सब कुछ डूबा होगा रंगों में कब ये दुनिया रौशन होगी कब ये जुगनू अपने रंग में आएँगे कब ये सब मुमकिन है कब सबके ही सपने पूरे होंगे कब अपने मन के मुताबिक़ होगा सब कुछ कब ये बहारें लोटेंगी कब वो तारीख़ आएगी बस मुझ को ही नहीं सब को इंतिज़ार है तेरे ' बर्थडे ' का
BR SUDHAKAR
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काश काश तुम समझ पाते काश मैं बता पाती काश तुम यहीं रहते काश मैं बुला पाती काश आप का कोई हम क़दम बना होता काश भेद खुल जाते काश मैं छुपा पाती काश नींद आ जाए काश ख़्वाब में आओ काश जानती क़िस्मत काश मैं दिखा पाती
Arohi Tripathi
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शहर-ए-ला-मकाँ से हूँ जिस में इक मकाँ मेरा ख़्वाब से उभरता है दूधिया सवेरा सा ध्यान में निखरता है जो हदों से आरी है इंतिहा नहीं रखता चौखटें दरीचे दर क्या गुमान में आएँ (सेहन आँगन और दीवार का ख़याल ही बे-कार) चार सम्त की दीवार चाहे कितनी फैली हो आप का अहाता है आप का है घेराव क्यूँँ गिरफ़्त में आऊँ क्यूँँ मुझे कोई घेरे सिर्फ़ एक ख़्वाहिश है बे-हुदूद आज़ादी!
Ehsan Akbar
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बचपने की दुनिया थी जिस के दम से दम लेती ख़ौफ़ की पिच्छल-पाई ख़्वाब जिस की ज़द में थे सुब्ह ख़्वाब सुनने पर सब बुज़ुर्ग कह देते ख़्वाब की ये बातें हैं हम से दूर बीतेंगी दूर से सुनेंगे हम अब जुदा सी दुनिया है अन-कहे ज़मानों के जीते जागते लम्हे ध्यान से गुज़रते हैं सोच में उतरते हैं पर वो दिन नहीं आए जिस में जागती तक़दीर सुब्ह वो नहीं छूटी ख़्वाब की जो दे ता'बीर दूर से सुना हम ने बर्फ़ में खुली कोंपल ग़र्ब में मची हलचल हुर्रियत हुक़ूक़ अफ़्कार ज़ौक़-ए-आरज़ू आसार ज़ह्न की कमाँ-दारी रंग-नादिरा-कारी इल्म उस की तामीरें बर्क़ एटम आहन से जिस्म खेल सेहत तक इर्तिक़ा की ता'बीरें दूर सब समुंदर पार अपने ख़्वाब कैसे हैं जो नज़र नहीं आते इंतिशार इतना है सौ तरह की ता'बीरें
Ehsan Akbar
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हमें क्या चाँदनी की रात क्या रातों की तारीकी बस इतना है कि रौशन रात में गर तेज़ चलना ही ज़रूरी हो तो चल सकते हैं वर्ना चाँदनी की ज़र्द चादर में छुपे भेदों भरे फ़ित्ने सफ़र करने नहीं देते अंधेरे में हमें फ़ित्नों के सर पर पाँव रख कर बढ़ते जाना दश्त में आसान रहता है
Ehsan Akbar
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ये रंग-ओ-निकहत में बहती दुनिया ये हुस्न-ए-सूरत ये जल्वा-गाहें ये बिजलियों सी लपक अदा की ये बदलियों सी गुदाज़ बाँहें ये नक़्श से फूटते करिश्में ये निकहत-ओ-नूर की पनाहें इक आरज़ू के हज़ार पैकर इक इल्तिजा लाख बारगाहें हयात के सरफ़राज़ी चश्में नशा पिलाती हुई निगाहें जमाल का दिल-नशीं तसव्वुर ख़याल की दिल-पज़ीर राहें हयात मदहोश हो गई है मरी मरी है
Ehsan Akbar
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मिरे हाथों में सूरज की सवारी के सुआगत के लिए गजरे नहीं होते सरों पर हुक्मराँ मेहर-ए-दरख़्शाँ इक क़सीदा मेरे लब से सुन नहीं पाया जब ऐसा है तो क्यूँ नदिया में गिरते ज़र्द लम्हे की दुआ चाहूँ मैं अपनी रात को क्यूँ चाँद की झोली में फैला दूँ कि रात आती नज़र आती है जाती का पता तक भी नहीं चलता सो हैरत क्यूँ जो मैं नय मर्सिया शब का नहीं लिखा
Ehsan Akbar
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