कितना अर्सा लगा ना-उमीदी के पर्बत से पत्थर हटाते हुए एक बिफरी हुई लहर को राम करते हुए ना-ख़ुदाओं में अब पीछे कितने बचे हैं? रौशनी और अँधेरे की तफ़रीक़ में कितने लोगों ने आँखें गँवा दीं कितनी सदियाँ सफ़र में गुज़ारीं मगर आज फिर उस जगह हैं जहाँ से हमें अपनी माँओं ने रुख़्सत किया था अपने सब से बड़े ख़्वाब को अपनी आँखों के आगे उजड़ते हुए देखने से बुरा कुछ नहीं है तेरी क़ुर्बत में या तुझ से दूरी पे जितनी गुज़ारी तेरी चूड़ियों की क़सम ज़िंदगी दाएरों के सिवा कुछ नहीं है कुहनियों से हमें अपना मुँह ढाँप कर खाँसने को बड़ों ने कहा था तो हम उन पे हँसते थे और सोचते थे कि उन को टिशू-पेपरों की महक से एलर्जी है लेकिन हमें ये पता ही नहीं था कि उन पे वो आफ़ात टूटी हैं जिन का हमें इक सदी बा'द फिर सामना है वबा के दिनों में किसे होश रहता है किस हाथ को छोड़ना है किसे थामना है इक रियाज़ी के उस्ताद ने अपने हाथों में परकार ले कर ये दुनिया नहीं, दायरा खींचना था ख़ैर जो भी हुआ तुम भी पुरखों के नक़्श-ए-क़दम पर चलो और अपनी हिफ़ाज़त करो कुछ महीने तुम्हें अपने तस्में नहीं बाँधने इस से आगे तो तुम पे है तुम अपनी मंज़िल पे पहुँचो या फिर रास्तों में रहो इस से पहले कि तुम अपने महबूब को वेंटीलेटर पे देखो घरों में रहो
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"पेड़" सत्रह अठराह साल की थी वो जब वो दुनिया छोड़ गई थी आख़िरी साँसें गिनती लड़की मुझ सेे हिम्मत बाँट रही थी हाथ पकड़ के डाँट रही थी ऐसे थोड़ी करते हैं आशिक़ थोड़ी मरते हैं जिस्म तो एक कहानी है साँसें आनी जानी हैं उस ने कहा था प्यारे लड़के सब सेे मिलना हँस के मिलना मेरी याद में पेड़ लगाना पागल लड़के इश्क़ के हामी मेरे पीछे मर मत जाना इश्क़ किया था इश्क़ निभाना
Rishabh Sharma
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भारत के ऐ सपूतो हिम्मत दिखाए जाओ दुनिया के दिल पे अपना सिक्का बिठाए जाओ मुर्दा-दिली का झंडा फेंको ज़मीन पर तुम ज़िंदा-दिली का हर-सू परचम उड़ाए जाओ लाओ न भूल कर भी दिल में ख़याल-ए-पस्ती ख़ुश-हाली-ए-वतन का बेड़ा उठाए जाओ तन-मन मिटाए जाओ तुम नाम-ए-क़ौमीयत पर राह-ए-वतन में अपनी जानें लड़ाए जाओ कम-हिम्मती का दिल से नाम-ओ-निशाँ मिटा दो जुरअत का लौह-ए-दिल पर नक़्शा जमाए जाओ ऐ हिंदूओ मुसलमाँ आपस में इन दिनों तुम नफ़रत घटाए जाओ उल्फ़त बढ़ाए जाओ 'बिक्रम' की राज-नीती 'अकबर' की पॉलीसी की सारे जहाँ के दिल पर अज़्मत बिठाए जाओ जिस कश्मकश ने तुम को है इस क़दर मिटाया तुम से हो जिस क़दर तुम उस को मिटाए जाओ जिन ख़ाना-जंगियों ने ये दिन तुम्हें दिखाए अब उन की याद अपने दिल में भुलाए जाओ बे-ख़ौफ़ गाए जाओ ''हिन्दोस्ताँ हमारा'' और ''वंदे-मातरम'' के नारे लगाए जाओ जिन देश सेवकों से हासिल है फ़ैज़ तुम को इन देश सेवकों की जय जय मनाए जाओ जिस मुल्क का हो खाते दिन रात आब-ओ-दाना उस मलक पर सरों की भेटें चढ़ाए जाओ फाँसी का जेल का डर दिल से 'फ़लक' मिटा कर ग़ैरों के मुँह पे सच्ची बातें सुनाते जाओ
Lal Chand Falak
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"दोस्त के नाम ख़त" तुम ने हाल पूछा है हालत-ए-मोहब्बत में हाल का बताना क्या! दिल सिसक रहा हो तो ज़ख़्म का छुपाना क्या! तुम जो पूछ बैठे हो कुछ तो अब बताना है बात एक बहाना है तुम ने हाल पूछा है इक दिया जलाता हूँ ठीक है बताता हूँ रोज़ उस की यादों में दूर तक चले जाना जो भी था कहा उस ने अपने साथ दोहराना साँस जब रुके तो फिर अपनी मरती आँखों में उस की शक्ल ले आना और ज़िन्दगी पाना रोज़ ऐसे होता है कुछ पुराने मैसेज हैं जिन में उस की बातें हैं कुछ तबील सुब्हे हैं कुछ क़दीम रातें हैं मैं ने उस की बातों में ज़िन्दगी गुज़ारी है ज़िन्दगी मिटाने का हौसला नहीं मुझ में एक एक लफ़्ज़ उस का साँस में पिरोया है, रूह में समोया है उस के जितने मैसेज है रोज़ खोल लेता हूँ उस सेे कह नहीं पाता ख़ुद से बोल लेता हूँ उस के पेज पर जा कर रोज़ देखता हूँ मैं आज कितने लोगों ने उस की पैरवी की है और सोचता हूँ मैं ये नसीब वाले हैं उस को देख सकते हैं उस सेे बात करते हैं ये इजाज़तों वाले मुझ सेे कितने बेहतर हैं मैं तो दाग़ था कोई जो मिटा दिया उस ने गर मिटा दिया उस ने ठीक ही किया उस ने, तुम ने हाल पूछा था लो बता दिया मैं ने जो भी कुछ बताया है उस को मत बता देना पढ़ के रो पड़ो तो फिर इन तमाम लफ़्ज़ों को बस गले लगा लेना, वो मेरी मोहब्बत है और सदा रहेगी वो जब नहीं रहूँगा तो एक दिन कहेगी वो तुम अली फ़क़त तुम थे जिस ने मुझ को चाहा था जिस ने मेरे माथे को चूम कर बताया था तुम दुआ का चेहरा हो तुम हया का पहरा हो मैं तो तब नहीं हूँगा पर मेरी सभी नज़्में उस की बात सुन लेंगी तुम भी मुस्कुरा देना फिर बहुत मोहब्बत से उस को सब बता देना उस के नर्म हाथों में मेरा ख़त थमा देना लो ये ख़त तुम्हारा है और उस की जानिब से वो जो बस तुम्हारा था आज भी तुम्हारा है
Ali Zaryoun
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रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई डरता हूँ कहीं ख़ुश्क न हो जाए समुंदर राख अपनी कभी आप बहाता नहीं कोई इक बार तो ख़ुद मौत भी घबरा गई होगी यूँ मौत को सीने से लगाता नहीं कोई माना कि उजालों ने तुम्हें दाग़ दिए थे बे-रात ढले शमा' बुझाता नहीं कोई साक़ी से गिला था तुम्हें मय-ख़ाने से शिकवा अब ज़हरस भी प्यास बुझाता नहीं कोई हर सुब्ह हिला देता था ज़ंजीर ज़माना क्यूँ आज दिवाने को जगाता नहीं कोई अर्थी तो उठा लेते हैं सब अश्क बहा के नाज़-ए-दिल-ए-बेताब उठाता नहीं कोई
Kaifi Azmi
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दुहाई ख़ुदा करे कि शब-ए-वस्ल रास आए तुझे हमारी तरह गले से कोई लगाए तुझे तिरी निगाह से छुप कर तिरे ही कानों में जो बात हम ने कही थी वही सुनाए तुझे मज़ा तो जब है कि वो बे-ख़ुदी के आलम में हमारे शे'र पढ़े और गुदगुदाए तुझे हमारे तर्ज़-ए-तकल्लुम की चाशनी ले कर समाअतों को तिरी चू में और लुभाए तुझे इसी मिज़ाज से ले कर शुऊर-ए-इश्क़ कभी हमारे साँचे में ढल जाए और रिझाए तुझे तू रूठ जाए तो उस के दिल-ओ-जिगर काँपें रुँधी ज़बान से क़स में भरे मनाए तुझे तू उस की आँख में झाँके तो हम ही आएँ नज़र फिर ऐसे वक़्त में क्या कुछ न याद आए तुझे मगर जो ज़िक्र हमारा छिड़े तो चुप रहना जतन वो लाख करे पर पकड़ न पाए तुझे मिले कभी तो 'बशर' बे-समझ को समझाना जुनून-ए-इश्क़ भुला कर वो भूल जाए तुझे
Dharmesh bashar
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मैं सपनों में ऑक्सीजन प्लांट इंस्टॉल कर रहा हूँ और हर मरने वाले के साथ मर रहा हूँ मैं अपने लफ़्ज़ों के जरिए तुम्हें साँसों के सिलेंडर भेजूँगा जो तुम्हें इस जंग में हारने नहीं देंगे और तुम्हारी देखभाल करने वालों के हाथों को काँपने नहीं देंगे ऑक्सीजन स्टॉक ख़त्म होने की ख़बरें गर्दिश भी करें तो क्या मैं तुम्हारे लिए अपनी नज़्मों से वेंटीलेटर बनाऊँगा अस्पतालों के बिस्तर भर भी जाएँ कुछ लोग तुम सेे बिछड़ भी जाएँ तो हौसला मत हारना क्यूँँकि रात चाहे जितनी मर्ज़ी काली हो गुज़र जाने के लिए होती है रंग उतर जाने के लिए होते हैं और ज़ख़्म भर जाने के होते हैं
Tehzeeb Hafi
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सुब्हें रौशन थी और गर्मियों की थका देने वाले दिनों में सारी दुनिया से आज़ाद हम मछलियों की तरह मैली नहरों में गोते लगाते अपने चेहरों से कीचड़ लगाकर डराते थे एक दूसरे को किनारों पर बैठे हुए हम ने जो अहद एक दूसरे से लिए थे उस के धुँधले से नक़्शे आज भी मेरे दिल पर कहीं नक़्श है ख़ुदा रोज़ सूरज को तैयार कर के हमारी तरफ़ भेजता था और हम साया-ए-कुफ़्र में इक दूजे के चेहरे की ताबिंदगी की दुआ माँगते थे उस का चेहरा कभी मेरी आँखों से ओझल नहीं हो सका उस का चेहरा अगर मेरी आँखों से हटता तो मैं काएनातों में फैले हुए उन मज़ाहिर की तफ़्हीम नज़्मों में करता कि जिस पर बज़िद है ये बीमार जिन को ख़ुद अपनी तमन्नाओं की आत्माओं ने इतना डराया कि इनको हवस के क़फ़स में मोहब्बत की किरनों ने छूने की कोशिश भी की तो ये उस से परे हो गए इन के बस में नहीं कि ये महसूस करते एक मोहब्बत भरे हाथ का लम्स जिन से इनकार कर कर के इन के बदन खुरदुरे हो गए एक दिन जो ख़ुदा और मोहब्बत की एक क़िस्त को अगले दिन पर नहीं टाल सकते ख़ुदा और मोहब्बत पर राए-ज़नी करते थकते नहीं और इस पर भी ये चाहते हैं कि मैं इन की मर्ज़ी की नज़्में कहूँ जिन में इन की तशफ़्फी का सामान हो, आदमी पढ़ के हैरान हो जिस को ये इल्म कहते है, उस इल्म की बात हो फ़लसफ़ा, दीन, तारीख़, साइंस, समाज, अक़ीदा, ज़बान-ए-मआशी, मुसावात, इंसान के रंग-ओ-आदात-ओ-अतवार ईजाद, तक़लीद, अम्न, इंतिशार, लेनिन की अज़मत के क़िस्से फ़ितरी बलाओं से और देवताओं से जंग, सुल्ह-नामा लिए तेज़ रफ़्तार घोड़ों पर सह में सिपाही नज़िया-ए-समावात में कान में क्या कहा और उस की जुराबों के फीतों की डिबिया कीमिया के खज़ानों का मुँह खोलने वाला बाबुल कौन था, जिस ने पारे को पत्थर में ढाला और हर्शल की आँखें जो बस आसमानों पर रहती, क्या वो इंग्लैंड का मोहसिन नहीं समुंदर की तस्ख़ीर और अटलांटिक पे आबादियाँ, मछलियाँ कश्तियों जैसी क्यूँ है और राफेल के हाथ पर मट्टी कैसे लगी, क्या ये नीत्शे का मतलब भी निश्ते की तरह नहीं तो नहीं है ये सवाल और ये सारी बातें मेरे किस काम की पिछले दस साल से उस की आवाज़ तक मैं नहीं सुन सका और ये पूछते है कि हेगेल के नज़दीक तारीख़ क्या है
Tehzeeb Hafi
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मुझे बहुत है के मैं भी शामिल हूँ तेरी ज़ुल्फ़ों की ज़ाइरीनों में, जो अमावस की काली रातों का रिज़्क़ बनने से बच गए, मुझे क़सम है उदास रातों में डसने वाले यतीम साँपों की ज़हर-आलूद ज़िंदगी की, तेरे छुए जिस्म बिस्तर-ए-मर्ग पर पड़े हैं, तेरे लबों की ख़फ़ीफ़ जुंबिश से ज़लज़लों ने ज़मीं का ज़ेवर उतार फेंका, तेरी दरख्शाँ हथेलियों पर बदलते मौसम के जायकों से पता चला है के इस तअल्लुक़ की सर ज़मीं पर खीजा बहुत देर तक रहेगी, मैं जानता हूँ के मैं ने ममनू शाहों से हो के ऐसे बहुत से बाबों की सैर की है जहाँ से तू रोकती बहुत थी, ये हाथ जिन को तेरे बदन की चमक ने बरसो निढ़ाल रक्खा, हराम है के इन्होंने शाखों से फूल तोड़े हो, या किसी भी पेड़ के लचकदार बाजुओं से किसी भी मौसम का फ़ल उतारा हो, और अगर ऐसा हो भी जाता तो फिर भी तेरी शरिष्त में इंतकाम कब है, अभी मोहब्बत की सुब्ह रौशन है शाम कब है, ये दिल के शीशे पर पड़ने वाली मलाल की धूल साफ़ कर दे, मैं तुझ से छुप कर अगर किसी से मिला तो मुझे मुआ'फ़ कर दे,
Tehzeeb Hafi
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मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं तन्हा पेड़ हूँ जंगल का मेरे पत्ते झड़ते जाते हैं मैं कौन हूँ, क्या हूँ, कब की हूँ एक तेरी कब हूँ, सबकी हूँ मैं कोयल हूँ शहराओ की मुझे ताब नहीं है छांव की एक दलदल है तेरे वादों की मेरे पैर उखड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारो मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं मैं किस बच्चे की गुड़िया थी मैं किस पिंजरे की चिड़िया थी मेरे खेलने वाले कहाँ गए मुझे चूमने वाले कहाँ गए मेरे झुमके गिरवी मत रखना मेरे कंगन तोड़ ना देना मैं बंजर होती जाती हूँ कहीं दरिया मोड़ ना देना कभी मिलना इस पर सोचेंगे हम क्या मंजिल पर पहुंचेंगे रास्तों में ही लड़ते जाते हैं मेरे ज़ख़्म नहीं भरते यारों मेरे नाखून बढ़ते जाते हैं
Tehzeeb Hafi
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सफ़ेद शर्ट थी तुम सीढ़ियों पे बैठे थे मैं जब क्लास से निकली थी मुस्कुराते हुए हमारी पहली मुलाक़ात याद है ना तुम्हें? इशारे करते थे तुम मुझ को आते जाते हुए तमाम रात को आँखें न भूलती थीं मुझे कि जिन में मेरे लिए इज़्ज़त और वक़ार दिखे मुझे ये दुनिया बयाबान थी मगर इक दिन तुम एक बार दिखे और बेशुमार दिखे मुझे ये डर था कि तुम भी कहीं वो ही तो नहीं जो जिस्म पर ही तमन्ना के दाग़ छोड़ते हैं ख़ुदा का शुक्र कि तुम उन सेे मुख़्तलिफ़ निकले जो फूल तोड़ के ग़ुस्से में बाग़ छोड़ते हैं ज़ियादा वक़्त न गुज़रा था इस तअल्लुक़ को कि उस के बा'द वो लम्हा करीं करीं आया छुआ था तुम ने मुझे और मुझे मोहब्बत पर यक़ीन आया था लेकिन कभी नहीं आया फिर उस के बा'द मेरा नक़्शा-ए-सुकूत गया मैं कश्मकश में थी तुम मेरे कौन लगते हो मैं अमृता तुम्हें सोचूँ तो मेरे साहिर हो मैं फ़ारिहा तुम्हें देखूँ तो जॉन लगते हो हम एक साथ रहे और हमें पता न चला तअल्लुक़ात की हद बंदियाँ भी होती हैं मोहब्बतों के सफ़र में जो रास्ते हैं वहीं हवस की सिम्त में पगडंडियाँ भी होती हैं तुम्हारे वास्ते जो मेरे दिल में है 'हाफ़ी' तुम्हें ये काश मैं सब कुछ कभी बता पाती और अब मज़ीद न मिलने की कोई वजह नहीं बस अपनी माँ से मैं आँखें नहीं मिला पाती
Tehzeeb Hafi
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