nazmKuch Alfaaz

अधूरा सफ़र तुम्हारे ख़्वाब की प्यासी मेरी आँखें ने पूछा है कि मैं ने टूटते तारों से तुम को क्यूँ नहीं माँगा ख़ुदा के दर पे जा कर अपने सर को क्यूँ नहीं फोड़ा उन्हें लगता है मुझ को इश्क़ करना ही नहीं आया तुम इक दिन रू-ब-रू आ कर कोई क़िस्सा सुना दो ना मुझे तो कुछ समझ आता नहीं उन को बताएं क्या गुजरते वक़्त रस्तों से दरख़्तों ने मुझे टोका कि जिन के छांव में हम ने कभी सपने उगाए थे खिजां सी छा गई उन पर अकेला देख कर मुझ को बहुत अफ़सोस था उन को कि अपने इश्क़ के सपने मुहब्बत की बहारों के बिना वो टूट कर बिखरे सितारे काली रातों के अमावस का वो काला चाँद अभी भी तुझ सेे मेरे बस्ल के सपने सजाते हैं यक़ीं उन को है अब भी फिर से तू मेरी हो जाएगी मगर मुझ को नहीं लगता कि अब तेरा इरादा है अगर तेरा इरादा हो भी जाए फिर भी मत आना अगर तुम लौट के आए तो फिर जाने नहीं दूँगा परिंदे की तरह तुम को मैं ख़ुद में क़ैद कर लूंगा सफ़र वो जिन को मिल कर के हमें अंजाम देना था मुकम्मल इश्क़ कर, जिन को हमें ईनाम देना था हमारी राह तकते आँख से महरूम हो बैठे भटकते फिर रहें हैं अब किसी अंजान रस्ते पर सभी से पूछते तेरी गली तेरा पता-ओ-दर उन्हें लगता है ये तू बात उन की मान जाएगी हमारी ज़िन्दगी में फिर तू वापस लौट आएगी

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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........

Varun Anand

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"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने

"Nadeem khan' Kaavish"

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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना

Rishabh Sharma

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मिरी हयात ये है और ये तुम्हारी क़ज़ा ज़ियादा किस से कहूँ और किस को कम बोलो तुम अहल-ए-ख़ाना रहे और मैं यतीम हुआ तुम्हारा दर्द बड़ा है या मेरा ग़म बोलो तुम्हारा दौर था घर में बहार हँसती थी अभी तो दर पे फ़क़त रंज-ओ-ग़म की दस्तक है तुम्हारे साथ का मौसम बड़ा हसीन रहा तुम्हारे बा'द का मौसम बड़ा भयानक है हज़ारों क़र्ज़ थे मुझ पर तुम्हारी उल्फ़त के मुझे वो क़र्ज़ चुकाने का मौक़ा तो देते तुम्हारा ख़ून मिरे जिस्म में मचलता रहा ज़रा से क़तरे बहाने का मौक़ा तो देते बड़े सुकून से तुम सो गए वहाँ जा कर ये कैसे नींद तुम्हें आ गई नए घर में हर एक शब मैं फ़क़त करवटें बदलता हूँ तुम्हारी क़ब्र के कंकर हों जैसे बिस्तर में मैं बोझ काँधों पे ऐसे उठा के चलता हूँ तुम्हारा जैसे जनाज़ा उठा के चलता था यहाँ पे मेरी परेशानी सिर्फ़ मेरी है वहाँ कोई न कोई कांधा तो बदलता था तुम्हारी शम-ए-तमन्ना बस एक रात बुझी चराग़ मेरी तवक़्क़ो के रोज़ बुझते हैं मैं साँस लूँ भी तो कैसे कि मेरी साँसों में तुम्हारी डूबती साँसों के तीर चुभते हैं मैं जब भी छूता हूँ अपने बदन की मिट्टी को तो लम्स फिर उसी ठंडे बदन का होता है लिबास रोज़ बदलता हूँ मैं भी सब की तरह मगर ख़याल तुम्हारे कफ़न का होता है बहुत तवील कहानी है मेरी हस्ती की तुम्हारी मौत तो इक मुख़्तसर फ़साना है वो जिस गली से जनाज़ा तुम्हारा निकला था उसी गली से मिरा रोज़ आना जाना है मैं कोई राह हूँ तुम राह देखने वाले कि मुंतज़िर तो मरा पर न इंतिज़ार मरा तुम्हारी मौत मिरी ज़िंदगी से बेहतर है तुम एक बार मरे मैं तो बार बार मरा

Zubair Ali Tabish

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वो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थे जो इश्क़ को काम समझते थे या काम से आशिक़ी करते थे हम जीते-जी मसरूफ़ रहे कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया काम इश्क़ के आड़े आता रहा और इश्क़ से काम उलझता रहा फिर आख़िर तंग आ कर हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया

Faiz Ahmad Faiz

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अभी अभी की बात है अभी अभी तो मुहब्बत खिली ही थी मुझ में अभी अभी मेरे दिल को करार आया था अभी अभी तो समझ पाए इश्क़ मेरा तुम अभी अभी तो तुम्हें मुझ पे प्यार आया था अभी अभी तो बहुत दूर जाना था हम को अभी सफ़र की शुरुआत होने वाली थी वो देर रात की बातें शुरू हुईं थी अभी अभी तो दिल में छिपी बात होने वाली थी अभी तो राज कई बांटने को थे बाकी अभी तो ख़्वाब कई बांटने को थे बाकी अभी तो रात में रोने की रस्म थी बाकी अभी तो नींद को खोने की रस्म थी बाकी वो रूठने का मनाने का सिलसिला होता हमारे चैन का बस तू ही मरहला होता हमारे कमरे में तस्वीर बस तेरी होती मुझे दु'आओं के एवज़ में तू मिली होती मगर ये ठीक किया तुम ने छोड़ कर मुझ को हमारे हाल पे तन्हा सा छोड़ कर मुझ को मैं शा'इरी के सिवा और क्या तुम्हें देता हमारी जेब में ग़ज़लों के बा'द कुछ भी नहीं बस इक क़लम के सिवा मेरे हात कुछ भी नहीं तू ये न सोचना हम तुझ को बद-दुआ देंगे अगर तू ख़त्म भी कर दे तो बस दुआ देंगे

Aditya

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“मुझ में बाकी तुम” कभी तन्हाइयों में जब हमें तुम याद आते हो जुदा होते हुए भी साथ में लम्हे बिताते हो तुम्हें कैसे भुला दूँ मैं तुम्हें फिर क्यूँ भुला दूँ मैं कभी जब डूबने लगता हूँ दुनिया के फसानों में तुम्हीं यादों में आ कर फिर मुझे साहिल पे लाते हो तुम्हें कैसे भुला दूँ मैं तुम्हें फिर क्यूँ भुला दूँ मैं हमारे इश्क़ के चर्चे अगर होते हैं महफ़िल में नमी आँखों में ला कर के हमें भी तुम रुलाते हो तुम्हें कैसे भुला दूँ मैं तुम्हें फिर क्यूँ भुला दूँ मैं मुझे ये वक़्त चुभता है कभी जब खार के जैसे मेरे जख्मों पे चुपके से तुम्हीं गुलशन सजाते हो तुम्हें कैसे भुला दूँ मैं तुम्हें फिर क्यूँ भुला दूँ मैं

Aditya

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"अपनापन" जाने क्यूँँ घर की टैरिस पर पैरों की आपाधापी जोरों पर होती है जैसे चाँद को छूने जाना है दिन दिन भर मैं धूप में ख़ुद को ऐसे सेका करता हूँ जैसे तन पर धूप रगड़ कर हीरे सा चमकाना है लेकिन वो मतवाला चाँद न जाने क्यूँँ छुप जाता है बादल के पर्दों से हो कर मुझ सेे आँख चुराता है मदमस्त हवाएँ मुझ सेे कुछ ऐसे लिपटा करती हैं जैसे टूटी कश्ती को कोई साहिल मिल जाता है बारिश की बूँदें भी मुझ को जी भर के यूँ पीती हैं उन के दिल की नदियाँ मानो इक मुद्दत से रीती हैं जाने क्या रिश्ता है ये सब इतने अपने लगते हैं अनसोई रातों के भूले बिसरे सपने लगते हैं

Aditya

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