nazmKuch Alfaaz

शहर-ए-ला-मकाँ से हूँ जिस में इक मकाँ मेरा ख़्वाब से उभरता है दूधिया सवेरा सा ध्यान में निखरता है जो हदों से आरी है इंतिहा नहीं रखता चौखटें दरीचे दर क्या गुमान में आएँ (सेहन आँगन और दीवार का ख़याल ही बे-कार) चार सम्त की दीवार चाहे कितनी फैली हो आप का अहाता है आप का है घेराव क्यूँँ गिरफ़्त में आऊँ क्यूँँ मुझे कोई घेरे सिर्फ़ एक ख़्वाहिश है बे-हुदूद आज़ादी!

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइ‌नात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर

Afkar Alvi

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

Faiz Ahmad Faiz

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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं

Tehzeeb Hafi

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बचपने की दुनिया थी जिस के दम से दम लेती ख़ौफ़ की पिच्छल-पाई ख़्वाब जिस की ज़द में थे सुब्ह ख़्वाब सुनने पर सब बुज़ुर्ग कह देते ख़्वाब की ये बातें हैं हम से दूर बीतेंगी दूर से सुनेंगे हम अब जुदा सी दुनिया है अन-कहे ज़मानों के जीते जागते लम्हे ध्यान से गुज़रते हैं सोच में उतरते हैं पर वो दिन नहीं आए जिस में जागती तक़दीर सुब्ह वो नहीं छूटी ख़्वाब की जो दे ता'बीर दूर से सुना हम ने बर्फ़ में खुली कोंपल ग़र्ब में मची हलचल हुर्रियत हुक़ूक़ अफ़्कार ज़ौक़-ए-आरज़ू आसार ज़ह्न की कमाँ-दारी रंग-नादिरा-कारी इल्म उस की तामीरें बर्क़ एटम आहन से जिस्म खेल सेहत तक इर्तिक़ा की ता'बीरें दूर सब समुंदर पार अपने ख़्वाब कैसे हैं जो नज़र नहीं आते इंतिशार इतना है सौ तरह की ता'बीरें

Ehsan Akbar

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क़दम मिट्टी पे रखती हो कि अर्श ऊपर ठहरते हैं कि जब तुम पाँव धरती हो तो धरती के जिगर की धड़कनें भी आज़माती हो बहारों में बिखरतीं तो तुम्हें बस ढूँडते फिरते मगर तुम रंग-ओ-बू को अपना पस-मंज़र बनाती हो ख़ुश-दिली के क़हक़हे की नुक़रई घंटी के नग़्मों की खनक के साथ सारे मंज़रों पर फैल जाती हो वो साअ'त जिस में तुम दम लो ज़माने की हर इक तक़दीम से बाहर कोई फैला हुआ लम्हा ठहरती है वो सब गोशे जहाँ तन्हाई तुम को खींच ले जाए वहीं तो रेशमी निकहत की तनवीरें बिखरती हैं ये तस्वीरें कि जिन में तुम ने देखा लोग दिन के हफ़्त-ख़्वाँ को काटते गुज़रे ये सब ख़ूँ थूकते ज़ख़्म अपने अपने चाटते इंसाँ फ़क़त उस शाम की आहट पे जाते हैं जहाँ तुम हो

Ehsan Akbar

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हमें क्या चाँदनी की रात क्या रातों की तारीकी बस इतना है कि रौशन रात में गर तेज़ चलना ही ज़रूरी हो तो चल सकते हैं वर्ना चाँदनी की ज़र्द चादर में छुपे भेदों भरे फ़ित्ने सफ़र करने नहीं देते अंधेरे में हमें फ़ित्नों के सर पर पाँव रख कर बढ़ते जाना दश्त में आसान रहता है

Ehsan Akbar

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हवा मिरी राज़-दाँ नहीं है कि चतर इस का हज़ार सायों पे मेहरबाँ है करोड़ों लोगों के सोज़-ए-अन्फ़ास का धुआँ है हवा फ़क़त उस नहीफ़ लम्हे की दास्ताँ है कि जिस का आलम गुज़िश्तनी है जो इक नफ़स का ही मेहमाँ है हवा ही सारी महक उगलती हुई बहारों की तर्जुमाँ है हमारे अंदर छुपे वजूदों सुबुक मसामों की राज़-दाँ है गुज़रते जिस्मों को नश्र करती हुई हवा राज़-दाँ नहीं है मगर हवा तेरे मेरे ख़्वाबों के दरमियाँ साँस फूँकती है हमारी साँसों की डोरियों को हमारे जिस्मों से जोड़ती है हमारे ताँबे हमारे पीतल हमारे सब सागवान चेहरे हमारे अपनों के तन की ठंडी महक के ग़ाज़े से ढाँपती है मिरा हवा से फ़क़त यही एक राब्ता है उसे मिरा राज़-दाँ न कहना हवा से अपने अज़ाब-ए-लम्हात की कोई दास्ताँ न कहना

Ehsan Akbar

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ख़िज़ाँ में अब फूल आने वाले हैं तुम मगर साथ साथ रहना कि हम सवाब-ओ-ख़ता के क़िस्सों का ज़िक्र कर के फ़ज़ा को पहले ही इतना बोझल बना चुके हैं कि ख़ुश्क पत्ता भी गिरने लग जाए तो हवा सिसकियाँ सी लेती है चीख़ती है उदास लम्हों में रौशनी अपने साथ रखना तुम अपने हाथों की ओट कर के चराग़ लाओ तो याद रखना कि रौशनी से दियों को भरना करम नहीं है किसी पे एहसान तो नहीं है कि हम ने किरनें बिखेर दी हैं कि रौशनी सब की ज़िंदगी है गुलों की पस्पाइयों की राहों को रोकना हो तो नूर बाँटो कि रौशनी नक़्द-ए-ज़िंदगी है ख़िज़ाँ के फूलों से तुम न कहना गई रुतों की हलावतें क्या थीं रंग क्या था रुतों के ज़िंदा सियाक़ मुर्दा सबाक़ से अपना रब्त क्या था हमें रुतों के मिटे निशानों से ढूँढ़ना हैं वो नाम जो याद रह गए हैं निशान बे-नाम सूरतों के जो कल उगेंगी चराग़ फूलों के इन हवाओं में जलना मुश्किल हैं जल गए तो उजाला जितना भी हो बहुत है

Ehsan Akbar

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