ख़िज़ाँ में अब फूल आने वाले हैं तुम मगर साथ साथ रहना कि हम सवाब-ओ-ख़ता के क़िस्सों का ज़िक्र कर के फ़ज़ा को पहले ही इतना बोझल बना चुके हैं कि ख़ुश्क पत्ता भी गिरने लग जाए तो हवा सिसकियाँ सी लेती है चीख़ती है उदास लम्हों में रौशनी अपने साथ रखना तुम अपने हाथों की ओट कर के चराग़ लाओ तो याद रखना कि रौशनी से दियों को भरना करम नहीं है किसी पे एहसान तो नहीं है कि हम ने किरनें बिखेर दी हैं कि रौशनी सब की ज़िंदगी है गुलों की पस्पाइयों की राहों को रोकना हो तो नूर बाँटो कि रौशनी नक़्द-ए-ज़िंदगी है ख़िज़ाँ के फूलों से तुम न कहना गई रुतों की हलावतें क्या थीं रंग क्या था रुतों के ज़िंदा सियाक़ मुर्दा सबाक़ से अपना रब्त क्या था हमें रुतों के मिटे निशानों से ढूँढ़ना हैं वो नाम जो याद रह गए हैं निशान बे-नाम सूरतों के जो कल उगेंगी चराग़ फूलों के इन हवाओं में जलना मुश्किल हैं जल गए तो उजाला जितना भी हो बहुत है
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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शहर-ए-ला-मकाँ से हूँ जिस में इक मकाँ मेरा ख़्वाब से उभरता है दूधिया सवेरा सा ध्यान में निखरता है जो हदों से आरी है इंतिहा नहीं रखता चौखटें दरीचे दर क्या गुमान में आएँ (सेहन आँगन और दीवार का ख़याल ही बे-कार) चार सम्त की दीवार चाहे कितनी फैली हो आप का अहाता है आप का है घेराव क्यूँँ गिरफ़्त में आऊँ क्यूँँ मुझे कोई घेरे सिर्फ़ एक ख़्वाहिश है बे-हुदूद आज़ादी!
Ehsan Akbar
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मिरे हाथों में सूरज की सवारी के सुआगत के लिए गजरे नहीं होते सरों पर हुक्मराँ मेहर-ए-दरख़्शाँ इक क़सीदा मेरे लब से सुन नहीं पाया जब ऐसा है तो क्यूँ नदिया में गिरते ज़र्द लम्हे की दुआ चाहूँ मैं अपनी रात को क्यूँ चाँद की झोली में फैला दूँ कि रात आती नज़र आती है जाती का पता तक भी नहीं चलता सो हैरत क्यूँ जो मैं नय मर्सिया शब का नहीं लिखा
Ehsan Akbar
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बचपने की दुनिया थी जिस के दम से दम लेती ख़ौफ़ की पिच्छल-पाई ख़्वाब जिस की ज़द में थे सुब्ह ख़्वाब सुनने पर सब बुज़ुर्ग कह देते ख़्वाब की ये बातें हैं हम से दूर बीतेंगी दूर से सुनेंगे हम अब जुदा सी दुनिया है अन-कहे ज़मानों के जीते जागते लम्हे ध्यान से गुज़रते हैं सोच में उतरते हैं पर वो दिन नहीं आए जिस में जागती तक़दीर सुब्ह वो नहीं छूटी ख़्वाब की जो दे ता'बीर दूर से सुना हम ने बर्फ़ में खुली कोंपल ग़र्ब में मची हलचल हुर्रियत हुक़ूक़ अफ़्कार ज़ौक़-ए-आरज़ू आसार ज़ह्न की कमाँ-दारी रंग-नादिरा-कारी इल्म उस की तामीरें बर्क़ एटम आहन से जिस्म खेल सेहत तक इर्तिक़ा की ता'बीरें दूर सब समुंदर पार अपने ख़्वाब कैसे हैं जो नज़र नहीं आते इंतिशार इतना है सौ तरह की ता'बीरें
Ehsan Akbar
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हवा से बात करो कहो कि उस की लगाई हुई गिरह न खुली वो धूल थम न सकी दिल के रुख़ जो उड़ती थी वो गर्द उठी नहीं जो आइनों पे बैठी थी सबास बात करो सबास बात करो क्या सवाल था उस का विसाल जिस का तअ'य्युन न था जुदाई से किसे पुकार गया सदास बात करो यही कि जिन को सर-ए-दश्त-ओ-बर पुकारा गया वो सर-कशीदा क़बाइल की सर-फिरी औलाद किस ज़मीं में खपी किस फ़लक का रिज़्क़ हुई क़ज़ा से बात करो क़ज़ा से बात मगर क्या कि हर क़बीला-ए-दर्द इक ऐसे जब्र-ए-अज़ल-याब का हवाला है जो पहले दिन की गवाही सनद में लाता है अगर जवाब से फिर इक सवाल बनता है फ़ना के वास्ते क्यूँ बाब-ए-हर्फ़ बाज़ रहे बहा जहान की ला है तो ला से बात करो इब्तिदास बात करो
Ehsan Akbar
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ये रंग-ओ-निकहत में बहती दुनिया ये हुस्न-ए-सूरत ये जल्वा-गाहें ये बिजलियों सी लपक अदा की ये बदलियों सी गुदाज़ बाँहें ये नक़्श से फूटते करिश्में ये निकहत-ओ-नूर की पनाहें इक आरज़ू के हज़ार पैकर इक इल्तिजा लाख बारगाहें हयात के सरफ़राज़ी चश्में नशा पिलाती हुई निगाहें जमाल का दिल-नशीं तसव्वुर ख़याल की दिल-पज़ीर राहें हयात मदहोश हो गई है मरी मरी है
Ehsan Akbar
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