मैं रात और दिन की मसाफ़त में रंगों की तफ़्सीर में अपने सारे अज़ीज़ों के अपने ही हाथों से क़त्ल-ए-मुसलसल में मसरूफ़ हूँ फिर मैं क्यूँँ सोचता हूँ सर-ए-जाम, हर शब कि दीदा-वरी की मता-ए-फ़िरोज़ाँ से सरशार होता तो हर ख़ुफ़्ता सर-बस्ता तहरीर से मैं गले मिल के रोता सदाओं की सरगोशियों में उतरता अजब हादसा है कि कुछ देर पहले मिरे सामने एक घाइल परिंदा गिरा है मिरे पाँव में सामने के फ़सुर्दा ओ बे-बर्ग बे-रंग से पेड़ से मेरे जाम-ए-शिकस्ता में बाक़ी थे क़तरे मय-ए-ख़ाम के कुछ इन्हें चश्म-ए-मिन्क़ार से ये मुसाफ़िर बड़े ग़ौर से देखता है इन्हें गिन रहा है ये शायद मैं सैलाब-ए-तहलील में हूँ यहाँ से कहाँ जाऊँगा दूर गर जा सकता तो वहाँ से यहाँ लौट कर किस तरह आऊँगा मैं
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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से
Zubair Ali Tabish
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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.
Gulzar
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है
Kumar Vishwas
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बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम, बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम कभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम से तो मुझ को ख़ुदारा ग़लत मत समझना कि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम हैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारी हैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारी जो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँ सजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारी नज़र से ज़माने की ख़ुद को बचाना किसी और से देखो दिल मत लगाना कि मेरी अमानत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम... कभी जुगनुओं की क़तारों में ढूँडा चमकते हुए चाँद तारों में ढूँडा ख़िज़ाओं में ढूँडा बहारों में ढूँडा मचलते हुए आबसारों में ढूँडा हक़ीक़त में देखा, फ़साने में देखा न तुम सा हँसी, इस ज़माने देखा न दुनिया की रंगीन महफ़िल में पाया जो पाया तुम्हें अपना ही दिल में पाया एक ऐसी मसर्रत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा है चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहरा और इस पर ये काली घटाओं का पहरा गुलाबों से नाज़ुक महकता बदन है ये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन है बिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादल फ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागल वो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम जो बन के कली मुस्कुराती है अक्सर शब हिज्र में जो रुलाती है अक्सर जो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल दे जो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल के छुपाना जो चाहें छुपाई न जाए भुलाना जो चाहें भुलाई न जाए वो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
Tahir Faraz
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हमारे मुन्ने को चाह थी रेडियो ख़रीदें कि अब हमारे यहाँ फ़राग़त की रौशनी थी मैं अपनी देरीना तंग-दस्ती की दास्ताँ उस को क्या सुनाता उठा के ले आया तंग-ओ-तारीक कोठरी से क़लील तनख़्वाह के चिचोड़े हुए निवाले और उन में मेरी नहीफ़ बीवी ने अपनी दो-चार बाक़ी-माँदा शिकस्त-आमेज़ आरज़ूओं का ख़ून डाला न जाने कब से था प्यारे मुन्ने ने रेडियो का ये ख़्वाब पाला ये एक हफ़्ते की बात है और कल से मुन्ना ये कह रहा है ये जानवर सुब्ह-ओ-शाम बे-कार बोलता है मुहीब ख़बरों का ज़हर गीतों में घोलता है गली में कोई फ़क़ीर आए तो उस को दे दो मुझे इकन्नी का मोर ले दो
Balraj Komal
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तमाम लोग इब्तिदा में एक दूसरे के सामने हुजूम में दिखाई देने वाले कुछ निशाँ महज़ अजनबी फिर यका-यक मोजज़ा तुलूअ' का और एक रू-ए-आफ़्ताब बादलों के पार से निकल के रू-ब-रू ख़िराम-ए-नूर कू-ब-कू पुराना शहर वक़्त-ए-शाम फैलता उमडता अजनबी हुजूम हाव-हू के दरमियान मोजज़ा हुआ और एक मुज़्तरिब हसीन रू-ए-दिल-गुदाज़ मेरे जिस्म ओ जाँ में देखते ही देखते समा गया वो रौशनी था मौज-ए-आफ़्ताब था बस इक नज़र में जैसे मैं ने उस को पा लिया मैं दम-ब-ख़ुद सा रह गया ये हादसा था वाक़िआ' था कैसा इत्तिफ़ाक़ था तुलू-ए-नूर के जिलौ में इक तवील पुर-ख़तर सियाह रात शहर में उतर गई
Balraj Komal
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उदासी घनी और गहरी उदासी का साया शगूफ़ों की सरगोशियाँ चंद चेहरों के ख़ाके निगाहों के मौहूम से दाएरों में कोई अजनबी बे-ज़बाँ रौशनी ये न फ़र्दा न मौजूद ये मुंक़लिब हो रहा है जो लम्हा अगर ये अमल है तो सिर्फ़ अमल है लब-ए-जू-ए-मय ख़ामुशी और सैद-ए-फ़ुग़ाँ कोई हर्फ़-ए-तकल्लुम कहीं रहगुज़र पर मिरे चश्म-ओ-लब और आवाज़ से रौशनी की कशाकश बहुत फ़ासला है मिरे और मेरे तसव्वुर के साहिल में उस से परे इक जहान-ए-दिगर है लब-ए-जू-ए-मय ग़र्क़-ए-आफ़ाक़ हूँ दूसरी बार शायद जन्म ले रहा हूँ
Balraj Komal
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मैं नान-ए-सोख़्ता का ज़ाइक़ा उतारता हूँ रोज़-ओ-शब ज़बान पर कि उस की हमदमी में दोस्ती में उम्र के नशेब में अगर मैं ढल सकूँ तो फ़स्ल आफ़्ताब का वो बर्ग-ए-ज़र्द बन सकूँ जो दाएरे की इंतिहा पे सिर्फ़ मौसमों के ख़्वाब देखता हूँ सुब्ह-ओ-शाम सोचता हूँ आरज़ू फ़रेब-कार शाहिदा कहाँ मिली थी और कौन से हसीन मोड़ तक चलेगी मेरे साथ मेरे साथ जू-ए-आब जू-ए-मय रिदा-ए-ख़ाक दूर के सफ़र के लोग बद-गुमाँ साअ'तों के शहर मैं चलूँगा मैं दश्त-ओ-कोहसार की उदास हिजरतों को नन्ही-मुन्नी लोरियाँ सुनाऊँगा मैं जंगलों की सनसनाहटों के पार जाऊँगा
Balraj Komal
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रात को सोने से पहले मुझ से नन्हा कह रहा था चाँद लाखों मील क्यूँँकर दूर है क्यूँँ चमकते हैं सितारे दो ग़ुबारे काली बिल्ली क्या हुई मेरे हाथी को पिलाओ गर्म पानी वो कहानी मुझ को नींद आने लगी निस्फ़ शब को आते-जाते बादलों के दरमियाँ कुछ हुरूफ़-ए-ना-तवाँ बूंदियों के रूप में काग़ज़ के इक पुर्ज़े पे मेरे सामने देर तक गिरते रहे नज़्म के नक़्श-ए-गुरेज़ाँ ने सितम लाखों सहे अन-गिनत बरसों पे फैली चश्म-ओ-दिल की दास्ताँ रात के पिछले-पहर की गोद में तेज़-तर होती हुई बारिश के लोरी सुन के शायद सो गई सुब्ह-दम खिल उठे चारों तरफ़ बच्चों के रंगीं क़हक़हों और तालियों के शोख़ फूल रात-भर की तेज़ बारिश की बनाई झील में डगमगाती डोलती चल रही थीं छोटी छोटी कश्तियाँ मैं ने देखा इन में नन्हे की भी थी प्यारी सी नाव नज़्म का नक़्श-ए-गुरेज़ाँ जाना-पहचाना सा काग़ज़ जाने-पहचाने हुरूफ़ नन्हा बोला आज जो ताली न पीटे बेवक़ूफ़
Balraj Komal
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