nazmKuch Alfaaz

मुन्नी तेरे दाँत कहाँ हैं दाँत थे मैं ने दूध पिला कर सात बरस में पाले आ कर उन को ले गए चूहे लंबी मोंछों वाले गुड़ का उन को माट मिला था मीठा और मज़ेदार लाख ख़ुशामद कर के मुझ से ले लिए दाँत उधार मुन्नी तेरे दाँत कहाँ हैं बिल्ली थी इक मामी मौसी चुपके चुपके आई पंजों पर थी देग की खुरचन होंटों पर बालाई बोली गुड़ के माट पे मैं ने चूहे देखे चार हिस्सा आधों-आध रहेगा दे दो दाँत उधार मुन्नी तेरे दाँत कहाँ हैं बा'द में बूढ़ा मोती आया रोनी शक्ल बनाए बोला बीबी इस बिल्ली का कुछ तो करें उपाए दूध न छोड़े गोश्त न छोड़े हैं बुढ्ढा लाचार इस को करूँँ शिकार जो मुझ को दे दो दाँत उधार अच्छी मुन्नी तुम ने अपने इतने दाँत गँवाए कुछ चूहों ने कुछ बिल्ली ने कुछ मोती ने पाए बाक़ी जो दो-चार रहे हैं वो हम को दिलवाओ इक दावत में आज मिलेंगे तिक्के और पोलाव मुर्ग़ी के पाए का सालन बैगन का आचार दोगी या किसी और से माँगूँ हाँ दिए उधार बाबा हाँ हाँ दिए उधार मुन्नी तेरे दाँत कहाँ हैं

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"याद है पहले रोज़ कहा था" याद है पहले रोज़ कहा था फिर न कहना ग़लती दिल की प्यार समझ के करना लड़की प्यार निभाना होता है फिर पार लगाना होता है याद है पहले रोज़ कहा था साथ चलो तो पूरे सफ़र तक मर जाने की अगली ख़बर तक समझो यार ख़ुदा तक होगा सारा प्यार वफ़ा तक होगा फिर ये बंधन तोड़ न जाना छोड़ गए तो फिर न आना छोड़ दिया जो तेरा नहीं है चला गया जो मेरा नहीं है याद है पहले रोज़ कहा था या तो टूट के प्यार न करना या फिर पीठ पे वार न करना जब नादानी हो जाती है नई कहानी हो जाती है नई कहानी लिख लाऊँगा अगले रोज़ मैं बिक जाऊँगा तेरे गुल जब खिल जाएँगे मुझ को पैसे मिल जाएँगे याद है पहले रोज़ कहा था बिछड़ गए तो मौज उड़ाना वापस मेरे पास न आना जब कोई जा कर वापस आए रोए तड़पे या पछताए मैं फिर उस को मिलता नहीं हूँ साथ दोबारा चलता नहीं हूँ गुम जाता हूँ खो जाता हूँ मैं पत्थर का हो जाता हूँ

Khalil Ur Rehman Qamar

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"हमेशा देर कर देता हूँ" हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

Muneer Niyazi

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राइगानी मैं कमरे में पिछले इकत्तीस दिनों से फ़क़त इस हक़ीक़त का नुक़सान गिनने की कोशिश में उलझा हुआ हूँ कि तू जा चुकी है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है तुझे याद है वो ज़माना जो कैम्पस की पगडंडियों पे टहलते हुए कट गया था तुझे याद है कि जब क़दम चल रहे थे कि एक पैर तेरा था और एक मेरा क़दम वो जो धरती पे आवाज़ देते कि जैसे हो रागा कोई मुतरीबों का क़दम जैसे के सा पा गा मा पा गा सा रे वो तबले की तिरखट पे तक धिन धिनक धिन तिनक धिन धना धिन बहम चल रहे थे, क़दम चल रहे थे क़दम जो मुसलसल अगर चल रहे थे तो कितने गवइयों के घर चल रहे थे मगर जिस घड़ी तू ने उस राह को मेरे तन्हा क़दम के हवाले किया उन सुरों की कहानी वहीं रुक गई कितनी फनकारियाँ कितनी बारीकियाँ कितनी कलियाँ बिलावल गवईयों के होंठों पे आने से पहले फ़ना हो गए कितने नुसरत फ़तह कितने मेहँदी हसन मुन्तज़िर रह गए कि हमारे क़दम फिर से उठने लगें तुझ को मालूम है जिस घड़ी मेरी आवाज़ सुन के तू इक ज़ाविये पे पलट के मुड़ी थी वहाँ से, रिलेटिविटी का जनाज़ा उठा था कि उस ज़ाविये की कशिश में ही यूनान के फ़लसफ़े सब ज़मानों की तरतीब बर्बाद कर के तुझे देखने आ गए थे कि तेरे झुकाव की तमसील पे अपनी सीधी लकीरों को ख़म दे सकें अपनी अकड़ी हुई गर्दनों को लिए अपने वक़्तों में पलटें, जियोमैट्री को जन्म दे सकें अब भी कुछ फलसफ़ी अपने फीके ज़मानों से भागे हुए हैं मेरे रास्तों पे आँखें बिछाए हुए अपनी दानिस्त में यूँँ खड़े हैं कि जैसे वो दानिश का मम्बा यहीं पे कहीं है मगर मुड़ के तकने को तू ही नहीं है तो कैसे फ्लोरेन्स की तंग गलियों से कोई डिवेन्ची उठे कैसे हस्पानिया में पिकासु बने उन की आँखों को तू जो मुयस्सर नहीं है ये सब तेरे मेरे इकट्ठे ना होने की क़ीमत अदा कर रहे हैं कि तेरे ना होने से हर इक ज़मा में हर एक फ़न में हर एक दास्ताँ में कोई एक चेहरा भी ताज़ा नहीं है तुझे राइगानी का रत्ती बराबर अंदाज़ा नहीं है

Sohaib Mugheera Siddiqi

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मैं सिगरेट तो नहीं पीता मगर हर आने वाले से पूछ लेता हूँ कि "माचिस है?" बहुत कुछ है जिसे मैं फूँक देना चाहता हूँ.

Gulzar

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तुम्हारा फ़ोन आया है अजब सी ऊब शामिल हो गई है रोज़ जीने में पलों को दिन में, दिन को काट कर जीना महीने में महज़ मायूसियाँ जगती हैं अब कैसी भी आहट पर हज़ारों उलझनों के घोंसले लटके हैं चौखट पर अचानक सब की सब ये चुप्पियाँ इक साथ पिघली हैं उम्मीदें सब सिमट कर हाथ बन जाने को मचली हैं मेरे कमरे के सन्नाटे ने अँगड़ाई सी तोड़ी है मेरी ख़ामोशियों ने एक नग़्मा गुनगुनाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है सती का चैतरा दिख जाए जैसे रूप-बाड़ी में कि जैसे छठ के मौक़े' पर जगह मिल जाए गाड़ी में मेरी आवाज़ से जागे तुम्हारे बाम-ओ-दर जैसे ये नामुमकिन सी हसरत है, ख़याली है, मगर जैसे बड़ी नाकामियों के बा'द हिम्मत की लहर जैसे बड़ी बेचैनियों के बा'द राहत का पहर जैसे बड़ी गुमनामियों के बा'द शोहरत की मेहर जैसे सुब्ह और शाम को साधे हुए इक दोपहर जैसे बड़े उनवान को बाँधे हुए छोटी बहर जैसे नई दुल्हन के शरमाते हुए शाम-ओ-सहर जैसे हथेली पर रची मेहँदी अचानक मुस्कुराई है मेरी आँखों में आँसू का सितारा जगमगाया है तुम्हारा फ़ोन आया है, तुम्हारा फ़ोन आया है

Kumar Vishwas

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ऐ मतवालो नाक़ों वालो देते हो कुछ उस का पता नज्द के अंदर मजनूँ नामी एक हमारा भाई था आख़िर उस पर क्या कुछ बीती जानो तो अहवाल कहो मौत मिली या लैला पाई? दीवाने का मआल कहो अक़्ल की बातें कहने वाले दोस्तों ने उसे समझाया उस को तो लेकिन चुप सी लगी थी ना बोला ना बाज़ आया ख़ैर अब उस की बात को छोड़ो दीवाना फिर दीवाना जाते जाते हम लोगों का एक संदेसा ले जाना आवारा आवारा फिरना छोड़ के मंडली यारों की देख रहे हैं देखने वाले 'इंशा' का अब हाल वही क्या अच्छा ख़ुश-बाश जवाँ था जाने क्यूँँ बीमार हुआ उठते बैठते मीर की बैतें पढ़ना उस का शिआर हुआ तौर-तरीक़ा उखड़ा-उखड़ा चेहरा पीला सख़्त मलूल राह में जैसे ख़ाक पे कोई मसला मसला बाग़ का फूल शाम सवेरे बाल बिखेरे बैठा बैठा रोता है नाक़ों वालो! इन लोगों का आलम कैसा होता है अपना भी वो दोस्त था हम भी पास उस के बैठ आते हैं इधर उधर के क़िस्से कह के जी उस का बहलाते हैं उखड़ी-उखड़ी बात करे है भूल के अगला याराना कौन हो तुम किस काम से आए? हम ने न तुम को पहचाना जाने ये किस ने चोट लगाई जाने ये किस को प्यार करे तुम्हीं कहो हम किस को ढूँडें आहें खींचे नाम न ले पीत में ऐसे जान से यारो कितने लोग गुज़रते हैं पीत में नाहक़ मर नहीं जाते पीत तो सारे करते हैं ऐ मतवालो नाक़ों वालो! नगरी नगरी जाते हो कहीं जो उस की जान का बैरी मिल जाए ये बात कहो चाक-गिरेबाँ इक दीवाना फिरता है हैराँ हैराँ पत्थर से सर फोड़ मरेगा दीवाने को सब्र कहाँ तुम चाहो तो बस्ती छोड़े तुम चाहो तो दश्त बसाए ऐ मतवालो नाक़ों वालो वर्ना इक दिन ये होगा तुम लोगों से आते जाते पूछेंगे 'इंशा' का पता

Ibn E Insha

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1 ये बच्चा कैसा बच्चा है ये बच्चा काला काला सा ये काला सा मटियाला सा ये बच्चा भूका भूका सा ये बच्चा सूखा सूखा सा ये बच्चा किस का बच्चा है ये बच्चा कैसा बच्चा है जो रेत पे तन्हा बैठा है ना इस के पेट में रोटी है ना इस के तन पर कपड़ा है ना इस के सर पर टोपी है ना इस के पैर में जूता है ना इस के पास खिलौनों में कोई भालू है, कोई घोड़ा है ना इस का जी बहलाने को कोई लोरी है, कोई झूला है ना इस की जेब में धेला है ना इस के हाथ में पैसा है ना इस के अम्मी अब्बू हैं ना इस की आपा ख़ाला है ये सारे जग में तन्हा है ये बच्चा कैसा बच्चा है 2 ये सहरा कैसा सहरा है ना इस सहरा में बादल है ना इस सहरा में बरखा है ना इस सहरा में बाली है ना इस सहरा में ख़ोशा है ना इस सहरा में सब्ज़ा है ना इस सहरा में साया है ये सहरा भूक का सहरा है ये सहरा मौत का सहरा है 3 ये बच्चा कैसे बैठा है ये बच्चा कब से बैठा है ये बच्चा क्या कुछ पूछता है ये बच्चा क्या कुछ कहता है ये दुनिया कैसी दुनिया है ये दुनिया किस की दुनिया है 4 इस दुनिया के कुछ टुकड़ों में कहीं फूल खिले कहीं सब्ज़ा है कहीं बादल घिर घिर आते हैं कहीं चश्मा है कहीं दरिया है कहीं ऊँचे महल अटारीयाँ हैं कहीं महफ़िल है कहीं मेला है कहीं कपड़ों के बाज़ार सजे ये रेशम है ये दीबा है कहीं ग़ल्ले के अम्बार लगे सब गेहूँ धान मुहय्या है कहीं दौलत के संदूक़ भरे हाँ ताँबा सोना रूपा है तुम जो माँगो सो हाज़िर है तुम जो चाहो सो मिलता है इस भूक के दुख की दुनिया में ये कैसा सुख का सपना है वो किस धरती के टुकड़े हैं ये किस दुनिया का हिस्सा है 5 हम जिस आदम के बेटे हैं ये उस आदम का बेटा है ये आदम एक ही आदम है ये गोरा है या काला है ये धरती एक ही धरती है ये दुनिया एक ही दुनिया है सब इक दाता के बंदे हैं सब बंदों का इक दाता है कुछ पूरब पच्छम फ़र्क़ नहीं इस धरती पर हक़ सब का है 6 ये तन्हा बच्चा बे-चारा ये बच्चा जो यहाँ बैठा है इस बच्चे की कहीं भूक मिटे (क्या मुश्किल है हो सकता है) इस बच्चे को कहीं दूध मिले (हाँ दूध यहाँ बहतेरा है) इस बच्चे का कोई तन ढाँके (क्या कपड़ों का यहाँ तोड़ा है) इस बच्चे को कोई गोद में ले (इंसान जो अब तक ज़िंदा है) फिर देखे कैसा बच्चा है ये कितना प्यारा बच्चा है 7 इस जग में सब कुछ रब का है जो रब का है वो सब का है सब अपने हैं कोई ग़ैर नहीं हर चीज़ में सब का साझा है जो बढ़ता है जो उगता है वो दाना है या मेवा है जो कपड़ा है जो कंबल है जो चाँदी है जो सोना है वो सारा है इस बच्चे का जो तेरा है जो मेरा है ये बच्चा किस का बच्चा है ये बच्चा सब का बच्चा है!

Ibn E Insha

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चाँद कब से है सर-ए-शाख़-ए-सनोबर अटका घास शबनम में शराबोर है शब है आधी बाम सूना है, कहाँ ढूँडें किसी का चेहरा (लोग समझेंगे कि बे-रब्त हैं बातें अपनी) शे'र उगते हैं दुखी ज़ेहन से कोंपल कोंपल कौन मौसम है कि भरपूर हैं ग़म की बेलें दूर पहुँचे हैं सरकते हुए ऊदे बादल चाँद तन्हा है (अगर उस की बलाएँ ले लें?) दोस्तो जी का अजब हाल है, लेना बढ़ना चाँदनी रात है कातिक का महीना होगा मीर-ए-मग़्फ़ूर के अश'आर न पैहम पढ़ना जीने वालों को अभी और भी जीना होगा चाँद ठिठका है सर-ए-शाख़-ए-सनोबर कब से कौन सा चाँद है किस रुत की हैं रातें लोगों धुँद उड़ने लगी बुनने लगी क्या क्या चेहरे अच्छी लगती हैं दिवानों की सी बातें लोगों भीगती रात में दुबका हुआ झींगर बोला कसमसाती किसी झाड़ी में से ख़ुश्बू लपकी कोई काकुल कोई दामन, कोई आँचल होगा एक दुनिया थी मगर हम से समेटी न गई ये बड़ा चाँद चमकता हुआ चेहरा खोले बैठा रहता है सर-ए-बाम-ए-शबिस्ताँ शब को हम तो इस शहर में तन्हा हैं, हमीं से बोले कौन इस हुस्न को देखेगा ये इस से पूछो सोने लगती है सर-ए-शाम ये सारी दुनिया इन के हुजरों में न दर है न दरीचा कोई इन की क़िस्मत में शब-ए-माह को रोना कैसा इन के सीने में न हसरत न तमन्ना कोई किस से इस दर्द-ए-जुदाई की शिकायत कहिए याँ तो सीने में नियस्तां का नियस्तां होगा किस से इस दिल के उजड़ने की हिकायत कहिए सुनने वाला भी जो हैराँ नहीं, हैराँ होगा ऐसी बातों से न कुछ बात बनेगी अपनी सूनी आँखों में निराशा का घुलेगा काजल ख़ाली सपनों से न औक़ात बनेगी अपनी ये शब-ए-माह भी कट जाएगी बे-कल बे-कल जी में आती है कि कमरे में बुला लें इस को चाँद कब से है सर-ए-शाख़-ए-सनोबर अटका रात उस को भी निगल जाएगी बोलो बोलो बाम पर और न आएगा किसी का चेहरा

Ibn E Insha

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लब पर नाम किसी का भी हो, दिल में तेरा नक़्शा है ऐ तस्वीर बनाने वाली जब से तुझ को देखा है बे-तेरे क्या वहशत हम को, तुझ बिन कैसा सब्र ओ सुकूँ तू ही अपना शहर है जानी तू ही अपना सहरा है नीले पर्बत ऊदी धरती, चारों कूट में तू ही तू तुझ से अपने जी की ख़ल्वत तुझ से मन का मेला है आज तो हम बिकने को आए, आज हमारे दाम लगा यूसुफ़ तो बाज़ार-ए-वफ़ा में, एक टिके को बिकता है ले जानी अब अपने मन के पैराहन की गिर्हें खोल ले जानी अब आधी शब है, चार तरफ़ सन्नाटा है तूफ़ानों की बात नहीं है, तूफ़ाँ आते जाते हैं तू इक नर्म हवा का झोंका, दिल के बाग़ में ठहरा है या तू आज हमें अपना ले, या तू आज हमारा बन देख कि वक़्त गुज़रता जाए कौन अबद तक जीता है फ़र्दा महज़ फ़ुसूँ का पर्दा, हम तो आज के बंदे हैं हिज्र ओ वस्ल, वफ़ा और धोका सब कुछ आज पे रक्खा है

Ibn E Insha

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फैलता फैलता शाम-ए-ग़म का धुआँ इक उदासी का तनता हुआ साएबाँ ऊँचे ऊँचे मिनारों के सर पे रवाँ देख पहुँचा है आख़िर कहाँ से कहाँ झाँकता सूरत-ए-ख़ैल-ए-आवारगाँ ग़ुर्फ़ा ग़ुर्फ़ा बहर काख़-ओ-कू शहर में दफ़अ'तन सैल-ए-ज़ुल्मात को चीरता जल उठा दूर बस्ती का पहला दिया पंछियों ने भी पच्छिम का रस्ता लिया ख़ैर जाओ अज़ीज़ो मगर देखना एक जुगनू भी मिशअल सी ले के चला है उसे भी कोई जुस्तुजू शहर में? आसमाँ पर रवाँ सुरमई बादलो हाँ तुम्हीं क्या उड़ो और ऊँचे उड़ो बाग़-ए-आलम के ताज़ा शगुफ़्ता गुलू बे-नियाज़ाना महका करो ख़ुश रहो लेकिन इतना भी सोचा, कभी ज़ालिमो! हम भी हैं आशिक़-ए-रंग-ओ-बू शहर में कोई देखे ये मजबूरियाँ दूरियाँ एक ही शहर में हम कहाँ तुम कहाँ दोस्तों ने भी छोड़ी हैं दिल-दारियाँ आज वक़्फ़-ए-ग़म-ए-उल्फ़त-ए-राएगाँ हम जो फिरते हैं वहशत-ज़दा सरगिराँ थे कभी साहिब-ए-आबरू शहर में लोग तानों से क्या क्या जताते नहीं ऐसे राही तो मंज़िल को पाते नहीं जी से इक दूसरे को भुलाते नहीं सामने भी मगर आते जाते नहीं और जाएँ तो आँखें मिलाते नहीं हाए क्या क्या नहीं गुफ़्तुगू शहर में चाँद निकला है दाग़ों की मिशअल लिए दूर गिरजा के मीनारों की ओट से आ मिरी जान आ एक से दो भले आज फेरे करें कूचा-ए-यार के और है कौन दर्द-आश्ना बावरे! एक मैं शहर में, एक तू शहर में

Ibn E Insha

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