nazmKuch Alfaaz

तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिए वक़्त की बे-उनवान कहानी कब तक बे-उनवान रहे ऐ मिरे सोच-नगर की रानी ऐ मिरे ख़ुल्द-ए-ख़याल की हूर इतने दिनों जो मैं घुलता रहा हूँ तेरे बिना यूँँही दूर ही दूर सोच तो क्या फल मुझ को मिला मैं मन से गया फिर तन से गया शहर-ए-वतन में अजनबी ठहरा आख़िर शहर-ए-वतन से गया रूह की प्यास बुझानी थी पर यहाँ होंटों की प्यास भी बुझ न सकी बचते सँभलते भी एक सुलगता रोग बनी मिरे जी की लगी दूर की बात न सोच अभी मिरे हात में तू ज़रा हात तो दे तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिए बाग़ में है इक बेले का तख़्ता भीनी है इस बेले की सुगंध ऐ कलियो क्यूँँ इतने दिनों तुम रक्खे रहीं इसे गोद में बंद कितने ही हम से रूप के रसिया आए यहाँ और चल भी दिए तुम हो कि इतने हुस्न के होते एक न दामन थाम सके सहन-ए-चमन पर भौउँरों के बादल एक ही पल को छाएँगे फिर न वो जा कर लौट सकेंगे फिर न वो जा कर आएँगे ऐ मिरे सोच-नगर की रानी वक़्त की बातें रंग और बू हर कोई साथ किसी का ढूँडे गुल हों कि बेले मैं हूँ कि तू जो कुछ कहना है अभी कह ले जो कुछ सुनना है सुन ले तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे लिए? नहीं अपने लिए दिल की न पूछो क्या कुछ चाहे दिल का तो फैला है दामन गीत से गाल ग़ज़ल सी आँखें साअद-ए-सीमीं बर्ग-ए-दहन जूड़े के इन्हीं फूलों को देखो कल की सी इन में बास कहाँ एक इक तारा कर के डूबी माथे की तन्नाज़ अफ़्शाँ सहने का दुख सह न सके हम कहने की बातें कह न सके पास तिरे कभी आ न सके हम दूर भी तुझ से रह न सके किस से कहे अब रूह की बिपता किस को सुनाए मन की बात दूर की राह भटकता राही जीवन-रात घनेरी रात होंटों की प्यास बुझानी है अब तिरे जी को ये बात लगे न लगे तुझ से जो मैं ने प्यार किया है तेरे? लिए नहीं अपने लिए

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"उस की ख़ुशियाँ" सारी झीलें सूख गई हैं उस की आँखें सूख गई हैं पेड़ों पर पंछी भी चुप हैं उस को कोई दुख है शायद रस्ते सूने सूने हैं सब उस ने टहलना छोड़ दिया है सारी ग़ज़लें बेमानी हैं उस ने पढ़ना छोड़ दिया है वो भी हँसना भूल चुकी है गुलों ने खिलना छोड़ दिया है सावन का मौसम जारी है या'नी उस का ग़म जारी है बाक़ी मौसम टाल दिए हैं सुख कूएँ में डाल दिए हैं चाँद को छुट्टी दे दी गई है तारों को मद्धम रक्खा है आतिश-दान में फेंक दी ख़ुशियाँ दिल में बस इक ग़म रक्खा है खाना पीना छोड़ दिया है सब सेे रिश्ता तोड़ दिया है हाए क़यामत आने को है उस ने जीना छोड़ दिया है हर दिल ख़ुश हर चेहरा ख़ुश हो वो हो ख़ुश तो दुनिया ख़ुश हो वो अच्छी तो सब अच्छा है और दुनिया में क्या रक्खा है ये सब सुन कर ख़ुदा ने बोला बोल तेरी अब ख़्वाहिश क्या है मैं ने बोला मेरी ख़्वाहिश मेरी ख़्वाहिश उस की ख़ुशियाँ ख़ुदा ने बोला तेरी ख़्वाहिश मैं फिर बोला उस की ख़ुशियाँ इस के अलावा पूछ रहा हूँ मैं ने बोला उस की ख़ुशियाँ अपने लिए कुछ माँग ले पगले माँग लिया ना उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ उस की ख़ुशियाँ

Varun Anand

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जब वो इस दुनिया के शोर और ख़ामोशी से कता तअल्लुक़ होकर इंग्लिश में ग़ुस्सा करती है, मैं तो डर जाता हूँ लेकिन कमरें की दीवारें हँसने लगती हैं वो इक ऐसी आग है जिस को सिर्फ़ दहकने से मतलब है वो एक ऐसा ख़्वाब है जिस को देखने वाला ख़ुद मुश्किल में पड़ सकता है उस को छूने की ख़्वाहिश तो ठीक है लेकिन पानी कौन पकड़ सकता है वो रंगों से वाक़िफ है बल्कि हर एक रंग के शजरे तक से वाक़िफ है हम ने जिन फूलों को नफ़रत से मंसूब किया वो उन पीले फूलों की इज़्ज़त करती है कभी कभी वो अपने हाथ में पेंसिल ले कर ऐसी सतरें खेंचती है, सब कुछ सीधा हो जाता है वो चाहे तो हर इक चीज़ को उस के अस्ल में ला सकती है सिर्फ़ उसी के हाथों से दुनिया तरतीब में आ सकती है हर पत्थर उस पाँव से टकराने की ख़्वाहिश में ज़िंदा लेकिन ये तो इसी अधूरेपन का जहाँ हैं हर पिंजरे में ऐसे क़ैदी कब होते हैं हर कपड़े की क़िस्मत में वो जिस्म कहाँ हैं मेरी बे-मक़सद बातों से तंग भी आ जाती है तो महसूस नहीं होने देती लेकिन अपने होने से उकता जाती है उस को वक़्त की पाबंदी से क्या मतलब है वो तो बंद घड़ी भी हाथ में बाँध के कालेज आ जाती है

Tehzeeb Hafi

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"तारीख़ क्या है" सुब्ह रौशन थी और गर्मियों के थका देने वाले दिनों में सारी दुनिया से आज़ाद हम मछलियों की तरह मैली नेहरों में गोते लगाते अपने चेहरे पे कीचड़ लगा कर डराते थे एक दूसरे को किनारो पे बैठे हुए हम ने जो अहद एक दूसरे से लिए थे उस के धुंधले से नक़्शे आज भी मेरे दिल पर कहीं नक़्श हैं ख़ुदा रोज़ सूरज को तैयार कर के हमारी तरफ़ भेजता था और हम साया-ए-कुफ्र में एक दूजे के चेहरे की ताबिंदगी की दुआ माँगते थे उस का चेहरा कभी मेरी आँखों से ओझल नहीं हो सका, उस का चेहरा अगर मेरी आँखों से हटता तो मैं काएनात में फैले हुए उन मज़ाहिर की तफीम नज़्मों में करता, कि जिस पर बज़िद ने ये बीमार जिन्न को ख़ुद अपनी तमन्नों की आत्माओं ने इतना डराया के इनको हवस के कफ़स में मोहब्बत की किरणों ने छूने की कोशिश भी की तो ये उस सेे परे हो गए इन के बस में नहीं कि ये महसूस करते इक मोहब्बत भरे हाथ का लम्स, जिस सेे इनकार कर कर के इन के बदन खुरदरे हो गए एक दिन जो ख़ुदा और मोहब्बत की इक किस्त को अगले दिन पर नहीं टाल सकते, ख़ुदा और मोहब्बत पे रायज़नी करते थकते नहीं और इस पर भी ये चाहते हैं कि मैं इन की मर्ज़ी की नज़्में कहूँ जिन में इन की तशफ़्फी का सामान हो, आदमी पढ़के हैरान हो जिस को ये इल्म कहते हैं, उस इल्म की बात हो, फ़लसफ़ा, दीन, तारीख़, साय, समाज, अक़ीदा, ज़बान, माशी मशावात, इंसान के रंग-ओ-आदातों अतवार, ईजाद तकलीद, अम्ल इंतशार, नैनन की अज़मद के क़िस्से, खितरी बलाओं से और देवताओं से जंग, सुलहनामा लिए तेज़ रफ़्तार, घोड़ों पे सह में सिपाही, नज़रिया-ए-समावात के काट ने क्या कहा? और उस के जुराबों के फ़ीतों की डिब्बीयाँ, किमीयाँ के ख़जानों का मुँह खोलने वाला बाबल कौन था जिस ने पारे को पत्थर में ढाला और हरशल की आँखें जो बस आसमानों पे रहती, क्या वो इग्लेंड का मोसिन नहीं समुंदर की तक्सीर और एटलांटिक पे आबादियाँ, मछलियाँ क़श्तियो जैसी क्यूँ हैं? और राफेल के हाथ पर मिट्टी कैसे लगी? ये सवाल और ये सारी बातें मेरे किस काम की पिछले दस साल से उस की आवाज़ तक मैं नहीं सुन सका, और ये पूछते हैं कि हेगल के नज़दीक तारीख़ क्या है?

Tehzeeb Hafi

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"तुम अकेली नहीं हो सहेली" तुम अकेली नहीं हो सहेली जिसे अपने वीरान घर को सजाना था और एक शाइ'र के लफ़्ज़ों को सच मान कर उस की पूजा में दिन काटने थे तुम से पहले भी ऐसा ही एक ख़्वाब झूठी तस्सली में जाँ दे चुका है तुम्हें भी वो एक दिन कहेगा कि वो तुम से पहले किसी को ज़बाँ दे चुका है वो तो शाइ'र है और साफ़ ज़ाहिर है, शाइ'र हवा की हथेली पे लिखी हुई वो पहेली है जिस ने अबद और अज़ल के दरीचों को उलझा दिया है वो तो शाइ'र है, शाइ'र तमन्ना के सेहरा में रम करने वाला हिरन है शोब्दा शास सुब्हो की पहली किरन है, अदब गाहे उलफ़त का मेमार है और ख़ुद अपने ख़्वाबों का ग़द्दार है वो तो शाइ'र है, शाइ'र को बस फ़िक्र लोह क़लम है, उसे कोई दुख है किसी का न ग़म है, वो तो शाइ'र है, शाइ'र को क्या ख़ौफ़ मरने से? शाइ'र तो ख़ुद शाह सवार-ए-अज़ल है, उसे किस तरह टाल सकता है कोई कि वो तो अटल है, मैं उसे जानती हूँ सहेली, वो समुंदर की वो लहर है जो किनारो से वापस पलटते हुए मेरी खुरदरी एड़ियों पे लगी रेत भी और मुझे भी बहा ले गया वो मेरे जंगलों के दरख़्तों पे बैठी हुयी शहद की मक्खियाँ भी उड़ा ले गया उस ने मेरे बदन को छुआ और मेरी हड्डियों से वो नज़् में क़सीदी जिन्हें पढ़के मैं काँप उठती हूँ और सोचती हूँ कि ये मसला दिलबरी का नहीं ख़ुदा की क़सम खा के कहती हूँ, वो जो भी कहता रहे वो किसी का नहीं सहेली मेरी बात मानो, तुम उसे जानती ही नहीं, वो ख़ुदा-ए-सिपाह-ए-सुख़न है और तुम एक पत्थर पे नाखुन से लिखी हुई, उसी की ही एक नज़्म

Tehzeeb Hafi

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नज़्म - बेबसी तेरे साथ गुज़रे दिनों की कोई एक धुँदली सी तस्वीर जब भी कभी सामने आएगी तो हमें एक दुआ थामने आएगी, बुढ़ापे की गहराइयों में उतरते हुए तेरी बे-लौस बाँहों के घेरे नहीं भूल पाएँगे हम हम को तेरे तवस्सुत से हँसते हुए जो मिले थे वो चेहरे नहीं भूल पाएँगे हम तेरे पहलू में लेटे हुओं का अजब क़र्ब है जो रात भर अपनी वीरान आँखों से तुझे तकते थे और तेरे शादाब शानों पे सिर रख के मरने की ख़्वाहिश में जीते रहे पर तेरे लम्स का कोई इशारा मुयस्सर नहीं था मगर इस जहाँ का कोई एक हिस्सा उन्हें तेरे बिस्तर से बेहतर नहीं था पर मोहब्बत को इस सब से कोई इलाका नहीं था एक दुख तो हम बहरहाल हम अपने सीनों में ले के मरेंगे कि हम ने मोहब्बत के दावे किए तेरे माथे पर सिंदूर टाँका नहीं इस सेे क्या फ़र्क पड़ता है दूर हैं तुझ सेे या पास हैं हम को कोई आदमी तो नहीं, हम तो एहसास हैं जो रहे तो हमेशा रहेंगे और गए तो मुड़ कर वापिस नहीं आएँगे

Tehzeeb Hafi

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मुन्नी तेरे दाँत कहाँ हैं दाँत थे मैं ने दूध पिला कर सात बरस में पाले आ कर उन को ले गए चूहे लंबी मोंछों वाले गुड़ का उन को माट मिला था मीठा और मज़ेदार लाख ख़ुशामद कर के मुझ से ले लिए दाँत उधार मुन्नी तेरे दाँत कहाँ हैं बिल्ली थी इक मामी मौसी चुपके चुपके आई पंजों पर थी देग की खुरचन होंटों पर बालाई बोली गुड़ के माट पे मैं ने चूहे देखे चार हिस्सा आधों-आध रहेगा दे दो दाँत उधार मुन्नी तेरे दाँत कहाँ हैं बा'द में बूढ़ा मोती आया रोनी शक्ल बनाए बोला बीबी इस बिल्ली का कुछ तो करें उपाए दूध न छोड़े गोश्त न छोड़े हैं बुढ्ढा लाचार इस को करूँँ शिकार जो मुझ को दे दो दाँत उधार अच्छी मुन्नी तुम ने अपने इतने दाँत गँवाए कुछ चूहों ने कुछ बिल्ली ने कुछ मोती ने पाए बाक़ी जो दो-चार रहे हैं वो हम को दिलवाओ इक दावत में आज मिलेंगे तिक्के और पोलाव मुर्ग़ी के पाए का सालन बैगन का आचार दोगी या किसी और से माँगूँ हाँ दिए उधार बाबा हाँ हाँ दिए उधार मुन्नी तेरे दाँत कहाँ हैं

Ibn E Insha

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ऐ मतवालो नाक़ों वालो देते हो कुछ उस का पता नज्द के अंदर मजनूँ नामी एक हमारा भाई था आख़िर उस पर क्या कुछ बीती जानो तो अहवाल कहो मौत मिली या लैला पाई? दीवाने का मआल कहो अक़्ल की बातें कहने वाले दोस्तों ने उसे समझाया उस को तो लेकिन चुप सी लगी थी ना बोला ना बाज़ आया ख़ैर अब उस की बात को छोड़ो दीवाना फिर दीवाना जाते जाते हम लोगों का एक संदेसा ले जाना आवारा आवारा फिरना छोड़ के मंडली यारों की देख रहे हैं देखने वाले 'इंशा' का अब हाल वही क्या अच्छा ख़ुश-बाश जवाँ था जाने क्यूँँ बीमार हुआ उठते बैठते मीर की बैतें पढ़ना उस का शिआर हुआ तौर-तरीक़ा उखड़ा-उखड़ा चेहरा पीला सख़्त मलूल राह में जैसे ख़ाक पे कोई मसला मसला बाग़ का फूल शाम सवेरे बाल बिखेरे बैठा बैठा रोता है नाक़ों वालो! इन लोगों का आलम कैसा होता है अपना भी वो दोस्त था हम भी पास उस के बैठ आते हैं इधर उधर के क़िस्से कह के जी उस का बहलाते हैं उखड़ी-उखड़ी बात करे है भूल के अगला याराना कौन हो तुम किस काम से आए? हम ने न तुम को पहचाना जाने ये किस ने चोट लगाई जाने ये किस को प्यार करे तुम्हीं कहो हम किस को ढूँडें आहें खींचे नाम न ले पीत में ऐसे जान से यारो कितने लोग गुज़रते हैं पीत में नाहक़ मर नहीं जाते पीत तो सारे करते हैं ऐ मतवालो नाक़ों वालो! नगरी नगरी जाते हो कहीं जो उस की जान का बैरी मिल जाए ये बात कहो चाक-गिरेबाँ इक दीवाना फिरता है हैराँ हैराँ पत्थर से सर फोड़ मरेगा दीवाने को सब्र कहाँ तुम चाहो तो बस्ती छोड़े तुम चाहो तो दश्त बसाए ऐ मतवालो नाक़ों वालो वर्ना इक दिन ये होगा तुम लोगों से आते जाते पूछेंगे 'इंशा' का पता

Ibn E Insha

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1 ये बच्चा कैसा बच्चा है ये बच्चा काला काला सा ये काला सा मटियाला सा ये बच्चा भूका भूका सा ये बच्चा सूखा सूखा सा ये बच्चा किस का बच्चा है ये बच्चा कैसा बच्चा है जो रेत पे तन्हा बैठा है ना इस के पेट में रोटी है ना इस के तन पर कपड़ा है ना इस के सर पर टोपी है ना इस के पैर में जूता है ना इस के पास खिलौनों में कोई भालू है, कोई घोड़ा है ना इस का जी बहलाने को कोई लोरी है, कोई झूला है ना इस की जेब में धेला है ना इस के हाथ में पैसा है ना इस के अम्मी अब्बू हैं ना इस की आपा ख़ाला है ये सारे जग में तन्हा है ये बच्चा कैसा बच्चा है 2 ये सहरा कैसा सहरा है ना इस सहरा में बादल है ना इस सहरा में बरखा है ना इस सहरा में बाली है ना इस सहरा में ख़ोशा है ना इस सहरा में सब्ज़ा है ना इस सहरा में साया है ये सहरा भूक का सहरा है ये सहरा मौत का सहरा है 3 ये बच्चा कैसे बैठा है ये बच्चा कब से बैठा है ये बच्चा क्या कुछ पूछता है ये बच्चा क्या कुछ कहता है ये दुनिया कैसी दुनिया है ये दुनिया किस की दुनिया है 4 इस दुनिया के कुछ टुकड़ों में कहीं फूल खिले कहीं सब्ज़ा है कहीं बादल घिर घिर आते हैं कहीं चश्मा है कहीं दरिया है कहीं ऊँचे महल अटारीयाँ हैं कहीं महफ़िल है कहीं मेला है कहीं कपड़ों के बाज़ार सजे ये रेशम है ये दीबा है कहीं ग़ल्ले के अम्बार लगे सब गेहूँ धान मुहय्या है कहीं दौलत के संदूक़ भरे हाँ ताँबा सोना रूपा है तुम जो माँगो सो हाज़िर है तुम जो चाहो सो मिलता है इस भूक के दुख की दुनिया में ये कैसा सुख का सपना है वो किस धरती के टुकड़े हैं ये किस दुनिया का हिस्सा है 5 हम जिस आदम के बेटे हैं ये उस आदम का बेटा है ये आदम एक ही आदम है ये गोरा है या काला है ये धरती एक ही धरती है ये दुनिया एक ही दुनिया है सब इक दाता के बंदे हैं सब बंदों का इक दाता है कुछ पूरब पच्छम फ़र्क़ नहीं इस धरती पर हक़ सब का है 6 ये तन्हा बच्चा बे-चारा ये बच्चा जो यहाँ बैठा है इस बच्चे की कहीं भूक मिटे (क्या मुश्किल है हो सकता है) इस बच्चे को कहीं दूध मिले (हाँ दूध यहाँ बहतेरा है) इस बच्चे का कोई तन ढाँके (क्या कपड़ों का यहाँ तोड़ा है) इस बच्चे को कोई गोद में ले (इंसान जो अब तक ज़िंदा है) फिर देखे कैसा बच्चा है ये कितना प्यारा बच्चा है 7 इस जग में सब कुछ रब का है जो रब का है वो सब का है सब अपने हैं कोई ग़ैर नहीं हर चीज़ में सब का साझा है जो बढ़ता है जो उगता है वो दाना है या मेवा है जो कपड़ा है जो कंबल है जो चाँदी है जो सोना है वो सारा है इस बच्चे का जो तेरा है जो मेरा है ये बच्चा किस का बच्चा है ये बच्चा सब का बच्चा है!

Ibn E Insha

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चाँद कब से है सर-ए-शाख़-ए-सनोबर अटका घास शबनम में शराबोर है शब है आधी बाम सूना है, कहाँ ढूँडें किसी का चेहरा (लोग समझेंगे कि बे-रब्त हैं बातें अपनी) शे'र उगते हैं दुखी ज़ेहन से कोंपल कोंपल कौन मौसम है कि भरपूर हैं ग़म की बेलें दूर पहुँचे हैं सरकते हुए ऊदे बादल चाँद तन्हा है (अगर उस की बलाएँ ले लें?) दोस्तो जी का अजब हाल है, लेना बढ़ना चाँदनी रात है कातिक का महीना होगा मीर-ए-मग़्फ़ूर के अश'आर न पैहम पढ़ना जीने वालों को अभी और भी जीना होगा चाँद ठिठका है सर-ए-शाख़-ए-सनोबर कब से कौन सा चाँद है किस रुत की हैं रातें लोगों धुँद उड़ने लगी बुनने लगी क्या क्या चेहरे अच्छी लगती हैं दिवानों की सी बातें लोगों भीगती रात में दुबका हुआ झींगर बोला कसमसाती किसी झाड़ी में से ख़ुश्बू लपकी कोई काकुल कोई दामन, कोई आँचल होगा एक दुनिया थी मगर हम से समेटी न गई ये बड़ा चाँद चमकता हुआ चेहरा खोले बैठा रहता है सर-ए-बाम-ए-शबिस्ताँ शब को हम तो इस शहर में तन्हा हैं, हमीं से बोले कौन इस हुस्न को देखेगा ये इस से पूछो सोने लगती है सर-ए-शाम ये सारी दुनिया इन के हुजरों में न दर है न दरीचा कोई इन की क़िस्मत में शब-ए-माह को रोना कैसा इन के सीने में न हसरत न तमन्ना कोई किस से इस दर्द-ए-जुदाई की शिकायत कहिए याँ तो सीने में नियस्तां का नियस्तां होगा किस से इस दिल के उजड़ने की हिकायत कहिए सुनने वाला भी जो हैराँ नहीं, हैराँ होगा ऐसी बातों से न कुछ बात बनेगी अपनी सूनी आँखों में निराशा का घुलेगा काजल ख़ाली सपनों से न औक़ात बनेगी अपनी ये शब-ए-माह भी कट जाएगी बे-कल बे-कल जी में आती है कि कमरे में बुला लें इस को चाँद कब से है सर-ए-शाख़-ए-सनोबर अटका रात उस को भी निगल जाएगी बोलो बोलो बाम पर और न आएगा किसी का चेहरा

Ibn E Insha

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ये बच्चा काला काला सा ये काला सा, मटियाला सा ये बच्चा भूखा भूखा सा ये बच्चा सूखा सूखा सा ये बच्चा किस का बच्चा है ये बच्चा कैसा बच्चा है जो रेत पर तन्हा बैठा है ना इस के पेट में रोटी है ना इस के तन पर कपड़ा है ना इस के सर पर टोपी है ना इस के पैर में जूता है ना इस के पास खिलौना में कोई भालू है कोई घोड़ा है ना इस का जी बहलाने को कोई लोरी है कोई झूला है ना इस की जेब में धेला है ना इस के हाथ में पैसा है ना इस के अम्मी-अब्बू हैं ना इस की आपा ख़ाला है ये सारे जग में तन्हा है ये बच्चा कैसा बच्चा है ये सहरा कैसा सहरा है ना इस सहरा में बादल है ना इस सहरा में बरखा है ना इस सहरा में बाली है ना इस सहरा में ख़ोशा है ना इस सहरा में सब्ज़ा है ना इस सहरा में साया है ये सहरा भूख का सहरा है ये सहरा मौत का सहरा है ये बच्चा कैसे बैठा है ये बच्चा कब से बैठा है ये बच्चा क्या कुछ पूछता है ये बच्चा क्या कुछ कहता है ये दुनिया कैसी दुनिया है ये दुनिया किस की दुनिया है इस दुनिया के कुछ टुकड़ों में कहीं फूल खिले कहीं सब्ज़ा है कहीं बादल घिर-घिर आते हैं कहीं चश्मा है कहीं दरिया है कहीं ऊँचे महल अटरिया हैं कहीं महफ़िल है, कहीं मेला है कहीं कपड़ों के बाज़ार सजे ये रेशम है, ये दीबा है कहीं ग़ल्ले के अम्बार लगे सब गेहूँ धान मुहय्या है कहीं दौलत के संदूक़ भरे हाँ ताँबा, सोना, रूपा है तुम जो माँगो सो हाज़िर है तुम जो चाहो सो मिलता है इस भूख के दुख की दुनिया में ये कैसा सुख का सपना है वो किस धरती के टुकड़े हैं ये किस दुनिया का हिस्सा है हम जिस आदम के बेटे हैं ये उस आदम का बेटा है ये आदम एक ही आदम है वो गोरा है या काला है ये धरती एक ही धरती है ये दुनिया एक ही दुनिया है सब इक दाता के बन्दे हैं सब बंदों का इक दाता है कुछ पूरब-पच्छिम फ़र्क़ नहीं इस धरती पर हक़ सबका है ये तन्हा बच्चा बेचारा ये बच्चा जो यहाँ बैठा है इस बच्चे की कहीं भूख मिटे (क्या मुश्किल है, हो सकता है इस बच्चे को कहीं दूध मिले (हाँ दूध यहाँ बहुतेरा है) इस बच्चे का कोई तन ढाँके (क्या कपड़ों का यहाँ तोड़ा है) इस बच्चे को कोई गोद में ले (इंसान जो अब तक ज़िन्दा है) फिर देखिए कैसा बच्चा है ये कितना प्यारा बच्चा है इस जग में सब कुछ रब का है जो रब का है, वो सबका है सब अपने हैं कोई ग़ैर नहीं हर चीज़ में सबका साझा है जो बढ़ता है, जो उगता है वो दाना है, या मेवा है जो कपड़ा है, जो कंबल है जो चाँदी है, जो सोना है वो सारा है इस बच्चे का जो तेरा है, जो मेरा है ये बच्चा किस का बच्चा है ये बच्चा सबका बच्चा है

Ibn E Insha

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