आग का ज़ाइक़ा हर ज़बाँ पर सुलगता हुआ ज़ख़्म था रात का आहनी दर समुंदर की जानिब खुला आग ही आग थी क़तरा-ए-आब पुर-कार सा ख़्वाब था रात का आहनी दर जहन्नुम की जानिब खुला रास्तों ने कहा क्यूँँ हुजूम-ए-फ़रावाँ का अंजाम इबरत हुआ कौन इबरत के एहसास को मानता मौत को ज़िंदगी ज़िंदगी को जहन्नुम फ़साना तमस्ख़ुर का हैरत हुआ हम-सफ़र थे वो एक दूसरे के लिए क़ुर्ब उन का मगर आतिश-ए-ख़ौफ़ था मौज से मौज लड़ती हुई मौज से मौज नद्दी के आलाम में जैसे ढलती हुई खिड़कियाँ रहगुज़र पर मुक़द्दर की मानिंद खुलती रहें जो तमाशाई उन के अँधेरों से उभरा वो जलता गया वो तो नन्हा था मा'सूम था उस को सूरज का या चाँद का अक्स सब ने कहा वो भी जलने लगा वो भी बहते लहू में पिघलने लगा वो तो नन्हा था मा'सूम था वो मसीहा था वो आख़िरी नूर था उस की तक़दीर में मर्ग बे-कार क्यूँँ आज लिक्खी गई
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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"जन्मदिन मुबारक" दिन ये सोने से, रातें ये रंगीन मुबारक ऐ मेरी साँसों की रवानी तुझ को तेरा जन्मदिन मुबारक भवरें मुस्काएँ, फूलों की डाली-डाली हँसें जब तू मुस्काए, तेरे होंठों की लाली हँसें मेरा कत़्ल करे, तेरे नैन कजरारे काले मजरूह हुए ना जाने कितने मतवाले तुझ को ये बहारें शौकीन मुबारक ऐ मेरी तसव्वुर की रानी तुझ को तेरा जन्मदिन मुबारक
Vikas Sangam
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भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ
Lal Chand Falak
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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
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हमारे मुन्ने को चाह थी रेडियो ख़रीदें कि अब हमारे यहाँ फ़राग़त की रौशनी थी मैं अपनी देरीना तंग-दस्ती की दास्ताँ उस को क्या सुनाता उठा के ले आया तंग-ओ-तारीक कोठरी से क़लील तनख़्वाह के चिचोड़े हुए निवाले और उन में मेरी नहीफ़ बीवी ने अपनी दो-चार बाक़ी-माँदा शिकस्त-आमेज़ आरज़ूओं का ख़ून डाला न जाने कब से था प्यारे मुन्ने ने रेडियो का ये ख़्वाब पाला ये एक हफ़्ते की बात है और कल से मुन्ना ये कह रहा है ये जानवर सुब्ह-ओ-शाम बे-कार बोलता है मुहीब ख़बरों का ज़हर गीतों में घोलता है गली में कोई फ़क़ीर आए तो उस को दे दो मुझे इकन्नी का मोर ले दो
Balraj Komal
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मुश्तहर मौत की आरज़ू ने उसे मुज़्तरिब कर दिया इस क़दर एक दिन वो सलीबों के आदाद पर रोज़-ओ-शब ग़ौर करने लगा इम्तिहाँ के लिए दश्त को चल दिया अपने हिस्से की जब मुंतख़ब कर चुका उस ने तारीख़ के ज़र्द और एक पर नाम अपना ख़ुशी से रक़म कर दिया एक पर उस का सर दूसरी पर जिगर तेरी पर लटकता हुआ उस का जज़्बों से मा'मूर दिल उस की आँतें यहाँ उस की फाँकें यहाँ उस की अपनी सलीब आज कोई नहीं ज़र्द औराक़ से मिट गए सब निशाँ दश्त में दूर तक चीख़ती आँधियाँ ख़त्म उस की हुई मुश्तहर दास्ताँ
Balraj Komal
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कुछ लोग ये कहते हैं कि अच्छा या बुरा कुछ भी नहीं है तक़रीब-ए-विलादत हो या हंगाम-ए-दम-ए-मर्ग इक लम्हे को तस्वीर में ढलना है वो ढल जाता है आख़िर वो नग़्मा हो या गिर्या या अंदाज़-ए-तकल्लुम सब अक्स हैं असरार-ए-फ़ुसूँ-कार के शायद यकसाँ हैं मुकाफ़ात की यूरिश में सभी रंग सरगोशियाँ करते हैं गुज़र जाते हैं आँखों के जहाँ से पैमाना-ए-जाँ से क्या झूट है क्या सच है किसे कौन बताए सब शोर-ए-सलासिल में उतर आए हैं कुछ सोच रहे हैं तस्वीर के दो रुख़ थे कभी सुनते हैं अब लाख हुए हैं इंसान या हैवान या बे-जान कोई नाम नहीं है इक रक़्स-ए-तमव्वुज है शबीहों का हय्यूलों का सदाओं का फ़रामोश दिलों का इस राह से गुज़रे थे तुम्हें रोक लिया अपना समझ कर बातें भी हुईं तुम को ज़रा देर को सीने से लगाया आँखों में दिल ओ जाँ में बसाया जाओगे तुम्हें जाना है मालूम था मुझ को सच ये है कि तनवीर-ए-मुलाक़ात से रौशन था ये लम्हा सच ये है कि सर-ए-राह चराग़ उस ने जलाया सच ये है कि बे-साख़्ता जज़्बात से रौशन था ये लम्हा इमरोज़ ये मेरा था, मगर मेरी दुआ है ये लम्हा हम दोनों के इम्कान का मेहवर कल भी ये करे दोनों को हम दोनों को सरशार मुनव्वर
Balraj Komal
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मैं रात और दिन की मसाफ़त में रंगों की तफ़्सीर में अपने सारे अज़ीज़ों के अपने ही हाथों से क़त्ल-ए-मुसलसल में मसरूफ़ हूँ फिर मैं क्यूँँ सोचता हूँ सर-ए-जाम, हर शब कि दीदा-वरी की मता-ए-फ़िरोज़ाँ से सरशार होता तो हर ख़ुफ़्ता सर-बस्ता तहरीर से मैं गले मिल के रोता सदाओं की सरगोशियों में उतरता अजब हादसा है कि कुछ देर पहले मिरे सामने एक घाइल परिंदा गिरा है मिरे पाँव में सामने के फ़सुर्दा ओ बे-बर्ग बे-रंग से पेड़ से मेरे जाम-ए-शिकस्ता में बाक़ी थे क़तरे मय-ए-ख़ाम के कुछ इन्हें चश्म-ए-मिन्क़ार से ये मुसाफ़िर बड़े ग़ौर से देखता है इन्हें गिन रहा है ये शायद मैं सैलाब-ए-तहलील में हूँ यहाँ से कहाँ जाऊँगा दूर गर जा सकता तो वहाँ से यहाँ लौट कर किस तरह आऊँगा मैं
Balraj Komal
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इस क़दर तीरा ओ सर्द हरगिज़ न था दिल का मौसम कभी एक पल में ख़ुदा जाने क्या हो गया चाँद की वादियों में उतर आई शब! मैं वो तन्हा सुबुक-पा मुसाफ़िर था तकमील की जुस्तुजू खींच लाई थी इक रोज़ जिस को यहाँ आरज़ू थी मुझे मैं ज़मीं के लिए मेरी तर्रार पुरकार चश्म-ए-निहाँ फ़ासलों सरहदों वक़्त के सब हिसारों के उस पार की शहर-ए-इमरोज़ में अन-गिनत ख़ूब-सूरत तसावीर आवेज़ां कर देगी जब दूर की हर पुर-असरार सरशार आवाज़ मेरे लहू में उतर जाएगी मेरे दामन को फूलों से भर जाएगी सर्द से सर्द-तर हर घड़ी हो रही है रग-ओ-पै में बहते अनासिर की रौ शब गुज़र जाएगी चाँद की मुंजमिद वादियों में सुलगती हुई रौशनी सुब्ह-दम एक पल में उमँड आएगी मुझ को डर है मगर साअत-ए-नौ के हंगाम से पेशतर तीरा सर्द शब का भयानक अमल दिल के आफ़ाक़ पर हो न जाए कहीं मौत तक हुक्मराँ ख़त्म हो जाए तकमील की दास्ताँ!!
Balraj Komal
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