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अजीब मा-फ़ौक़ सिलसिला था शजर जड़ों के बग़ैर ही उग रहे थे ख़े में बग़ैर चोबों के और तनाबों के आसरे के ज़मीं पे इस्तादा हो रहे थे चराग़ लौ के बग़ैर ही जल रहे थे कूज़े बग़ैर मिट्टी के चाक पर ढल रहे थे दरिया बग़ैर पानी के बह रहे थे सभी दुआएँ गिरफ़्ता-पा थीं रुकी हुई चीज़ें क़ाफ़िला थीं पहाड़ बारिश के एक क़तरे से घुल रहे थे बग़ैर चाबी के क़ुफ़्ल अज़-ख़ुद ही खुल रहे थे निडर पियादा थे और बुज़दिल असील घोड़ों पे बैठ कर जंग लड़ रहे थे गुनाहगारों ने सर से पा तक बदन को बुर्राक़ चादरों से ढका हुआ था वली की नंगी कमर छुपाने को कोई कपड़ा नहीं बचा था अजीब मा-फ़ौक़ सिलसिला था

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"भली सी एक शक्ल थी" भले दिनों की बात है भली सी एक शक्ल थी न ये कि हुस्न-ए-ताम हो न देखने में आम सी न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे कोई भी रुत हो उस की छब फ़ज़ा का रंग-रूप थी वो गर्मियों की छाँव थी वो सर्दियों की धूप थी न मुद्दतों जुदा रहे न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद न ये कि इज़्न-ए-आम हो न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ कि सादगी गिला करे न इतनी बे-तकल्लुफ़ी कि आइना हया करे न इख़्तिलात में वो रम कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें न इस क़दर सुपुर्दगी कि ज़च करें नवाज़िशें न आशिक़ी जुनून की कि ज़िंदगी अज़ाब हो न इस क़दर कठोर-पन कि दोस्ती ख़राब हो कभी तो बात भी ख़फ़ी कभी सुकूत भी सुख़न कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ कभी उदासियों का बन सुना है एक उम्र है मुआमलात-ए-दिल की भी विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी सो एक रोज़ क्या हुआ वफ़ा पे बहस छिड़ गई मैं इश्क़ को अमर कहूँ वो मेरी ज़िद से चिड़ गई मैं इश्क़ का असीर था वो इश्क़ को क़फ़स कहे कि उम्र भर के साथ को वो बद-तर-अज़-हवस कहे शजर हजर नहीं कि हम हमेशा पा-ब-गिल रहें न ढोर हैं कि रस्सियाँ गले में मुस्तक़िल रहें मोहब्बतों की वुसअतें हमारे दस्त-ओ-पा में हैं बस एक दर से निस्बतें सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं मैं कोई पेंटिंग नहीं कि इक फ़्रेम में रहूँ वही जो मन का मीत हो उसी के प्रेम में रहूँ तुम्हारी सोच जो भी हो मैं उस मिज़ाज की नहीं मुझे वफ़ा से बैर है ये बात आज की नहीं न उस को मुझ पे मान था न मुझ को उस पे ज़ोम ही जो अहद ही कोई न हो तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी सो अपना अपना रास्ता हँसी-ख़ुशी बदल दिया वो अपनी राह चल पड़ी मैं अपनी राह चल दिया भली सी एक शक्ल थी भली सी उस की दोस्ती अब उस की याद रात दिन नहीं, मगर कभी कभी

Ahmad Faraz

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मैं रात उठूँ और अपने सारे पुराने यारों को फ़ोन कर के उन्हें जगाऊँ उन्हें जगाऊँ उन्हें बताऊँ कि यार तुम सब बदल गए हो बहुत ही आगे निकल गए हो जो राहें तुम ने चुनी हुई हैं वो कितनी तन्हा हैं कितनी ख़ाली जो रातें तुम ने पसंद की हैं वो सख़्त काली हैं सख़्त काली ज़रा सा माज़ी बईद देखो हम ऐसी दुनिया में जी रहे थे जहाँ पे हम से अगर हमारा कोई भी जिगरी ख़फ़ा हुआ तो हम उस का ग़ुस्सा ख़ुद अपने ऊपर निकालते थे हँसी की बातें, अजीब क़िस्से, अजीब सस्ते से जोक कह के किसी भी हालत, किसी भी क़ीमत पे उस ख़फ़ा को हँसा रहे थे और आज आलम है ऐसा हम सब ख़फ़ा ख़फ़ा हैं जुदा जुदा हैं हमारी लाइफ़ में कोई लड़की हमारी लाइफ़ बनी हुई है हमारी आँखों पे प्यार नामक सफ़ेद पट्टी बंधी हुई है तुम्हारी लाइफ़ को किस तरह तुम बिता रहे हो किसी हसीना की उलझी ज़ुल्फ़ें सँवारते हो उसी की नख़रे उठा रहे हो, रुला रहे हो, मना रहे हो ये बातें अपने मैं दोस्तों को सुनाना चाहूँ तो फ़ोन उठाऊँ जो फ़ोन उठाऊँ तो कॉन्टैक्ट को खँगाल बैठूँ मगर तअज्जुब के मेरी उँगली मेरी बग़ावत में आ खड़ी है किसी हसीना के एक नंबर को कॉल करने पे जा अड़ी है सो मैं किसी यार, दोस्त को फिर पुरानी यादें दिलाऊँ कैसे किसी का नंबर लगाऊँ कैसे मैं ख़ुद सभी को भुला चुका हूँ मैं कॉल आख़िर मिलाऊँ कैसे ??

Shadab Javed

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"अश्क" अश्क तेरे हों या मेरे अश्क अश्क होते हैं अश्क का कोई न मज़हब होता है न कोई जात होती है अश्क अश्क होते हैं कभी ये सँभालते हैं तो कभी बिगाड़ते हैं ज़िंदा हैं तो अश्क हैं है बा'द मौत के भी अश्क शजर के अपने अश्क हैं शाख के भी अपने अश्क हैं फूल के अपने अश्क हैं कली के भी अपने अश्क हैं आँख के अपने अश्क हैं ज़ेहन के अपने अश्क हैं लब के अपने अश्क हैं दिल के भी कुछ अश्क हैं दरिया के अपने अश्क हैं समुंदर के अपने अश्क हैं माशूका के अपने अश्क हैं माशूक के अपने अश्क हैं राह चलते राही के अश्क हैं तवायफ़ के अपने अश्क हैं ज़ख़्म के अपने अश्क हैं तो मरहम के अपने अश्क हैं वफ़ा के अपने अश्क हैं बे-वफ़ा के भी अपने अश्क हैं मुफ़्लिसी के अपने अश्क हैं अमीरी के अपने अश्क हैं बिना बाम-ओ-दीवार के अश्क हैं तो बाम-ओ-दीवार में भी अश्क हैं बचपन के थोड़े अश्क हैं जवानी में ज़ियादा अश्क हैं बुढ़ापे तो अश्कों का अश्क हैं ज़रूरी नहीं ग़म के अश्क हैं ख़ुशी के अपने अश्क हैं

Lalit Mohan Joshi

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"नज़्म क्या है" शा'इरी की दो सिंफ़ें हैं नज़्म-ओ-ग़ज़ल उर्दू में इन की शोहरत है बच्चो अटल नज़्म पाबंद है नज़्म आज़ाद भी ये कभी नस्र है और मुअर्रा कभी नज़्म-ए-पाबंद में वज़्न होगा म्याँ और आज़ाद में भी है इस का निशाँ नज़्म-ए-पाबंद का तर्ज़ है जो लतीफ़ इस में पाओगे तुम क़ाफ़िया-ओ-रदीफ़ नसरी नज़्मों में बस नस्र ही नस्र है वज़्न और क़ाफ़िया है न ही बहर है वज़्न और क़ाफ़िए जिन को मुश्किल हुए नसरी नज़्में उमूमन वो कहते लगे वज़्न नज़्म-ए-मुअर्रा में है दोस्तो इस को तुम बे-रदीफ़-ओ-क़वाफ़ी कहो मसनवी हो क़सीदा हो या मर्सिया नज़्म का मिलता है बच्चो हम को पता नज़्म में सिलसिला है ख़यालात का एक दरिया सा है देखो जज़्बात का वो मुख़म्मस हो या हो मुसद्दस कोई ये भी इक शक्ल है नज़्म-ए-पाबंद की वो ग़ज़ल हो कि हो नज़्म बच्चो सुनो दोनों यकसाँ हैं शोहरत में बस जान लो 'जोश' की नज़्में मशहूर हैं हर जगह हैं ग़ज़ल के 'जिगर' वाक़ई बादशह नज़्म में जो कहानी कही जाएगी शौक़ से ऐ मियाँ वो सुनी जाएगी नज़्में सीमाब-ओ-इक़बाल ने भी लिखीं जो निहायत ही मशहूर साबित हुईं करता हूँ बच्चों के वास्ते मैं दुआ नज़्में बच्चों की लिखता हूँ 'हाफ़िज़' सदा

Amjad Husain Hafiz Karnataki

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“शाख़” एक ज़र्द सी शाख़ राख कर जा रहा हूँ तेरे लिए जब इस शाख़ पर फूल खिल जाएँगे और ज़िंदगी की रेखा सब्ज़-रंग होगी तब मैं नहीं रहूँगा मगर तुम्हें ये महसूस होगा कि ये मेरी ही ख़ुश्बू है मेरा ही है ये रंग-ए-बहार मिट्टी बग़ैर पानी बग़ैर ज़िंदा रहेगी ये शाख़ ये कभी हुआ करती थी मेरी रूह के शजर की आँख आँखों को दिखाई दे ऐसी बारिश की ज़रूरत नहीं इसे इस की इक उम्र गुज़र चुकी है धूप में उड़ाते हुए ख़ाक ये शाख़ किसी शाही फूलों की नहीं है बिल्कुल मगर इतनी भी बेकार नहीं की इस पे कोई फूल ही न आए हर एक चीज़ के लिए चाहिए होता है एक वक़्त और बस इसी चीज़ की कमी थी हम दोनों की ज़िंदगी में फ़क़त अपनी सारी हयात बीत गई बादलों की परछाइयाँ गिन ने में किसी ने अगर पूछा तुम से तो बेशक कहना कभी कभी ऐसे बेकार काम भी करने ज़रूरी हैं अपने ही रूह के छाले कभी सिलने में कभी छिलने में सच कहूँ तो हरी-भरी ही शाख़ देनी थी तुम्हें मगर ये पता न था की ख़्वाहिशों से ज़्यादा साँसे कम पड़ जाएगी मगर ठीक है अब जो हुआ सो हुआ,अब तो तुम्हें, बहार और पतझड़ की बहुत अच्छे से समझ आएगी इस शाख़ की पोरों में अपनी कुछ परछाइयाँ रख दी हैं मैं ने जैसे सुकूत-ए-ज़िंदगी में दिल की कुछ बे-ताबियाँ रख दी हैं मैं ने कहीं ऐसा न हो कि मैं दूर ख़ुद अपने आप से हो जाऊँ मेरी हस्ती के हंगामों में कुछ तन्हाइयाँ रख दी हैं मैं ने मेरे शाहकार मेरे अफ़्कार हो जाएँ न फ़र्सूदा ज़माने में इस लिए निगाहों में तुम्हारी कुछ गहराइयाँ रख दी हैं मैं ने मेरा हर इज़्तिराब-ए-दिल निशाँ मंज़िल का बन जाए तमन्नाओं में तेरी हिज्र की अंगड़ाइयाँ रख दी हैं मैं ने किसी भी ग़ैर की जा़निब नज़र नहीं उठेगी मेरी मेरी निगाहों में तुम्हारी सब रानाइयाँ रख दी हैं मैं ने

Shivang Tiwari

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कैसी मख़्लूक़ थी आग में उस का घर था अलाव की हिद्दत में मव्वाज लहरों को अपने बदन की मलाहत में महसूस करती थी लेकिन वो अंदर से अपने ही पानी से डरती थी कितने ही उश्शाक़ अपनी जवानी में पानी में इक सानिया उस को छूने की ख़्वाहिश में नीचे उमुक़ में बहुत नीचे उतरे मगर फिर न उभरे समुंदर ने मंथन से उन के वजूदों को ज़म कर लिया दूधिया झाग ने और कोहना नमक ने उन्हें अपनी तेज़ाबियत में घुलाया भड़कती हुई आग ने जज़्र-ओ-मद में लपेटा उन्हें सर से पा तक जलाया मगर कोई शो'लों से कुंदन सा सीपों से मोती सा बाहर न आया वो अब भी समुंदर में इठलाती सत्हों के नीले बहाव में अपने अलाव में क़स्र-ए-ज़मुर्रद में तन्हा भटकती है इक बा-आह आब-ओ-आतिश में रंगों की बारिश में अब भी वो ज़ुल्फ़ें झटकती है तो ऊद-ओ-अम्बर की महकार आती है क़तरात उड़ कर दहन कितने घोंगों का भरते हैं उस की झलक देखने के लिए आज भी लोग मरते हैं अब भी यहाँ कश्तियों आब-दोज़ों जहाज़ों के अर्शों पे उस की ही बातें हैं दुनिया के सय्याह सातों समुंदर के मल्लाह उस के न होने पे होने पे तकरार करते हैं उस की कशिश में बहुत दूर के पानियों में सफ़र के लिए ख़ुद को तयार करते हैं मैं भी यहाँ मुज़्तरिब और बेहाल ख़स्ता-ओ-पारीना तख़्ते पे बहता हुआ एक ख़ुफ़्ता जज़ीरे के नज़दीक क्या देखता हूँ कि वो एक पत्थर पे बैठी है पानी पे तारी है इक कैफ़ सा चाँदनी की लपक और हवा की मधुर लय पे मछली सा नीचे का धड़ उस का शफ़्फ़ाफ़ पानी में हिलता है अबरेशमीं नूर में अक्स-ए-सीमाब सा उस के गलना चेहरे पे खिलता है अब देखिए मुझ सा मबहूत आशिक़ उसे अपनी आग़ोश में कैसे भरता है ग़र्क़ाब होता है मरता है

Rafiq Sandelvi

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तुम नहीं जानते इस धुँद का क़िस्सा क्या है धुँद जिस में कई ज़ंजीरें हैं एक ज़ंजीर किसी फूल किसी शब्द किसी ताइर की एक ज़ंजीर किसी रंग किसी बर्क़ किसी पानी की ज़ुल्फ़ ओ रुख़्सार लब ओ चश्म की पेशानी की तुम नहीं जानते इस धुँद का ज़ंजीरों से रिश्ता क्या है ये फ़ुसूँ-कार तमाशा क्या है! तुम ने बस धुँद के उस पार से तीरों के निशाने बाँधे और इधर मैं ने तुम्हारे लिए झंकार में दिल रख दिया कड़ियों में ज़माने बाँधे जाओ अब रोते रहो वक़्त के महबस में ख़ुद अपने ही गले से लग कर तुम मिरे सीना-ए-सद-रंग के हक़दार नहीं अब तुम्हारे मिरे माबैन किसी दीद का ना-दीद का असरार नहीं!!

Rafiq Sandelvi

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अजब पानी है अजब मल्लाह है सूराख़ से बे-फ़िक्र आसन मार के कश्ती के इक कोने में बैठा है अजब पानी है जो सूराख़ से दाख़िल नहीं होता कोई मौज-ए-नहुफ़्ता है जो पेंदे से किसी लकड़ी के तख़्ते की तरह चिपकी है कश्ती चल रही है सर-फिरी लहरों के झूले में अभी ओझल है जैसे डूबती अब डूबती है जैसे बत्न-ए-आब से जैसे तलातुम की सियाही से अभी निकली है जैसे रात-दिन बस एक ही आलम में कश्ती चल रही है क्या अजब कश्ती है जिस के दम से ये पानी रवाँ है और उस मल्लाह का दिल नग़्मा-ख़्वाँ है कितने टापू राह में आए मगर मल्लाह ख़ुश्की की तरफ़ खिंचता नहीं नज़ारा-ए-रक़्सन्दगी ख़्वाब में शामिल नहीं होता अजब पानी है जो सूराख़ से दाख़िल नहीं होता

Rafiq Sandelvi

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मैं ने आवाज़ दी और हिसार-ए-रिफ़ाक़त में उस को बुलाया मगर वो न आया गुल-ए-ख़्वाब की पतियाँ धूप की गर्म राहत में गुम थीं मिरे जिस्म पर नर्म बारिश की बूँदें भी घोड़े का सुम थीं ज़मीं एक अम्बोह-ए-हिज्राँ में उस चाप की मुंतज़िर थी जो ला-इल्म फैलाव में मुंतशिर थी परिंदे सुबुक रेशमीं टहनियाँ अपनी मिंक़ार में थाम कर उड़ रहे थे नशेब-ए-जुनूँ की तरफ़ पानियों की तरह मेरे साए बहे थे कफ़-ए-चश्म पर मैं ने उस के लिए शहर-ए-गिर्या सजाया मगर वो न आया किसी सम्त से उस की आहट न आई बहुत देर तक रात के सर्द-ख़ाने में इक आग मैं ने जलाई कहीं दूर से कोई बे-अंत महरूम आवाज़ आई जुदाई जुदाई तो फिर मैं ने उस के लिए धुँद हमवार की रस्ता-ए-नौ बनाया मगर वो न आया

Rafiq Sandelvi

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इक मुअल्लक़ ख़ला में कहीं ना-गहाँ मेहरबाँ फ़र्श पर पाँव मेरा पड़ा मैं ने देखा खुला है मिरे सामने ज़र-निगार ओ मुनक़्क़श बहुत ही बड़ा एक दर ख़्वाब का मेहरबाँ फ़र्श के मरमरीं पत्थरों से हुवैदा हुआ अक्स महताब का मैं ने हाथ अपने आगे बढ़ाए और उस को छुआ घंटियाँ मेरे कानों में बजने लगीं जावेदाँ और ग़िनाई रिफ़ाक़त के माबैन था मेरा सहरा-ए-जाँ इक मुअल्लक़ ख़ला में कहीं ना-गहाँ मैं ने देखा मिरे शब-नुमा जिस्म पर इक सितारा सी बारिश ने लब रख दिया नर्म बुर्राक़ तर्शे हुए ताक़ पर जितना ज़ाद-ए-सफ़र मेरे हम-राह था मैं ने सब रख दिया अब मैं आज़ाद था और तिलिस्मीं पड़ाव का हर इस्म भी याद था मैं ने देखा मिरे चार जानिब झुका था पियाला-नुमा आसमाँ मेरा महरम मिरी साँस का राज़-दाँ इक मुअल्लक़ ख़ला में कहीं ना-गहाँ मेहरबाँ फ़र्श पर पाँव मेरा पड़ा मैं ने देखा खुला है मिरे सामने ज़र-निगार ओ मुनक़्क़श बहुत ही बड़ा एक दर ख़्वाब का

Rafiq Sandelvi

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