मैं नान-ए-सोख़्ता का ज़ाइक़ा उतारता हूँ रोज़-ओ-शब ज़बान पर कि उस की हमदमी में दोस्ती में उम्र के नशेब में अगर मैं ढल सकूँ तो फ़स्ल आफ़्ताब का वो बर्ग-ए-ज़र्द बन सकूँ जो दाएरे की इंतिहा पे सिर्फ़ मौसमों के ख़्वाब देखता हूँ सुब्ह-ओ-शाम सोचता हूँ आरज़ू फ़रेब-कार शाहिदा कहाँ मिली थी और कौन से हसीन मोड़ तक चलेगी मेरे साथ मेरे साथ जू-ए-आब जू-ए-मय रिदा-ए-ख़ाक दूर के सफ़र के लोग बद-गुमाँ साअ'तों के शहर मैं चलूँगा मैं दश्त-ओ-कोहसार की उदास हिजरतों को नन्ही-मुन्नी लोरियाँ सुनाऊँगा मैं जंगलों की सनसनाहटों के पार जाऊँगा
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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"सज़ा" हर बार मेरे सामने आती रही हो तुम हर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम मैं कौन हूँ मैं ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं तुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब में और इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहीं पस सर-बसर अजी़य्यत व आजा़र ही रहो बेजा़र हो गई हो बहुत ज़िन्दगी से तुम जब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहो तुम को यहाँ के साया व परतौ से क्या ग़र्ज़ तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बेमहर ही रहा तुम इन्तिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहो तुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुई इस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो मैं ने ये कब कहा था मोहब्बत में है नजात मैं ने ये कब कहा था वफ़ादार ही रहो अपनी मता-ए-नाज़ लुटा कर मेरे लिए बाज़ार-ए-इल्तिफ़ात में नादार ही रहो जब मैं तुम्हें निशात-ए-मोहब्बत न दे सका ग़म में कभी सुकून रफा़क़त न दे सका जब मेरे सब चराग़-ए-तमन्ना हवा के हैं जब मेरे सारे ख़्वाब किसी बे-वफ़ा के हैं फिर मुझ को चाहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं तन्हा कराहने का तुम्हें कोई हक़ नहीं
Jaun Elia
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शहसवार नन्हा-मुन्ना शहसवार ईस्तादा है ख़मीदा पुश्त पर मेरी जूँ-ही झुकता हूँ वो तर्ग़ीब देता है मुझे चलने की आवाज़ों की सरगम से मैं चलता हूँ मैं वामाँदा क़दम चलता हूँ वो महमेज़ की जुम्बिश से कहता है कि दौड़ो और दौड़ो, तेज़-तर, सरपट चलो बाद-ए-नग़्मा-कार से बातें करो उस का मैं रख़्श-ए-रज़ा तेज़-तर करता हूँ रफ़्तार-ए-ख़िराम मुझ को पहुँचाना है आज उस को रंगों तितलियों के देस में जादू-नगर में मेरे साए का भी अब शायद जहाँ मुंतज़िर कोई नहीं मुंतज़िर हैं उस के लेकिन, मेरे नन्हे दोस्त के देव-क़ामत सब्ज़ वारफ़्ता-वक़ार दूर तक सरगोशियाँ करते हुए अश्जार रक़्स-ए-बर्ग-ओ-बार जा रहा है ख़्वाब की रफ़्तार से दीवाना-वार मेरा नन्हा शहसवार
Balraj Komal
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तमाम लोग इब्तिदा में एक दूसरे के सामने हुजूम में दिखाई देने वाले कुछ निशाँ महज़ अजनबी फिर यका-यक मोजज़ा तुलूअ' का और एक रू-ए-आफ़्ताब बादलों के पार से निकल के रू-ब-रू ख़िराम-ए-नूर कू-ब-कू पुराना शहर वक़्त-ए-शाम फैलता उमडता अजनबी हुजूम हाव-हू के दरमियान मोजज़ा हुआ और एक मुज़्तरिब हसीन रू-ए-दिल-गुदाज़ मेरे जिस्म ओ जाँ में देखते ही देखते समा गया वो रौशनी था मौज-ए-आफ़्ताब था बस इक नज़र में जैसे मैं ने उस को पा लिया मैं दम-ब-ख़ुद सा रह गया ये हादसा था वाक़िआ' था कैसा इत्तिफ़ाक़ था तुलू-ए-नूर के जिलौ में इक तवील पुर-ख़तर सियाह रात शहर में उतर गई
Balraj Komal
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उदासी घनी और गहरी उदासी का साया शगूफ़ों की सरगोशियाँ चंद चेहरों के ख़ाके निगाहों के मौहूम से दाएरों में कोई अजनबी बे-ज़बाँ रौशनी ये न फ़र्दा न मौजूद ये मुंक़लिब हो रहा है जो लम्हा अगर ये अमल है तो सिर्फ़ अमल है लब-ए-जू-ए-मय ख़ामुशी और सैद-ए-फ़ुग़ाँ कोई हर्फ़-ए-तकल्लुम कहीं रहगुज़र पर मिरे चश्म-ओ-लब और आवाज़ से रौशनी की कशाकश बहुत फ़ासला है मिरे और मेरे तसव्वुर के साहिल में उस से परे इक जहान-ए-दिगर है लब-ए-जू-ए-मय ग़र्क़-ए-आफ़ाक़ हूँ दूसरी बार शायद जन्म ले रहा हूँ
Balraj Komal
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पेड़ों के पत्ते जलती दोपहरों को आने जाने वालों को साया देते हैं अपने होने का एलान नहीं करते साए का एलान नहीं करते मैं घर से बिछड़ा था जब तो अक्सर बरसों जलती धूप में उन की शफ़क़त के साए में सोया था कुछ दिन से दूर दूर तक आसमान में आग दूर दूर तक प्यासे जलते-बुझते लोग बादल बारिश सब्ज़ा पत्ते पौदे पेड़ भूले-बिसरे ख़्वाब दूर दूर तक शो'लों के तूफ़ान का मौसम आया सब के सिर पर आने वाले मौसम के एलान का घटता-बढ़ता साया ये कैसा मौसम आया
Balraj Komal
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ग़ुबारे सितारे गुलाबी शराबी खुले परचमों के शरारे उड़ाते हज़ारों की तादाद में वो घरों से स्कूलों से आए दहकते हुए गाल उड़ते हुए बाल जिस्मों के मोती वो शबनम थे लेकिन बदलते गए गर्म लावे में पैहम वो बहते गए मौज-दर-मौज हर रह गुज़र पर फ़लक-बोस नारों से अपने वतन के नए या पुराने चले वो बढ़े वो सभी मुश्तहर दुश्मनों को मिटाने मगर शोख़ चेहरों के इस कारवाँ में तसव्वुर में बनते सँवरते हुए सूरमाओं से हट कर ख़ुदा जाने कैसे कहाँ से वो आया वो नन्हा सा मा'सूम बालक जो ख़ामोश हैराँ परेशाँ ग़ुबारों शरारों फ़लक-बोस नारों के बे-रहम दरिया में बहता लुढ़कता चला जा रहा था उसे कौन पहचानता जब तमाशाइयों की सफ़ों में उसे देखने वाला कोई नहीं था
Balraj Komal
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