आज इस शब के सन्नाटे में नींद ने आँखें फेरी हैं शहर थका-हारा ख़ामोशी की बाहोँ में सोता है यहाँ वहाँ ख़्वाबों के क़तरे शबनम बन कर गिरते हैं कभी कभी कुत्तों की आवाज़ें गलियों से उठती हैं सड़कों पर दिन की रौनक़ के भूत परेशाँ फिरते हैं ज़ख़्मों की मानिंद हसीं जिस्मों पे बरसते हैं सिक्के शीशों के पीछे अफ़्सुर्दा शमएँ अश्क बहाती हैं दस्त-ए-तलब चोरों को तारीकी में राह दिखाता है लम्हों के साहिल पर शोरिश-ए-हस्ती लहरें गिनती है जाने कितनी उम्मीदें इस रात के दिल में रोती हैं और मिरी नज़रों के आगे इम्कानात के भीगे भीगे सायों में जुगनू की तरह फ़िक्र-ओ-तख़य्युल का इक लम्हा धीरे धीरे उभरा है कितने एहसासात तड़प उट्ठे हैं रात के सीने में हाए उस लम्हे की आँखें काश मैं उन में उतर पाऊँ
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"क्यूँ है" तुम नहीं हो यहाँ पर फिर भी तुम्हारे होने का एहसास क्यूँ है कुछ है नहीं मेरे हाथ में फिर भी कुछ होने की ये आस क्यूँ है बड़ी हैरानी है मुझे की वो दूर होकर भी इतना पास क्यूँ है सबने कहा कि वो तो पराया है वो पराया होकर भी इतना ख़ास क्यूँ है जितना वो दूर है मुझ सेे वो उतना ही मुझ को रास क्यूँ है बैठा हूँ बिल्कुल एकांत में मैं फिर भी कानों में उस की आवाज़ क्यूँ है खुल के नहीं कहती वो कुछ भी उस की आँखों में इतने राज़ क्यूँ हैं बसी है दिल में वो मेरे ये मेरा दिल उस का आवास क्यूँ है उस को नहीं भुला सकता मैं ये उस के नाम की हर श्वास क्यूँ है पूरी काइनात उस की याद दिलाती है ये तन-मन में उस का वास क्यूँ है वो मेरी हुई नहीं है अभी उस को खोने के डर से मन इतना बदहवा से क्यूँ है दूरियाँ लिखी हैं जैसे दरमियान मेरा नसीब मुझ सेे इतना नाराज़ क्यूँ है ऐसे शब्द कहाँ से लाऊँ की वो समझे जो गर ना समझा पाए तो फिर ऐसे अल्फ़ाज़ क्यूँ हैं रह तो रहा हूँ अपने निवास में उस के बिन लगता ये वनवास क्यूँ है गर मिल भी जाए संपत्ति सारी दुनिया की मगर वो साथ नहीं तो फिर ये भोगविलास क्यूँ है सोते ही उस के ख़्वाबों में और जागते ही उस के ख़यालों में कैसे भी उस का हो जाने की इतनी प्यास क्यूँ है जलती हैं ये नज़रें अब मेरी इन नैनों को हर वक़्त तेरी तलाश क्यूँ है हालात कह रहे हैं कि ये मुमकिन नहीं फिर भी तुम पुकारोगी एक दिन मुझे इतना विश्वास क्यूँ है अब भी नहीं समझी क्यूँ है तुम्हारी बहुत याद आती है तुम बिन रहा नहीं जाता बस बात कुछ यों है तुम सेे बेपनाह मोहब्बत थी है और रहेगी ये सत्य ज्यूँ का त्यों है क्यूँ है
Divya 'Kumar Sahab'
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"अंजाम" हैं लबरेज़ आहों से ठंडी हवाएँ उदासी में डूबी हुई हैं घटाएँ मोहब्बत की दुनिया पे शाम आ चुकी है सियह-पोश हैं ज़िंदगी की फ़ज़ाएँ मचलती हैं सीने में लाख आरज़ुएँ तड़पती हैं आँखों में लाख इल्तिजाएँ तग़ाफ़ुल की आग़ोश में सो रहे हैं तुम्हारे सितम और मेरी वफ़ाएँ मगर फिर भी ऐ मेरे मासूम क़ातिल तुम्हें प्यार करती हैं मेरी दुआएँ
Faiz Ahmad Faiz
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मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इंस्टॉल कर रहा हूँ और हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँ मैं अपने लफ़्ज़ों के जरिए तुम्हें साँसों के सिलेंडर भेजूँगा जो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगे और तुम्हारी देखभाल करने वालों के हाथों को काँपने नहीं देंगे ऑक्सीजन स्टॉक ख़त्म होने की ख़बरें गर्दिश भी करें तो क्या मैं तुम्हारे लिए अपनी नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊँगा अस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएँ कुछ लोग तुम सेे बिछड़ भी जाएँ तो हौसला मत हारना क्यूँँकि रात चाहे जितनी मर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती है रंग उतर जाने के लिए होते हैं और ज़ख़्म भर जाने के होते हैं
Tehzeeb Hafi
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मेरा संसार मेरे मन का सुकून भी तुम हो, तुम ही मेरी मंज़िल उस का जुनून भी तुम हो, मेरा दिन भी तुम हो, मेरी रात भी तुम हो, मेरी नींद भी तुम हो, मेरे जज़्बात भी तुम हो, मेरा हर लम्हा तुम हो, मेरे हालात भी तुम हो, मेरा जीवन भी तुम हो, इस की मस्ती भी तुम हो, हूँ अगर मैं मँझधार तो, फिर इस की कश्ती भी तुम हो, अगर हूँ मैं शरीर तो, इस की अस्थि भी तुम हो, और हूँ अगर मैं आत्मा तो, इस की मुक्ति भी तुम हो, मेरा वैराग्य भी तुम हो, मेरी आसक्ति भी तुम हो, मेरा ईश्वर भी तुम हो, मेरी भक्ति भी तुम हो, मैं अगर दिल हूँ तो, इस की धड़कन भी तुम हो, मेरी हर बात तुम हो, मेरी तड़पन भी तुम हो, मेरी स्वतंत्रता भी तुम हो, मेरा बंधन भी तुम हो, मेरा सुख भी तुम हो, मेरी मुस्कान भी तुम हो, मेरा दुख भी तुम हो, मेरा सम्मान भी तुम हो, मेरा बल भी तुम हो, मेरा स्वाभिमान भी तुम हो, मेरी प्रार्थना भी तुम हो, मेरा अभिमान भी तुम हो, मेरा हर काम भी तुम हो, थक जाऊँ तो आराम भी तुम हो, भेजे हैं तुझ को चाँद के हाथों, वो सारे पैग़ाम भी तुम हो, साँसों में बस तेरा नाम है, मेरा तो अंजाम भी तुम हो, मेरा तो आधार ही तुम हो, मेरी तो सरकार ही तुम हो, मेरी तो फ़कीरी भी तुम हो, ख़ज़ाने का अंबार भी तुम हो, मेरे लबों का मौन भी तुम हो, मेरे दिल की पुकार भी तुम हो, मेरी तो कुटिया भी तुम हो, मेरा राज-दरबार भी तुम हो, मेरा हर विकार भी तुम हो, मेरा तो श्रृंगार भी तुम हो, मेरी जीत-हार भी तुम हो, मेरा गुस्सा-प्यार भी तुम हो, मेरा तो घर बार ही तुम हो, जीने के आसार ही तुम हो, कैसे मैं बताऊ तुझे, तुम्हारे बिन मैं कुछ भी नहीं, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो, मेरा तो संसार ही तुम हो।
Divya 'Kumar Sahab'
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उस से मुहब्बत झीलें क्या हैं? उस की आँखें उम्दा क्या है? उस का चेहरा ख़ुश्बू क्या है? उस की साँसें ख़ुशियाँ क्या हैं? उस का होना तो ग़म क्या है? उस सेे जुदाई सावन क्या है? उस का रोना सर्दी क्या है? उस की उदासी गर्मी क्या है? उस का ग़ुस्सा और बहारें? उस का हँसना मीठा क्या है? उस की बातें कड़वा क्या है? मेरी बातें क्या पढ़ना है? उस का लिक्खा क्या सुनना है? उस की ग़ज़लें लब की ख़्वाहिश? उस का माथा ज़ख़्म की ख़्वाहिश? उस का छूना दुनिया क्या है? इक जंगल है और तुम क्या हो? पेड़ समझ लो और वो क्या है? इक राही है क्या सोचा है? उस से मुहब्बत क्या करते हो? उस से मुहब्बत मतलब पेशा? उस से मुहब्बत इस के अलावा? उस से मुहब्बत उस सेे मुहब्बत........
Varun Anand
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हमारे मुन्ने को चाह थी रेडियो ख़रीदें कि अब हमारे यहाँ फ़राग़त की रौशनी थी मैं अपनी देरीना तंग-दस्ती की दास्ताँ उस को क्या सुनाता उठा के ले आया तंग-ओ-तारीक कोठरी से क़लील तनख़्वाह के चिचोड़े हुए निवाले और उन में मेरी नहीफ़ बीवी ने अपनी दो-चार बाक़ी-माँदा शिकस्त-आमेज़ आरज़ूओं का ख़ून डाला न जाने कब से था प्यारे मुन्ने ने रेडियो का ये ख़्वाब पाला ये एक हफ़्ते की बात है और कल से मुन्ना ये कह रहा है ये जानवर सुब्ह-ओ-शाम बे-कार बोलता है मुहीब ख़बरों का ज़हर गीतों में घोलता है गली में कोई फ़क़ीर आए तो उस को दे दो मुझे इकन्नी का मोर ले दो
Balraj Komal
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मुश्तहर मौत की आरज़ू ने उसे मुज़्तरिब कर दिया इस क़दर एक दिन वो सलीबों के आदाद पर रोज़-ओ-शब ग़ौर करने लगा इम्तिहाँ के लिए दश्त को चल दिया अपने हिस्से की जब मुंतख़ब कर चुका उस ने तारीख़ के ज़र्द और एक पर नाम अपना ख़ुशी से रक़म कर दिया एक पर उस का सर दूसरी पर जिगर तेरी पर लटकता हुआ उस का जज़्बों से मा'मूर दिल उस की आँतें यहाँ उस की फाँकें यहाँ उस की अपनी सलीब आज कोई नहीं ज़र्द औराक़ से मिट गए सब निशाँ दश्त में दूर तक चीख़ती आँधियाँ ख़त्म उस की हुई मुश्तहर दास्ताँ
Balraj Komal
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कुछ लोग ये कहते हैं कि अच्छा या बुरा कुछ भी नहीं है तक़रीब-ए-विलादत हो या हंगाम-ए-दम-ए-मर्ग इक लम्हे को तस्वीर में ढलना है वो ढल जाता है आख़िर वो नग़्मा हो या गिर्या या अंदाज़-ए-तकल्लुम सब अक्स हैं असरार-ए-फ़ुसूँ-कार के शायद यकसाँ हैं मुकाफ़ात की यूरिश में सभी रंग सरगोशियाँ करते हैं गुज़र जाते हैं आँखों के जहाँ से पैमाना-ए-जाँ से क्या झूट है क्या सच है किसे कौन बताए सब शोर-ए-सलासिल में उतर आए हैं कुछ सोच रहे हैं तस्वीर के दो रुख़ थे कभी सुनते हैं अब लाख हुए हैं इंसान या हैवान या बे-जान कोई नाम नहीं है इक रक़्स-ए-तमव्वुज है शबीहों का हय्यूलों का सदाओं का फ़रामोश दिलों का इस राह से गुज़रे थे तुम्हें रोक लिया अपना समझ कर बातें भी हुईं तुम को ज़रा देर को सीने से लगाया आँखों में दिल ओ जाँ में बसाया जाओगे तुम्हें जाना है मालूम था मुझ को सच ये है कि तनवीर-ए-मुलाक़ात से रौशन था ये लम्हा सच ये है कि सर-ए-राह चराग़ उस ने जलाया सच ये है कि बे-साख़्ता जज़्बात से रौशन था ये लम्हा इमरोज़ ये मेरा था, मगर मेरी दुआ है ये लम्हा हम दोनों के इम्कान का मेहवर कल भी ये करे दोनों को हम दोनों को सरशार मुनव्वर
Balraj Komal
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मैं रात और दिन की मसाफ़त में रंगों की तफ़्सीर में अपने सारे अज़ीज़ों के अपने ही हाथों से क़त्ल-ए-मुसलसल में मसरूफ़ हूँ फिर मैं क्यूँँ सोचता हूँ सर-ए-जाम, हर शब कि दीदा-वरी की मता-ए-फ़िरोज़ाँ से सरशार होता तो हर ख़ुफ़्ता सर-बस्ता तहरीर से मैं गले मिल के रोता सदाओं की सरगोशियों में उतरता अजब हादसा है कि कुछ देर पहले मिरे सामने एक घाइल परिंदा गिरा है मिरे पाँव में सामने के फ़सुर्दा ओ बे-बर्ग बे-रंग से पेड़ से मेरे जाम-ए-शिकस्ता में बाक़ी थे क़तरे मय-ए-ख़ाम के कुछ इन्हें चश्म-ए-मिन्क़ार से ये मुसाफ़िर बड़े ग़ौर से देखता है इन्हें गिन रहा है ये शायद मैं सैलाब-ए-तहलील में हूँ यहाँ से कहाँ जाऊँगा दूर गर जा सकता तो वहाँ से यहाँ लौट कर किस तरह आऊँगा मैं
Balraj Komal
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इस क़दर तीरा ओ सर्द हरगिज़ न था दिल का मौसम कभी एक पल में ख़ुदा जाने क्या हो गया चाँद की वादियों में उतर आई शब! मैं वो तन्हा सुबुक-पा मुसाफ़िर था तकमील की जुस्तुजू खींच लाई थी इक रोज़ जिस को यहाँ आरज़ू थी मुझे मैं ज़मीं के लिए मेरी तर्रार पुरकार चश्म-ए-निहाँ फ़ासलों सरहदों वक़्त के सब हिसारों के उस पार की शहर-ए-इमरोज़ में अन-गिनत ख़ूब-सूरत तसावीर आवेज़ां कर देगी जब दूर की हर पुर-असरार सरशार आवाज़ मेरे लहू में उतर जाएगी मेरे दामन को फूलों से भर जाएगी सर्द से सर्द-तर हर घड़ी हो रही है रग-ओ-पै में बहते अनासिर की रौ शब गुज़र जाएगी चाँद की मुंजमिद वादियों में सुलगती हुई रौशनी सुब्ह-दम एक पल में उमँड आएगी मुझ को डर है मगर साअत-ए-नौ के हंगाम से पेशतर तीरा सर्द शब का भयानक अमल दिल के आफ़ाक़ पर हो न जाए कहीं मौत तक हुक्मराँ ख़त्म हो जाए तकमील की दास्ताँ!!
Balraj Komal
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