nazmKuch Alfaaz

रात को सोने से पहले मुझ से नन्हा कह रहा था चाँद लाखों मील क्यूँँकर दूर है क्यूँँ चमकते हैं सितारे दो ग़ुबारे काली बिल्ली क्या हुई मेरे हाथी को पिलाओ गर्म पानी वो कहानी मुझ को नींद आने लगी निस्फ़ शब को आते-जाते बादलों के दरमियाँ कुछ हुरूफ़-ए-ना-तवाँ बूंदियों के रूप में काग़ज़ के इक पुर्ज़े पे मेरे सामने देर तक गिरते रहे नज़्म के नक़्श-ए-गुरेज़ाँ ने सितम लाखों सहे अन-गिनत बरसों पे फैली चश्म-ओ-दिल की दास्ताँ रात के पिछले-पहर की गोद में तेज़-तर होती हुई बारिश के लोरी सुन के शायद सो गई सुब्ह-दम खिल उठे चारों तरफ़ बच्चों के रंगीं क़हक़हों और तालियों के शोख़ फूल रात-भर की तेज़ बारिश की बनाई झील में डगमगाती डोलती चल रही थीं छोटी छोटी कश्तियाँ मैं ने देखा इन में नन्हे की भी थी प्यारी सी नाव नज़्म का नक़्श-ए-गुरेज़ाँ जाना-पहचाना सा काग़ज़ जाने-पहचाने हुरूफ़ नन्हा बोला आज जो ताली न पीटे बेवक़ूफ़

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''चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ'' चल आ एक ऐसी नज़्म कहूँ जो लफ़्ज़ कहूँ वो हो जाए बस अश्क कहूँ तो एक आँसू तेरे गोरे गाल को धो जाए मैं आ लिक्खूँ तू आ जाए मैं बैठ लिक्खूँ तू आ बैठे मेरे शाने पर सर रक्खे तू मैं नींद कहूँ तू सो जाए मैं काग़ज़ पर तेरे होंठ लिक्खूँ तेरे होंठों पर मुस्कान आए मैं दिल लिक्खूँ तू दिल था में मैं गुम लिक्खूँ वो खो जाए तेरे हाथ बनाऊँ पेंसिल से फिर हाथ पे तेरे हाथ रखूँ कुछ उल्टा सीधा फ़र्ज़ करूँँ कुछ सीधा उल्टा हो जाए मैं आह लिखूँ तू हाए करे बेचैन लिखूँ बेचैन हो तू फिर बेचैन का बे काटूँ तुझे चैन ज़रा सा हो जाए अभी ऐन लिखूँ तू सोचे मुझे फिर शीन लिखूँ तेरी नींद उड़े जब क़ाफ़ लिखूँ तुझे कुछ कुछ हो मैं इश्क़ लिखूँ तुझे हो जाए

Amir Ameer

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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तुम्हें इक बात कहनी थी इजाज़त हो तो कह दूँ मैं ये भीगा भीगा सा मौसम ये तितली फूल और शबनम चमकते चाँद की बातें ये बूँदें और बरसातें ये काली रात का आँचल हवा में नाचते बादल धड़कते मौसमों का दिल महकती ख़ुश्बूओं का दिल ये सब जितने नज़ारे हैं कहो किस के इशारे हैं सभी बातें सुनी तुम ने फिर आँखें फेर लीं तुम ने मैं तब जा कर कहीं समझा कि तुम ने कुछ नहीं समझा मैं क़िस्सा मुख़्तसर कर के ज़रा नीची नज़र कर के ये कहता हूँ अभी तुम से मोहब्बत हो गई तुम से

Zubair Ali Tabish

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"हम मिलेंगे कहीं" हम मिलेंगे कहीं अजनबी शहर की ख़्वाब होती हुई शाहराओं पे और शाहराओं पे फैली हुई धूप में एक दिन हम कहीं साथ होगे वक़्त की आँधियों से अटी साहतों पर से मिट्टी हटाते हुए एक ही जैसे आँसू बहाते हुए हम मिलेंगे घने जंगलो की हरी घास पर और किसी शाख़-ए-नाज़ुक पर पड़ते हुए बोझ की दास्तानों में खो जाएँगे हम सनोबर के पेड़ों की नोकीले पत्तों से सदियों से सोए हुए देवताओं की आँखें चभो जाएँगे हम मिलेंगे कहीं बर्फ़ के बाजुओं में घिरे पर्वतों पर बाँझ क़ब्रो में लेटे हुए कोह पेमाओं की याद में नज़्म कहते हुए जो पहाड़ों की औलाद थे, और उन्हें वक़्त आने पर माँ बाप ने अपनी आग़ोश में ले लिया हम मिलेंगे कही शाह सुलेमान के उर्स में हौज़ की सीढियों पर वज़ू करने वालो के शफ़्फ़ाफ़ चेहरों के आगे संगेमरमर से आरस्ता फ़र्श पर पैर रखते हुए आह भरते हुए और दरख़्तों को मन्नत के धागो से आज़ाद करते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं नार मेंडी के साहिल पे आते हुए अपने गुम गश्तरश्तो की ख़ाक-ए-सफ़र से अटी वर्दियों के निशाँ देख कर मराकिस से पलटे हुए एक जर्नेल की आख़िरी बात पर मुस्कुराते हुए इक जहाँ जंग की चोट खाते हुए हम मिलेंगे हम मिलेंगे कहीं रूस की दास्ताओं की झूठी कहानी पे आँखों में हैरत सजाए हुए, शाम लेबनान बेरूत की नरगिसी चश्मूरों की आमद के नोहू पे हँसते हुए, ख़ूनी कज़ियो से मफ़लूह जलबानियाँ के पहाड़ी इलाक़ों में मेहमान बन कर मिलेंगे हम मिलेंगे एक मुर्दा ज़माने की ख़ुश रंग तहज़ीब में ज़स्ब होने के इमकान में इक पुरानी इमारत के पहलू में उजड़े हुए लाँन में और अपने असीरों की राह देखते पाँच सदियों से वीरान ज़िंदान में हम मिलेंगे तमन्नाओं की छतरियों के तले, ख़्वाहिशों की हवाओं के बेबाक बोसो से छलनी बदन सौंपने के लिए रास्तों को हम मिलेंगे ज़मीं से नमूदार होते हुए आठवें बर्रे आज़म में उड़ते हुए कालीन पर हम मिलेंगे किसी बार में अपनी बकाया बची उम्र की पायमाली के जाम हाथ में लेंगे और एक ही घूंट में हम ये सैयाल अंदर उतारेंगे और होश आने तलक गीत गायेंगे बचपन के क़िस्से सुनाता हुआ गीत जो आज भी हम को अज़बर है बेड़ी बे बेड़ी तू ठिलदी तपईये पते पार क्या है पते पार क्या है? हम मिलेंगे बाग़ में, गाँव में, धूप में, छाँव में, रेत में, दश्त में, शहर में, मस्जिदों में, कलीसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाज़ार में, ख़्वाब में, आग में, गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमानों में कोनो मकाँ से परे गैर आबद सैयाराए आरज़ू में सदियों से ख़ाली पड़ी बेंच पर जहाँ मौत भी हम से दस्तो गरेबाँ होगी, तो बस एक दो दिन की मेहमान होगी

Tehzeeb Hafi

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"तुम हो" तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो मैं होश में बाहोश में मिरे जिस्म का तुम ख़ून हो तुम सर्द हो बरसात भी मिरी गर्मियों की तुम जून हो तुम ग़ज़ल हो हो तुम शा'इरी मिरी लिखी नज़्म की धुन हो मिरी हँसी भी तुम मिरी ख़ुशी भी तुम मिरे इस हयात की मम्नून हो तुम धूप हो मिरी छाँव भी तुम सियाह रात का मून हो तुम सिन हो तुम काफ़ भी तुम वाओ के बा'द की नून हो तुम सुकून हो पुर-सुकून हो मिरे इश्क़ का तुम जुनून हो

ZafarAli Memon

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तमाम लोग इब्तिदा में एक दूसरे के सामने हुजूम में दिखाई देने वाले कुछ निशाँ महज़ अजनबी फिर यका-यक मोजज़ा तुलूअ' का और एक रू-ए-आफ़्ताब बादलों के पार से निकल के रू-ब-रू ख़िराम-ए-नूर कू-ब-कू पुराना शहर वक़्त-ए-शाम फैलता उमडता अजनबी हुजूम हाव-हू के दरमियान मोजज़ा हुआ और एक मुज़्तरिब हसीन रू-ए-दिल-गुदाज़ मेरे जिस्म ओ जाँ में देखते ही देखते समा गया वो रौशनी था मौज-ए-आफ़्ताब था बस इक नज़र में जैसे मैं ने उस को पा लिया मैं दम-ब-ख़ुद सा रह गया ये हादसा था वाक़िआ' था कैसा इत्तिफ़ाक़ था तुलू-ए-नूर के जिलौ में इक तवील पुर-ख़तर सियाह रात शहर में उतर गई

Balraj Komal

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मुंजमिद ख़ून जब सुर्ख़ से कल सियह हो गया ख़ाक-ए-पा वाक़िआ'' हो गया ज़र्द लड़की का चेहरा फ़रिश्तों ने देखा था रंगों की तरतीब में जाने पहचाने चेहरों से मेरी मुलाक़ात जब अजनबी सी लगी आइना देखने के लिए मैं उठा आइना हो गया तीरगी से गुज़रती हुई रौशनी बर्ग-ए-असरार थी आँख के सामने रौशनी ख़ून थी ख़ून पहले गिरा मुंजमिद हो गया फिर सियह हो गया ज़र्द लड़की का चेहरा गुज़रता हुआ बर्ग-ए-असरार था रहगुज़र से लपक कर मकाँ में गया फिर दरीचे में उभरा फ़रिश्तों ने देखा था मैं ने भी देखा था मैं भी फ़रिश्ता था कल के फ़साने की तरतीब में लफ़्ज़ मुझ से जुदा थे मगर आज मेरे हैं क्यूँ आज भी अजनबी हो गए उन को क्या हो गया उन को क्या हो गया मुंजमिद ख़ून पहले सियह हो गया फिर फ़क़त वाक़िआ'' था मगर ज़र्द लड़की का चेहरा अजब नक़्श था मैं मिटाता था लेकिन वो मिटता न था दीद का हादिसा पहले मंज़र बना फिर फ़क़त एक मंज़र से बे-कार सा सिलसिला हो गया ज़र्द लड़की का चेहरा ख़ुदा से बड़ा ख़्वाब था

Balraj Komal

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आज इस शब के सन्नाटे में नींद ने आँखें फेरी हैं शहर थका-हारा ख़ामोशी की बाहोँ में सोता है यहाँ वहाँ ख़्वाबों के क़तरे शबनम बन कर गिरते हैं कभी कभी कुत्तों की आवाज़ें गलियों से उठती हैं सड़कों पर दिन की रौनक़ के भूत परेशाँ फिरते हैं ज़ख़्मों की मानिंद हसीं जिस्मों पे बरसते हैं सिक्के शीशों के पीछे अफ़्सुर्दा शमएँ अश्क बहाती हैं दस्त-ए-तलब चोरों को तारीकी में राह दिखाता है लम्हों के साहिल पर शोरिश-ए-हस्ती लहरें गिनती है जाने कितनी उम्मीदें इस रात के दिल में रोती हैं और मिरी नज़रों के आगे इम्कानात के भीगे भीगे सायों में जुगनू की तरह फ़िक्र-ओ-तख़य्युल का इक लम्हा धीरे धीरे उभरा है कितने एहसासात तड़प उट्ठे हैं रात के सीने में हाए उस लम्हे की आँखें काश मैं उन में उतर पाऊँ

Balraj Komal

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वादी-ए-मजनूँ में आबरू-ए-ख़ून में रू-ए-सरशार-ओ-हसीं मंज़र-ए-शब के क़रीं मैं तुम्हें तरतीब दूँ क़ुर्ब की तर्ग़ीब दूँ अक्स की ता'रीफ़ में रस्म की तहरीफ़ में एक अफ़्साना कहूँ सुब्ह तक जलता रहा हूँ तुम ख़िराम-ए-नाज़ से नुत्क़-ओ-लब के साज़ से मर्ग-आसा जाँ-ब-लब जादा-ए-तारीक जब ज़िंदा-ओ-रौशन करो और लहरा कर चलो क़त्ल कर देना उसे अक्स जो तुम सा न था हर्फ़ जो मुझ सा न था जज़्ब-ए-शो'ला-ए-ख़ू न था रंग जो ख़ुश्बू न था

Balraj Komal

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हरीफ़ कौन था ग़लीज़ बद-नुमा सा जानवर वो बे-ख़बर जो रेंगता हुआ चला जो रेंगता चला गया न जाने किस जहान से तुम्हारी रह में आ गया उसूल बन के ज़िंदगी के आसमाँ पे छा गया तुम्हें ये ग़म सता रहा है आज भी ग़लत घड़ी में नींद तुम को आ गई सितम अजीब ढा गई मज़ाक़ ही मज़ाक़ में ज़माने-भर के सामने तुम्हारा सर झुका गई यक़ीन से फ़रार तक हज़ार मरहले तुम्हारे ज़ेहन से गुज़र गए दिल-ओ-नज़र को वसवसों से भर गए शिकस्त की ख़लिश बड़ी शदीद थी किसी तरह न मिट सकी हुरूफ़-ए-पुर-ख़तर से फ़ैसलों को तोलती रही अना के मुज़्तरिब लहू में ज़हर घोलती रही

Balraj Komal

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