"तारीख़ क्या है" सुब्ह रौशन थी और गर्मियों के थका देने वाले दिनों में सारी दुनिया से आज़ाद हम मछलियों की तरह मैली नेहरों में गोते लगाते अपने चेहरे पे कीचड़ लगा कर डराते थे एक दूसरे को किनारो पे बैठे हुए हम ने जो अहद एक दूसरे से लिए थे उस के धुंधले से नक़्शे आज भी मेरे दिल पर कहीं नक़्श हैं ख़ुदा रोज़ सूरज को तैयार कर के हमारी तरफ़ भेजता था और हम साया-ए-कुफ्र में एक दूजे के चेहरे की ताबिंदगी की दुआ माँगते थे उस का चेहरा कभी मेरी आँखों से ओझल नहीं हो सका, उस का चेहरा अगर मेरी आँखों से हटता तो मैं काएनात में फैले हुए उन मज़ाहिर की तफीम नज़्मों में करता, कि जिस पर बज़िद ने ये बीमार जिन्न को ख़ुद अपनी तमन्नों की आत्माओं ने इतना डराया के इनको हवस के कफ़स में मोहब्बत की किरणों ने छूने की कोशिश भी की तो ये उस सेे परे हो गए इन के बस में नहीं कि ये महसूस करते इक मोहब्बत भरे हाथ का लम्स, जिस सेे इनकार कर कर के इन के बदन खुरदरे हो गए एक दिन जो ख़ुदा और मोहब्बत की इक किस्त को अगले दिन पर नहीं टाल सकते, ख़ुदा और मोहब्बत पे रायज़नी करते थकते नहीं और इस पर भी ये चाहते हैं कि मैं इन की मर्ज़ी की नज़्में कहूँ जिन में इन की तशफ़्फी का सामान हो, आदमी पढ़के हैरान हो जिस को ये इल्म कहते हैं, उस इल्म की बात हो, फ़लसफ़ा, दीन, तारीख़, साय, समाज, अक़ीदा, ज़बान, माशी मशावात, इंसान के रंग-ओ-आदातों अतवार, ईजाद तकलीद, अम्ल इंतशार, नैनन की अज़मद के क़िस्से, खितरी बलाओं से और देवताओं से जंग, सुलहनामा लिए तेज़ रफ़्तार, घोड़ों पे सह में सिपाही, नज़रिया-ए-समावात के काट ने क्या कहा? और उस के जुराबों के फ़ीतों की डिब्बीयाँ, किमीयाँ के ख़जानों का मुँह खोलने वाला बाबल कौन था जिस ने पारे को पत्थर में ढाला और हरशल की आँखें जो बस आसमानों पे रहती, क्या वो इग्लेंड का मोसिन नहीं समुंदर की तक्सीर और एटलांटिक पे आबादियाँ, मछलियाँ क़श्तियो जैसी क्यूँ हैं? और राफेल के हाथ पर मिट्टी कैसे लगी? ये सवाल और ये सारी बातें मेरे किस काम की पिछले दस साल से उस की आवाज़ तक मैं नहीं सुन सका, और ये पूछते हैं कि हेगल के नज़दीक तारीख़ क्या है?
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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी
Ahmad Faraz
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मुर्शिद मुर्शिद प्लीज़ आज मुझे वक़्त दीजिये मुर्शिद मैं आज आप को दुखड़े सुनाऊँगा मुर्शिद हमारे साथ बड़ा ज़ुल्म हो गया मुर्शिद हमारे देश में इक जंग छिड़ गई मुर्शिद सभी शरीफ़ शराफ़त से मर गए मुर्शिद हमारे ज़ेहन गिरफ़्तार हो गए मुर्शिद हमारी सोच भी बाज़ारी हो गई मुर्शिद हमारी फौज क्या लड़ती हरीफ़ से मुर्शिद उसे तो हम से ही फ़ुर्सत नहीं मिली मुर्शिद बहुत से मार के हम ख़ुद भी मर गए मुर्शिद हमें ज़िरह नहीं तलवार दी गई मुर्शिद हमारी ज़ात पे बोहतान चढ़ गए मुर्शिद हमारी ज़ात पलांदों में दब गई मुर्शिद हमारे वास्ते बस एक शख़्स था मुर्शिद वो एक शख़्स भी तक़दीर ले उड़ी मुर्शिद ख़ुदा की ज़ात पे अंधा यक़ीन था अफ़्सोस अब यक़ीन भी अंधा नहीं रहा मुर्शिद मोहब्बतों के नताइज कहाँ गए मुर्शिद मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद हो गई मुर्शिद हमारे गाँव के बच्चों ने भी कहा मुर्शिद कूँ आखि आ के सदा हाल देख वजं मुर्शिद हमारा कोई नहीं एक आप हैं ये मैं भी जानता हूँ के अच्छा नहीं हुआ मुर्शिद मैं जल रहा हूँ हवाएँ न दीजिये मुर्शिद अज़ाला कीजिए दुआएँ न दीजिये मुर्शिद ख़मोश रह के परेशाँ न कीजिए मुर्शिद मैं रोना रोते हुए अंधा हो गया और आप हैं के आप को एहसास तक नहीं हह! सब्र कीजे सब्र का फ़ल मीठा होता है मुर्शिद मैं भौंकदै हाँ जो कई शे वि नहीं बची मुर्शिद वहाँ यज़ीदियत आगे निकल गई और पारसा नमाज़ के पीछे पड़े रहे मुर्शिद किसी के हाथ में सब कुछ तो है मगर मुर्शिद किसी के हाथ में कुछ भी नहीं रहा मुर्शिद मैं लड़ नहीं सका पर चीख़ता रहा ख़ामोश रह के ज़ुल्म का हामी नहीं बना मुर्शिद जो मेरे यार भला छोड़ें रहने दें अच्छे थे जैसे भी थे ख़ुदा उन को ख़ुश रखें मुर्शिद हमारी रौनकें दूरी निगल गई मुर्शिद हमारी दोस्ती सुब्हात खा गए मुर्शिद ऐ फोटो पिछले महीने छिकाया हम हूँ मेकुं देख लगदा ऐ जो ऐ फोटो मेदा ऐ ये किस ने खेल खेल में सब कुछ उलट दिया मुर्शिद ये क्या के मर के हमें ज़िन्दगी मिले मुर्शिद हमारे विरसे में कुछ भी नहीं सो हम बेमौसमी वफ़ात का दुख छोड़ जाएँगे मुर्शिद किसी की ज़ात से कोई गिला नहीं अपना नसीब अपनी ख़राबी से मर गया मुर्शिद वो जिस के हाथ में हर एक चीज़ है शायद हमारे साथ वही हाथ कर गया मुर्शिद दुआएँ छोड़ तेरा पोल खुल गया तू भी मेरी तरह है तेरे बस में कुछ नहीं इंसान मेरा दर्द समझ सकते ही नहीं मैं अपने सारे ज़ख़्म ख़ुदा को दिखाऊँगा ऐ रब्बे काइनात! इधर देख मैं फ़कीर जो तेरी सरपरस्ती में बर्बाद हो गया परवरदिगार बोल कहाँ जाएँ तेरे लोग तुझ तक पहुँचने को भी वसीला ज़रूरी है परवरदिगार आवे का आवा बिगड़ गया ये किस को तेरे दीन के ठेके दिए गए हर शख़्स अपने बाप के फिरके में बंद है परवरदिगार तेरे सहीफे नहीं खुले कुछ और भेज तेरे गुज़िश्ता सहीफों से मक़सद ही हल हुए हैं मसाइल नहीं हुए जो हो गया सो हो गया, अब मुख़्तियारी छीन परवरदिगार अपने ख़लीफे को रस्सी डाल जो तेरे पास वक़्त से पहले पहुँच गए परवरदिगार उन के मसाइल का हल निकाल परवरदिगार सिर्फ़ बना देना काफ़ी नइँ तख़्लीक कर के दे तो फिर देखभाल कर हम लोग तेरी कुन का भरम रखने आए हैं परवरदिगार यार! हमारा ख़याल कर
Afkar Alvi
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क्यूँ उलझे-उलझे रहते हो? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्या अब भी तन्हा रातें हैं? क्या दर्द ही दिल बहलाते हैं? क्यूँ महफ़िल रास नहीं आती? क्यूँ कोयल गीत नहीं गाती? क्यूँ फूलों से ख़ुशबू गुम है? क्यूँ भँवरा गुमसुम- गुम-सुम है? इन बातों का क्या मतलब है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो! क्यूँ अम्मा की कम सुनते हो? क्या भीतर-भीतर गुनते हो? क्यूँ हँसना-रोना भूल गए? क्यूँ लकड़ी जैसे घुनते हो? क्या दिल को कहीं लगाए हो? क्या इश्क़ में धोका खाए हो? क्या ऐसा ही कुछ मसअला है? कुछ बोलो तो, कुछ बात करो!
Raghav Ramkaran
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मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए यूँँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँँ हो जाए और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
Faiz Ahmad Faiz
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"कच्ची उम्र के प्यार" ये कच्ची उम्र के प्यार भी बड़े पक्के निशान देते हैं आज पर कम ध्यान देते हैं बहके बहके बयान देते हैं उन को देखे हुए मुद्दत हुई और हम, अब भी जान देते हैं क्या प्यार एक बार होता है नहीं! ये बार-बार होता है तो फिर क्यूँ किसी एक का इंतिज़ार होता है वही तो सच्चा प्यार होता है अच्छा! प्यार भी क्या इंसान होता है? कभी सच्चा कभी झूठा बे-ईमान होता है उस की रगों में भी क्या ख़ानदान होता है और मक़्सद-ए-हयात नफ़ा नुक़्सान होता है प्यार तो प्यार होता है
Yasra rizvi
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मुझे बहुत है के मैं भी शामिल हूँ तेरी ज़ुल्फ़ों की ज़ाइरीनों में, जो अमावस की काली रातों का रिज़्क़ बनने से बच गए, मुझे क़सम है उदास रातों में डसने वाले यतीम साँपों की ज़हर-आलूद ज़िंदगी की, तेरे छुए जिस्म बिस्तर-ए-मर्ग पर पड़े हैं, तेरे लबों की ख़फ़ीफ़ जुंबिश से ज़लज़लों ने ज़मीं का ज़ेवर उतार फेंका, तेरी दरख्शाँ हथेलियों पर बदलते मौसम के जायकों से पता चला है के इस तअल्लुक़ की सर ज़मीं पर खीजा बहुत देर तक रहेगी, मैं जानता हूँ के मैं ने ममनू शाहों से हो के ऐसे बहुत से बाबों की सैर की है जहाँ से तू रोकती बहुत थी, ये हाथ जिन को तेरे बदन की चमक ने बरसो निढ़ाल रक्खा, हराम है के इन्होंने शाखों से फूल तोड़े हो, या किसी भी पेड़ के लचकदार बाजुओं से किसी भी मौसम का फ़ल उतारा हो, और अगर ऐसा हो भी जाता तो फिर भी तेरी शरिष्त में इंतकाम कब है, अभी मोहब्बत की सुब्ह रौशन है शाम कब है, ये दिल के शीशे पर पड़ने वाली मलाल की धूल साफ़ कर दे, मैं तुझ से छुप कर अगर किसी से मिला तो मुझे मुआ'फ़ कर दे,
Tehzeeb Hafi
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कितना अर्सा लगा ना-उमीदी के पर्बत से पत्थर हटाते हुए एक बिफरी हुई लहर को राम करते हुए ना-ख़ुदाओं में अब पीछे कितने बचे हैं? रौशनी और अँधेरे की तफ़रीक़ में कितने लोगों ने आँखें गँवा दीं कितनी सदियाँ सफ़र में गुज़ारीं मगर आज फिर उस जगह हैं जहाँ से हमें अपनी माँओं ने रुख़्सत किया था अपने सब से बड़े ख़्वाब को अपनी आँखों के आगे उजड़ते हुए देखने से बुरा कुछ नहीं है तेरी क़ुर्बत में या तुझ से दूरी पे जितनी गुज़ारी तेरी चूड़ियों की क़सम ज़िंदगी दाएरों के सिवा कुछ नहीं है कुहनियों से हमें अपना मुँह ढाँप कर खाँसने को बड़ों ने कहा था तो हम उन पे हँसते थे और सोचते थे कि उन को टिशू-पेपरों की महक से एलर्जी है लेकिन हमें ये पता ही नहीं था कि उन पे वो आफ़ात टूटी हैं जिन का हमें इक सदी बा'द फिर सामना है वबा के दिनों में किसे होश रहता है किस हाथ को छोड़ना है किसे थामना है इक रियाज़ी के उस्ताद ने अपने हाथों में परकार ले कर ये दुनिया नहीं, दायरा खींचना था ख़ैर जो भी हुआ तुम भी पुरखों के नक़्श-ए-क़दम पर चलो और अपनी हिफ़ाज़त करो कुछ महीने तुम्हें अपने तस्में नहीं बाँधने इस से आगे तो तुम पे है तुम अपनी मंज़िल पे पहुँचो या फिर रास्तों में रहो इस से पहले कि तुम अपने महबूब को वेंटीलेटर पे देखो घरों में रहो
Tehzeeb Hafi
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मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इंस्टॉल कर रहा हूँ और हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँ मैं अपने लफ़्ज़ों के जरिए तुम्हें साँसों के सिलेंडर भेजूँगा जो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगे और तुम्हारी देखभाल करने वालों के हाथों को काँपने नहीं देंगे ऑक्सीजन स्टॉक ख़त्म होने की ख़बरें गर्दिश भी करें तो क्या मैं तुम्हारे लिए अपनी नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊँगा अस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएँ कुछ लोग तुम सेे बिछड़ भी जाएँ तो हौसला मत हारना क्यूँँकि रात चाहे जितनी मर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती है रंग उतर जाने के लिए होते हैं और ज़ख़्म भर जाने के होते हैं
Tehzeeb Hafi
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एक सहेली की नसीहत तुम अकेली नहीं हो सहेली जिसे अपने वीरान घर को सजाना था और एक शाइ'र के लफ़्ज़ों को सच मानकर उस की पूजा में दिन काटने थे तुम सेे पहले भी ऐसा ही इक ख़्वाब, झूटी तसल्ली में जाँ दे चुका है तुम्हें भी वो एक दिन कहेगा कि वो, तुम सेे पहले किसी को ज़बाँ दे चुका है वो तो शाइ'र है और साफ़ ज़ाहिर है शाइ'र हवा की हथेली पे लिक्खी हुई वो पहेली है जिस ने अबद और अज़ल के दरीचों को उलझा दिया है वो तो शाइ'र है, शाइ'र तमन्ना के सहरा में रमन करने वाला हिरन है शोबदा साज़ सुब्ह की पहली किरन है अदबगाह-ए-उल्फ़त का मेमार है वो तो शाइ'र है शाइ'र को बस फ़िक्र-ए-लौह-ए-कलम है उसे कोई दुख है किसी का ना ग़म है वो तो शाइ'र है शाइ'र को क्या ख़ौफ़ मरने से शाइ'र तो ख़ुद शहसवार-ए-अजल है उसे किस तरह टाल सकता है कोई, के वो तो अटल है मैं उसे जानती हूँ, वो समुंदर की वो लहर है जो किनारे से वापस पलटते हुए मेरी खुरदुरी एड़ियों पर लगी रेत भी और मुझे भी बहा ले गया वो मेरे जंगलों के दरख़्तों पे बैठी हुई शहद की मक्खियाँ भी उड़ा ले गया उस ने मेरे बदन को छुआ और मेरी हड्डियों से वो नज़्में कशीदी जिन्हें पढ़ के मैं काँप उठती हूँ और सोचती हूँ कि ये मसअला दिलबरी का नहीं ख़ुदा की क़सम खा के कहती हूँ वो जो भी कहता रहे वो किसी का नहीं सहेली तुम मेरी बात मानो तुम उसे जानती ही नहीं वो ख़ुदा-ए-सिपाह-ए-सुख़न है और तुम एक पत्थर पे नाखुन से लिखी हुई उसी की ही एक नज़्म हो
Tehzeeb Hafi
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मोहब्बत ख़ुद अपने लिए जिस्म चुनती है और जाल बुनती है उन के लिए जो ये आग अपने सीनों में भरने को तय्यार हों घुट के जीने से बेज़ार हों मोहब्बत कभी एक से या कभी एक सौ एक लोगों से होने का ऐलान एक साथ करती है इस में कई उम्र जिन की कोई क़द्र नहीं मोहब्बत किसी बेंच पर एक मर्द और औरत ने खाई हुई इक अधूरी क़सम है मोहब्बत में मर जाना मरना नहीं मोहब्बत तो ख़ुद देवताओं का पुनर्जनम है मोहब्बत किसी राहेबाँ की कलाई से उतरी हुई चूड़ियों की खनक है मोहब्बत किसी एक मुर्दा सितारे को ख़ैरात में मिलने वाली चमक है मोहब्बत पे शक तो ख़ुद अपने ही हस्ती पे शक है मोहब्बत तो महबूब के क़द्द-ओ-कामत से जन्मी हुई वो अलामत है और तेज़ बारिश में सह में हुए हाथियों पर बड़ी छतरियों की तरह है मोहब्बत सर्द मुल्कों में वापस पलटते हुए अपने ज़ख़्मी परों से ख़लाओं में लहू की लकीरें बनाती हुई गूँज है, मूँज है और दिल की ज़मीनों को सैराब करती हुई नहर है, क़हर है, ज़हर है जो रगों में उतरकर बदन को उदासी के उस शहर में मारकर ख़ैर आबाद कहती है जो कैलोविनो ने बस ज़ेहन में तसव्वुर किया था जो मस्जिद में सिपारों को सीनों में महफ़ूज़ करते हुए बच्चियों को ख़ुदा से डराते हुए मौलवी का मकर है मोहब्बत कलीसाओं में रूसी अखरोट की लकड़ियों से बनी कुर्सियों पर बुज़ुर्गों की आँखों में मरने का डर है मोहब्बत मोहब्बत ज़हीनों पे खुलती है इस को कभी कुंद ज़ेहनों से कोई नाका नहीं मोहब्बत को क्या कोई अपना है या ग़ैर है इस में आदमी सब कुछ लुटाकर भी कहता है कि ख़ैर है
Tehzeeb Hafi
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