अभी अभी की बात है अभी अभी तो मुहब्बत खिली ही थी मुझ में अभी अभी मेरे दिल को करार आया था अभी अभी तो समझ पाए इश्क़ मेरा तुम अभी अभी तो तुम्हें मुझ पे प्यार आया था अभी अभी तो बहुत दूर जाना था हम को अभी सफ़र की शुरुआत होने वाली थी वो देर रात की बातें शुरू हुईं थी अभी अभी तो दिल में छिपी बात होने वाली थी अभी तो राज कई बांटने को थे बाकी अभी तो ख़्वाब कई बांटने को थे बाकी अभी तो रात में रोने की रस्म थी बाकी अभी तो नींद को खोने की रस्म थी बाकी वो रूठने का मनाने का सिलसिला होता हमारे चैन का बस तू ही मरहला होता हमारे कमरे में तस्वीर बस तेरी होती मुझे दु'आओं के एवज़ में तू मिली होती मगर ये ठीक किया तुम ने छोड़ कर मुझ को हमारे हाल पे तन्हा सा छोड़ कर मुझ को मैं शा'इरी के सिवा और क्या तुम्हें देता हमारी जेब में ग़ज़लों के बा'द कुछ भी नहीं बस इक क़लम के सिवा मेरे हात कुछ भी नहीं तू ये न सोचना हम तुझ को बद-दुआ देंगे अगर तू ख़त्म भी कर दे तो बस दुआ देंगे
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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मुझ को इतने से काम पे रख लो जब भी सीने में झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उस को जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुरा के बस इतना-सा कह दो 'आह, चुभता है ये, अलग कर दो।' जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किसी किवाड़ से अटके इक नज़र देख लो तो काफ़ी है 'प्लीज़' कह दो तो अच्छा है लेकिन मुस्कुराने की शर्त पक्की है मुस्कुराहट मुआवज़ा है मेरा मुझ को इतने से काम पे रख लो
Gulzar
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मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मुझ से पहले कितने शाइ'र आए और आ कर चले गए कुछ आहें भर कर लौट गए, कुछ नग़ में गा कर चले गए वे भी एक पल का क़िस्सा थे, मैं भी एक पल का क़िस्सा हूँ कल तुम से जुदा हो जाऊँगा गो आज तुम्हारा हिस्सा हूँ मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है कल और आएँगे नग़मों की खिलती कलियाँ चुनने वाले मुझ सेे बेहतर कहने वाले, तुम सेे बेहतर सुनने वाले कल कोई मुझ को याद करे, क्यूँ कोई मुझ को याद करे मसरुफ़ ज़माना मेरे लिए, क्यूँ वक़्त अपना बर्बाद करे मैं पल-दो-पल का शाइ'र हूँ, पल-दो-पल मेरी कहानी है पल-दो-पल मेरी हस्ती है, पल-दो-पल मेरी जवानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है रिश्तों का रूप बदलता है, बुनियादें ख़त्म नहीं होतीं ख़्वाबों और उमँगों की मियादें ख़त्म नहीं होतीं इक फूल में तेरा रूप बसा, इक फूल में मेरी जवानी है इक चेहरा तेरी निशानी है, इक चेहरा मेरी निशानी है मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है तुझ को मुझ को जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है इन की धड़कन में बसना है, इन की साँसों में जीना है तू अपनी अदाएं बक्ष इन्हें, मैं अपनी वफ़ाएँ देता हूँ जो अपने लिए सोचीं थी कभी, वो सारी दुआएँ देता हूँ मैं हर इक पल का शाइ'र हूँ हर इक पल मेरी कहानी है हर इक पल मेरी हस्ती है हर इक पल मेरी जवानी है
Sahir Ludhianvi
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ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो कि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही हो ये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ू शगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसू नशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरू तमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादू हज़ारों जादू जगा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो गुलाबी लब, मुस्कुराते आरिज़, जबीं कुशादा, बुलंद क़ामत निगाह में बिजलियों की झिल-मिल, अदाओं में शबनमी लताफ़त धड़कता सीना, महकती साँसें, नवा में रस, अँखड़ियों में अमृत हमा हलावत, हमा मलाहत, हमा तरन्नुम, हमा नज़ाकत लचक लचक गुनगुना रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो तो क्या मुझे तुम जला ही लोगी गले से अपने लगा ही लोगी जो फूल जूड़े से गिर पड़ा है तड़प के उस को उठा ही लोगी भड़कते शोलों, कड़कती बिजली से मेरा ख़िर्मन बचा ही लोगी घनेरी ज़ुल्फ़ों की छाँव में मुस्कुरा के मुझ को छुपा ही लोगी कि आज तक आज़मा रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो नहीं मोहब्बत की कोई क़ीमत जो कोई क़ीमत अदा करोगी वफ़ा की फ़ुर्सत न देगी दुनिया हज़ार अज़्म-ए-वफ़ा करोगी मुझे बहलने दो रंज-ओ-ग़म से सहारे कब तक दिया करोगी जुनूँ को इतना न गुदगुदाओ, पकड़ लूँ दामन तो क्या करोगी क़रीब बढ़ती ही आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
Kaifi Azmi
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“मुझ में बाकी तुम” कभी तन्हाइयों में जब हमें तुम याद आते हो जुदा होते हुए भी साथ में लम्हे बिताते हो तुम्हें कैसे भुला दूँ मैं तुम्हें फिर क्यूँ भुला दूँ मैं कभी जब डूबने लगता हूँ दुनिया के फसानों में तुम्हीं यादों में आ कर फिर मुझे साहिल पे लाते हो तुम्हें कैसे भुला दूँ मैं तुम्हें फिर क्यूँ भुला दूँ मैं हमारे इश्क़ के चर्चे अगर होते हैं महफ़िल में नमी आँखों में ला कर के हमें भी तुम रुलाते हो तुम्हें कैसे भुला दूँ मैं तुम्हें फिर क्यूँ भुला दूँ मैं मुझे ये वक़्त चुभता है कभी जब खार के जैसे मेरे जख्मों पे चुपके से तुम्हीं गुलशन सजाते हो तुम्हें कैसे भुला दूँ मैं तुम्हें फिर क्यूँ भुला दूँ मैं
Aditya
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"अपनापन" जाने क्यूँँ घर की टैरिस पर पैरों की आपाधापी जोरों पर होती है जैसे चाँद को छूने जाना है दिन दिन भर मैं धूप में ख़ुद को ऐसे सेका करता हूँ जैसे तन पर धूप रगड़ कर हीरे सा चमकाना है लेकिन वो मतवाला चाँद न जाने क्यूँँ छुप जाता है बादल के पर्दों से हो कर मुझ सेे आँख चुराता है मदमस्त हवाएँ मुझ सेे कुछ ऐसे लिपटा करती हैं जैसे टूटी कश्ती को कोई साहिल मिल जाता है बारिश की बूँदें भी मुझ को जी भर के यूँ पीती हैं उन के दिल की नदियाँ मानो इक मुद्दत से रीती हैं जाने क्या रिश्ता है ये सब इतने अपने लगते हैं अनसोई रातों के भूले बिसरे सपने लगते हैं
Aditya
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अधूरा सफ़र तुम्हारे ख़्वाब की प्यासी मेरी आँखें ने पूछा है कि मैं ने टूटते तारों से तुम को क्यूँ नहीं माँगा ख़ुदा के दर पे जा कर अपने सर को क्यूँ नहीं फोड़ा उन्हें लगता है मुझ को इश्क़ करना ही नहीं आया तुम इक दिन रू-ब-रू आ कर कोई क़िस्सा सुना दो ना मुझे तो कुछ समझ आता नहीं उन को बताएं क्या गुजरते वक़्त रस्तों से दरख़्तों ने मुझे टोका कि जिन के छांव में हम ने कभी सपने उगाए थे खिजां सी छा गई उन पर अकेला देख कर मुझ को बहुत अफ़सोस था उन को कि अपने इश्क़ के सपने मुहब्बत की बहारों के बिना वो टूट कर बिखरे सितारे काली रातों के अमावस का वो काला चाँद अभी भी तुझ सेे मेरे बस्ल के सपने सजाते हैं यक़ीं उन को है अब भी फिर से तू मेरी हो जाएगी मगर मुझ को नहीं लगता कि अब तेरा इरादा है अगर तेरा इरादा हो भी जाए फिर भी मत आना अगर तुम लौट के आए तो फिर जाने नहीं दूँगा परिंदे की तरह तुम को मैं ख़ुद में क़ैद कर लूंगा सफ़र वो जिन को मिल कर के हमें अंजाम देना था मुकम्मल इश्क़ कर, जिन को हमें ईनाम देना था हमारी राह तकते आँख से महरूम हो बैठे भटकते फिर रहें हैं अब किसी अंजान रस्ते पर सभी से पूछते तेरी गली तेरा पता-ओ-दर उन्हें लगता है ये तू बात उन की मान जाएगी हमारी ज़िन्दगी में फिर तू वापस लौट आएगी
Aditya
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