अभी कुछ दिन लगेंगे दिल ऐसे शहर के पामाल हो जाने का मंज़र भूलने में अभी कुछ दिन लगेंगे जहान-ए-रंग के सारे ख़स-ओ-ख़ाशाक सब सर्व-ओ-सनोबर भूलने में अभी कुछ दिन लगेंगे थके हारे हुए ख़्वाबों के साहिल पर कहीं उम्मीद का छोटा सा इक घर बनते बनते रह गया है वो इक घर भूलने में अभी कुछ दिन लगेंगे मगर अब दिन भी कितने रह गए हैं बस इक दिन दिल की लौह-ए-मुंतज़िर पर आचानक रात उतरेगी मिरी बे-नूर आँखों के ख़ज़ाने में छुपे हर ख़्वाब की तकमील कर देगी मुझे भी ख़्वाब में तब्दील कर देगी इक ऐसा ख़्वाब जस का देखना मुमकिन नहीं था इक ऐसा ख़्वाब जिस के दामन-ए-सद-चाक में कोई मुबारक कोई रौशन दिन नहीं था अभी कुछ दिन लगेंगे
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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Faiz Ahmad Faiz
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम किस के हाथ का माँझा खरा था और किस की डोर हल्की थी उन्हें इस से ग़रज़ क्या पेँच पड़ते वक़्त किन हाथों में लर्ज़ा आ गया था और किस की खेंच अच्छी थी? हवा किस की तरफ़ थी, कौन सी पाली की बैरी थी? पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम? उन्हें तो बस बसंत आते ही अपनी अपनी डाँगेँ ले के मैदानों में आना है गली-कूचों में काँटी मारना है पतंगें लूटना है लूट के जौहर दिखाना है पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम किस के हाथ का माँझा खरा था और किस की डोर हल्की थी?
Iftikhar Arif
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रात दिन ख़्वाब बुनती हुई ज़िंदगी दिल में नक़्द-ए-इज़ाफ़ी की लौ आँख बार-ए-अमानत से चूर मौज-ए-ख़ूँ बे-नियाज़-ए-मआल दश्त-ए-बे-रंग से दर्द के फूल चुनती हुई ज़िंदगी ख़ौफ़-ए-वामांदगी से ख़जिल आरज़ूओं के आशोब से मुज़्महिल मुँह के बल ख़ाक पर आ पड़ी हर तरफ़ इक भयानक सुकूत कोई नौहा न आँसू न फूल हासिल-ए-जिस्म-ओ-जाँ बे-निशाँ रहगुज़ारों की धूल अजनबी शहर में ख़ाक-बर-सर हुई ज़िंदगी कैसी बे-घर हुई ज़िंदगी
Iftikhar Arif
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जिस्म के रास्तों से गुज़र कर मुतमइन नफ़्स की आरज़ू में जो भी निकला वो वापस न आया रूह की वहशतों में उलझ कर मुतमइन नफ़्स की आरज़ू में जो भी निकला वो वापस न आया लोग फिर देखते क्यूँँ नहीं हैं लोग फिर सोचते क्यूँँ नहीं हैं लोग फिर बोलते क्यूँँ नहीं हैं
Iftikhar Arif
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अली-इफ़्तिख़ार' की माँ से मैं ने बता दिया है कि अपने बेटे को तितलियों के क़रीब जाने से रोकिए उसे रोकिए कि पड़ोसियों के घरों में झूले पड़े हुए हैं तो उस से क्या उसे क्या पड़ी कि कबूतरों को बताए कैसे हवाएँ उस की पतंग छीन के ले गईं 'अली-इफ़्तिख़ार' की माँ से मैं ने बता दिया है कि अपने बेटे को तितलियों के क़रीब जाने से रोकिए कहीं यूँँ न हो कि फिर एक बार भरी बहार में ए'तिबार के सारे ज़ख़्म महक उठें कहीं यूँँ न हो कि नए सिरे से हमारे ज़ख़्म महक उठें 'अली-इफ़्तिख़ार' की माँ से मैं ने बता दिया है कि अपने बेटे को तितलियों के क़रीब जाने से रोकिए
Iftikhar Arif
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कभी कभी दिल ये सोचता है न जाने हम बे-यक़ीन लोगों को नाम-ए-हैदर से रब्त क्यूँँ है हकीम जाने वो कैसी हिकमत से आश्ना था शजीअ जाने कि बदर ओ ख़ैबर की फ़त्ह-मंदी का राज़ क्या था अलीम जाने वो इल्म के कौन से सफ़ीनों का ना-ख़ुदा था मुझे तो बस सिर्फ़ ये ख़बर है वो मेरे मौला की ख़ुशबुओं में रचा-बसा था वो उन के दामान-ए-आतिफ़त में पला बढ़ा था और उस के दिन रात मेरे आक़ा के चश्म ओ अबरू ओ जुम्बिश-ए-लब के मुंतज़िर थे वो रात को दुश्मनों के नर्ग़े में सो रहा था तो उन की ख़ातिर जिदाल में सर से पाँव तक सुर्ख़ हो रहा था तो उन की ख़ातिर सो उस को महबूब जानता हूँ सो उस को मक़्सूद मानता हूँ सआदतें उस के नाम से हैं मोहब्बतें उस के नाम से हैं मोहब्बतों के सभी घरानों की निस्बतें उस के नाम से हैं
Iftikhar Arif
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