nazmKuch Alfaaz

उदासी घनी और गहरी उदासी का साया शगूफ़ों की सरगोशियाँ चंद चेहरों के ख़ाके निगाहों के मौहूम से दाएरों में कोई अजनबी बे-ज़बाँ रौशनी ये न फ़र्दा न मौजूद ये मुंक़लिब हो रहा है जो लम्हा अगर ये अमल है तो सिर्फ़ अमल है लब-ए-जू-ए-मय ख़ामुशी और सैद-ए-फ़ुग़ाँ कोई हर्फ़-ए-तकल्लुम कहीं रहगुज़र पर मिरे चश्म-ओ-लब और आवाज़ से रौशनी की कशाकश बहुत फ़ासला है मिरे और मेरे तसव्वुर के साहिल में उस से परे इक जहान-ए-दिगर है लब-ए-जू-ए-मय ग़र्क़-ए-आफ़ाक़ हूँ दूसरी बार शायद जन्म ले रहा हूँ

Related Nazm

"मेरी दास्ताँ" वो दिन भी कितने अजीब थे जब हम दोनों क़रीब थे शबब-ए-हिज़्र न तू, न मैं सब अपने-अपने नसीब थे तू ही मेरी दुनिया थी मैं ही तेरा जहान था मुझे तेरे होने का ग़ुरूर था तुझे मेरे होने पर गुमान था तेरे साथ बिताए थे वो दिन वो राते कितनी हसीन थी उस कमरे में थी जन्नत सारी एक बिस्तर पर ही जमीन थी तेरी गोद में सर रख कर मैं गज़ले अपनी सुनाता था तू सुन कर शा'इरी सो जाती थी, मैं तेरी ख़ुशबू में खो जाता था मेरी कामयाबी की ख़बरें सुन मुझ सेे ज़्यादा झूमा करती थी वो बेवजह बातों-बातों में मेरा माथा चूमा करती थी मेरी हर परेशानी में वो मेरी हमदर्द थी,हम सेाया थी उस से बढ़कर कुछ न था बस वही एक सर्माया थी मुलाक़ात न हो तो कहती थी मैं कैसे आज सो पाऊंगी मुझे गले लगा कर कहती थी मैं तुम सेे जुदा ना हो पाऊंगी इक आईना थी वो मेरा उस सेे कुछ भी नहीं छुपा था हर चीज जानती थी मेरी मेरा सब कुछ उसे पता था यार वही चेहरे हैं अपने वही एहसास दिल में है फिर क्यूँ दूरियाँ बढ़ सी गई क्यूँ रिश्ते आज मुश्किल में है कई सवाल हैं दिल में एक-एक कर के सब सुनोगी क्या? मैं शुरू करता हूँ शुरू से अब सबका जवाब दोगी क्या क्यूँ लौटा दी अंगुठी मुझे? क्यूँ बदल गए सब इरादे तेरे? क्या हुआ तेरी सब क़समों का? अब कहाँ गए सब वादे तेरे? तेरे इन मेहंदी वाले हाथों में किसी ओर का अब नाम हैं इक हादसा हैं मेरे लिए ये माना तेरे लिए ईनाम हैं अपने हिज्र की वो पहली रात तब ख़याल तो मेरा आया होगा आई होगी सब यादें पुरानी मेरी बातों ने भी रुलाया होगा जैसे मुझ में कोई चीख रहा हैं मेरी रूह-रूह तक सो रही हैं मैं अपनी दास्तां लिख रहा हूँ और मेरी शा'इरी रो रही हैं बस यही इल्तिजा हैं ख़ुदा से कोई इतना भी प्यारा न बने कई सूरतें हो सामने नज़र के पर कोई हमारा ना बने

"Nadeem khan' Kaavish"

16 likes

"वो लड़की" सीने में अतीत की यादे दबाते हुए उदासी छिपा रही थी वो मुस्कुराते हुए अंदर उस के आंसुओ का सैलाब भरा हुआ था डर रही थी वो उन्हें बाहर लाते हुए उसे धोखा मिला था मोहबब्त में कुछ दोस्त भी यक़ीनन मतलबी रहे उस के मैं ने बढ़ाया जो हाथ दोस्ती का वो कांप रही थी हाथ मिलाते हुए मुकम्मल मुलाक़ात अधूरी छोड़ आया मैं इज़हार करने से पहले लब मोड़ आया मैं उस की बस यही बात उदास कर गई उस ने पलटकर ना देखा वापस जाते हुए

Mayank Agarwal

7 likes

वहम रात जागी तो कहीं सेहेन मैं सूखे पत्ते चुरमुराए के कोई आया कोई आया है और हम शौक़ के मारे हुए दौड़े आए गो के मालूम है तू है न तेरा साया है हम के देखें कभी दालान कभी सूखा चमन उस पे धीमी सी तमन्ना के पुकारे जाएँ फिर से इक बार तेरी ख़्वाब सी आँखें देखें फिर तेरे हिज्र के हाथों ही भले मारे जाएँ हम तुझे अपनी सदाओं मैं बसाने वाले इतना चीखें के तेरे वहम लिप्पत के रोएं पर तेरे वहम भी तेरी ही तरह क़ातिल हैं सो वही दर्द है जाना कहो कैसे सोएं बस इसी करब के पहलु मैं गुज़ारे हैं पेहेर बस यूँँही ग़म कभी काफी कभी थोड़े आए फिर अचानक किसी लम्हे मैं जो चटख़े पत्ते हम वही शौक़ के मारे हुए दौड़े आए

Sohaib Mugheera Siddiqi

5 likes

"सिगरेट" तुझे मालूम है अच्छी तरह तुझ को बताना क्या मुझे जब इश्क़ था तुझ सेे तो सिगरेट से अदावत थी मैं सिगरेट से हमेशा हाथ अपने दूर रखता था कभी सिगरेट न छूता था मुझे सिगरेट से सिगरेट पीने वालों से अदावत थी जो सिगरेट पीते थे मुझ को वो लड़के ज़हर लगते थे मैं उन लड़कों की यारी दोस्ती से दूर रहता था तुझे मालूम है अच्छी तरह तुझ को बताना क्या हमेशा मेरी सिगरेट के धुएँ में साँस घुटती थी मिरी आँखें उबलती थीं लहू आँखों में आता था मिरी जब साँस घुटती थी तो तू बेचैन होती थी मिरी हालत पे रोती थी तिरे चेहरे के ऊपर इक उदासी तारी होती थी तिरे सीने में दिल तेरा बिना पानी की मछली की तरह पल पल तड़पता था भुलाकर दर्द को अपने मिरे आराम की ख़ातिर मिरे हक़ में ख़ुदा से तू दुआएँ करने लगती थी दुआएँ रंग लाती थीं धुआँ सिगरेट का छटता था मिरी हालत सुधरती थी मुझे सब याद है अब तक मैं माज़ी को नहीं भूला मिरी हालत सुधरती थी तो तुझ को चैन आता था तुझे जब चैन आता था तो तू सज्दे में सर रख कर ख़ुदा का शुक्र करती थी ख़ुदा का शुक्र कर के तू गले से मेरे लगती थी गले लग कर मिरे तू धी में धी में मुस्कुराती थी तिरे सीने में दिल तेरा सुकूँ की साँस लेता था मुझे सब याद है अब तक मैं माज़ी को नहीं भूला मगर अब कुछ बताना है मैं जब से तुझ सेे बिछड़ा हूँ ये मेरी ज़िंदगी तब से मुसीबत में गिरिफ़्ता है परेशाँ हूँ बहुत ज़्यादा बहुत ज़्यादा परेशाँ हूँ परेशानी सिवा होती है तो दिल में ये आता है कि सिगरेट हाथ में ले लूँ मैं सिगरेट हाथ में लेने को जब ये हाथ आगे को बढ़ाता हूँ तो तू आ कर तसव्वुर में मिरा ये हाथ अपने हाथ से ख़ुद थाम लेती है पकड़ कर हाथ मेरा तैश में मुझ सेे ये कहती है अरे छोड़ो ये सब क्या है शजर सिगरेट नहीं पीते तिरी गल मान लेता हूँ मैं सिगरेट तोड़ देता हूँ तिरे दीदार से दिल को ज़रा सा चैन आता है मैं कुछ पल के लिए अपने सभी ग़म भूल जाता हूँ मगर फिर से तिरी फ़ुर्क़त ये मन पर ग़ालिब आती है मिरी हालत बिगड़ती है परेशानी सिवा होती है तो दिल में ये आता है कि सिगरेट हाथ में ले लूँ मगर फिर ध्यान आता है तुझे सिगरेट से सिगरेट पीने वाले से मिरे जैसे अदावत है तो अब सिगरट भला क्यूँ अपने इन हाथों से छू लूँ मैं तुझे नाराज़ क्यूँ कर दूँ तुझे मुझ सेे मुहब्बत अब नहीं बाक़ी तो क्या शिकवा करूँँ तुझ सेे मुझे तुझ सेे मुहब्बत है मैं सिगरेट तोड़ देता हूँ ले सिगरेट फेंक देता हूँ मुहब्बत को निभाता हूँ मैं हर लम्हा तिरी यादों में गुम-सुम बैठा रहता हूँ तुझे मालूम है अच्छी तरह तुझ को बताना क्या

Shajar Abbas

2 likes

"तस्वीर" उदासी इंतिहाई जब भी करती है मिरी तकलीफ़ मुझ सेे वा'दा करती है तिरे हर दुख को अपना दुख ही समझूँगी तुझे कोई नहीं समझा मैं समझूँगी कभी जब सोचता हूँ दूर जाने का तिरी आवाज़ मेरा पीछा करती है नहीं होता है जब कोई भी कमरे में तिरी तस्वीर मुझ सेे बात करती है मिरा ये वहम है या फिर है सच्चाई अकेली पड़ चुकी है दोस्त तन्हाई मिरे कमरे का है जो हाल क्या जानो उदासी मस्त है ख़ुशहाल क्या जानो घड़ी तक रात भर ख़ामोश रहती है तिरी तस्वीर मुझ सेे बात करती है मिरी हालत पे तुम चाहो तरस खाओ मुझे चाहो तो दिखलाओ न दिखलाओ मुझे समझो नहीं समझो मगर उस को कभी जा कर तो कोई यार समझाओ मिरे अंदर किसी ने कर लिया है घर मिरे अंदर हो जितने सब निकल आओ दवा भी अब मुझे बीमार करती है तिरी तस्वीर मुझ सेे बात करती है जिसे सब नींद कहते हैं नहीं आती तुझे भी याद अब मेरी नहीं आती बिना बादल के जब बरसात गिरती है तिरी तस्वीर मुझ सेे बात करती है भला मैं क्यूँँ तुझे हर बात बतलाऊँ ज़रूरी तो नहीं हर चीज़ दिखलाऊँ अगर वो बे-वफ़ा भी है तो होने दो मुहब्बत है किसी से तो भी होने दो किसी के साथ गर ख़ुश है तो रहने दो अगर सब बात हैं उस की तो रहने दो नया ये घर नई दुनिया मुबारक हो नया जोड़ा नया लड़का मुबारक हो तुझे हाथों की मेहँदी भी मुबारक हो तुझे सिंदूर माथे का मुबारक हो मिरी क़िस्मत मिरा गर साथ दे देती मुझे दुनिया ये कहती फिर मुबारक हो मिरी ख़ामोशियों पर आज मत जाना बहुत ख़ुश हूँ तुझे शादी मुबारक हो निशानी का करूँँ मैं क्या जला डालूँ तिरी तस्वीर को मैं क्या जला डालूँ मगर मजबूर मैं ये कर नहीं सकता तुझे ख़ुद से ज़ुदा मैं कर नहीं सकता मिरी सब कोशिशें नाकाम रहती हैं मुझे बातें तिरी बस याद रहती हैं मिरी हर साँस जब एहसान करती है तिरी तस्वीर मुझ सेे बात करती है तुझे मैं याद करता हूँ मिरी ग़लती मैं अब भी प्यार करता हूँ मिरी ग़लती चलो सारी निशानी मैं मिटा दूँगा तिरी तस्वीर को भी मैं जला दूँगा मिरे ग़ुस्से से सब कुछ ख़त्म कर डाला मुझे मुजरिम मुझे पागल बना डाला गया वो मर तू जिस सेे प्यार करती थी तिरी तस्वीर मुझ सेे बात करती थी

Sagar Sahab Badayuni

3 likes

More from Balraj Komal

हमारे मुन्ने को चाह थी रेडियो ख़रीदें कि अब हमारे यहाँ फ़राग़त की रौशनी थी मैं अपनी देरीना तंग-दस्ती की दास्ताँ उस को क्या सुनाता उठा के ले आया तंग-ओ-तारीक कोठरी से क़लील तनख़्वाह के चिचोड़े हुए निवाले और उन में मेरी नहीफ़ बीवी ने अपनी दो-चार बाक़ी-माँदा शिकस्त-आमेज़ आरज़ूओं का ख़ून डाला न जाने कब से था प्यारे मुन्ने ने रेडियो का ये ख़्वाब पाला ये एक हफ़्ते की बात है और कल से मुन्ना ये कह रहा है ये जानवर सुब्ह-ओ-शाम बे-कार बोलता है मुहीब ख़बरों का ज़हर गीतों में घोलता है गली में कोई फ़क़ीर आए तो उस को दे दो मुझे इकन्नी का मोर ले दो

Balraj Komal

0 likes

मैं नान-ए-सोख़्ता का ज़ाइक़ा उतारता हूँ रोज़-ओ-शब ज़बान पर कि उस की हमदमी में दोस्ती में उम्र के नशेब में अगर मैं ढल सकूँ तो फ़स्ल आफ़्ताब का वो बर्ग-ए-ज़र्द बन सकूँ जो दाएरे की इंतिहा पे सिर्फ़ मौसमों के ख़्वाब देखता हूँ सुब्ह-ओ-शाम सोचता हूँ आरज़ू फ़रेब-कार शाहिदा कहाँ मिली थी और कौन से हसीन मोड़ तक चलेगी मेरे साथ मेरे साथ जू-ए-आब जू-ए-मय रिदा-ए-ख़ाक दूर के सफ़र के लोग बद-गुमाँ साअ'तों के शहर मैं चलूँगा मैं दश्त-ओ-कोहसार की उदास हिजरतों को नन्ही-मुन्नी लोरियाँ सुनाऊँगा मैं जंगलों की सनसनाहटों के पार जाऊँगा

Balraj Komal

0 likes

तमाम लोग इब्तिदा में एक दूसरे के सामने हुजूम में दिखाई देने वाले कुछ निशाँ महज़ अजनबी फिर यका-यक मोजज़ा तुलूअ' का और एक रू-ए-आफ़्ताब बादलों के पार से निकल के रू-ब-रू ख़िराम-ए-नूर कू-ब-कू पुराना शहर वक़्त-ए-शाम फैलता उमडता अजनबी हुजूम हाव-हू के दरमियान मोजज़ा हुआ और एक मुज़्तरिब हसीन रू-ए-दिल-गुदाज़ मेरे जिस्म ओ जाँ में देखते ही देखते समा गया वो रौशनी था मौज-ए-आफ़्ताब था बस इक नज़र में जैसे मैं ने उस को पा लिया मैं दम-ब-ख़ुद सा रह गया ये हादसा था वाक़िआ' था कैसा इत्तिफ़ाक़ था तुलू-ए-नूर के जिलौ में इक तवील पुर-ख़तर सियाह रात शहर में उतर गई

Balraj Komal

0 likes

शहसवार नन्हा-मुन्ना शहसवार ईस्तादा है ख़मीदा पुश्त पर मेरी जूँ-ही झुकता हूँ वो तर्ग़ीब देता है मुझे चलने की आवाज़ों की सरगम से मैं चलता हूँ मैं वामाँदा क़दम चलता हूँ वो महमेज़ की जुम्बिश से कहता है कि दौड़ो और दौड़ो, तेज़-तर, सरपट चलो बाद-ए-नग़्मा-कार से बातें करो उस का मैं रख़्श-ए-रज़ा तेज़-तर करता हूँ रफ़्तार-ए-ख़िराम मुझ को पहुँचाना है आज उस को रंगों तितलियों के देस में जादू-नगर में मेरे साए का भी अब शायद जहाँ मुंतज़िर कोई नहीं मुंतज़िर हैं उस के लेकिन, मेरे नन्हे दोस्त के देव-क़ामत सब्ज़ वारफ़्ता-वक़ार दूर तक सरगोशियाँ करते हुए अश्जार रक़्स-ए-बर्ग-ओ-बार जा रहा है ख़्वाब की रफ़्तार से दीवाना-वार मेरा नन्हा शहसवार

Balraj Komal

0 likes

क़फ़स का दर खुला इक नीम-जाँ कम-सिन परिंदा चंद ख़स्ता ज़ाइचों पर रक़्स के अंदाज़ में आगे बढ़ा, फिर चोंच से अपना पसंदीदा मुसव्वर ज़ाइचा उस ने उठाया और अपने ही हिदायत-कार के आगे अदब से रख दिया झुक कर हिदायत-कार गरचे नूर से था बद-गुमाँ महरूम ना-ख़्वांदा सर-ए-सैल-ए-रवाँ इक बर्ग-ए-बे-माया नविश्त-ए-बख़्त के असरार से वाक़िफ़ था वो शायद नज़र के रू-ब-रू उस ने मता-ए-बे-निहायत के फ़साने से मुझे ख़ुश-हाल कर डाला मुझे पामाल कर डाला सभी मौज-ए-ज़िया में थे सभी के चश्म ओ दिल में एक शो'ला था सभी ख़ामोश गुम-सुम हैं यहाँ से कौन जाएगा यहाँ पर कौन आएगा परिंदा नीम-जाँ कम-सिन क़फ़स में जा चुका कब का हिदायत-कार की आँखों में लौट आई है वीरानी जो कल ख़ाली था वो दस्त-ए-तलब है आज भी ख़ाली लबों पर लुत्फ़-ए-अंदाम-ए-निहाँ की अन-सुनी गाली

Balraj Komal

0 likes

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Balraj Komal.

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Balraj Komal's nazm.